Monday, December 22, 2008

आतंकवाद का यथार्थ

पिछले दो दशकों में आतंकवाद तथा अलगाववाद का यथार्थ भारतीय राष्ट्र-राज्य के चेहरे पर घाव पर घाव लगा रहा है, लेकिन हर बार भारत इन पर लगे खून को पोंछकर कुछ खोखली घोषणाएं कर देता है और अपने आसपास की कड़वी सच्चाई से मुंह मोड़ लेता है। सवाल यह है कि क्या मुंबई में हुआ आतंकी हमला भारतीय राष्ट्र-राज्य को सच्चाई तक पहुंचने के लिए प्रेरित करेगा? सच्चाई यह है कि हाल के समय में भारत और उससे बाहर इस्लामिक कट्टरता में एक नए प्रकार का पागलपन शामिल हो गया है। सच्चाई यह है कि देश का राजनीतिक वर्ग समाज के विभिन्न स्तरों पर मौजूद नकारात्मक तथा स्वार्थी शक्तियों के एकीकृत तथा प्रतिबद्ध हमले से निपट पाने में असमर्थ साबित हो रहा है। सच्चाई यह भी है कि हमारा लोकतंत्र उन कंधों पर है जो कमजोर मिट्टी के बने हैं। इन सबसे ऊपर की सच्चाई यह है कि हर चीज को हल्के-फुल्के तरीके से लेने की हमारी संस्कृति हमें अपनी कमजोरियों की पहचान करने तथा उनका निदान करने से रोक देती है। जब तक इन सच्चाइयों का सामना नहीं किया जाता तब तक आतंकवाद तथा अलगाववाद किसी न किसी रूप में हमें लहूलुहान करता रहेगा।

जब मुझे दूसरी बार 19 जनवरी 1990 को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तब मुझसे कहा गया था कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक मशीनरी पूरी तरह ढह गई है। मुझसे यह अपेक्षा की गई कि मैंने 1984 के शुरुआती दौर से 1989 तक अपने पहले कार्यकाल में लोगों और नौकरशाही के साथ जो तारतम्यता स्थापित कर ली थी उसका फायदा उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ के हाथों से फिसलने से रोकने के कुछ उपाय करूं। परिदृश्य में आने के बाद मैंने पाया कि आईएसआई तथा उसके एजेंटों द्वारा कश्मीर घाटी में आतंकवाद तथा घुसपैठ का व्यापक नेटवर्क कायम कर लिया गया है। वे वही तकनीक अपना रहे थे जो सीआईए के रणनीतिकारों ने अफगान युद्ध में अपनाई थी। अफगान युद्ध में सीआईए ने खासतौर पर इस्लाम के कतिपय कंट्टर पहलुओं का इस्तेमाल करते हुए स्थानीय लोगों को रूस के सैन्य बलों के विरुद्ध खड़ा किया। यही काम मिलते-जुलते रूप में घाटी में हो रहा था। बगावत के लिए उकसाने वाला साहित्य बड़े पैमाने पर घाटी के लोगों में बांटा गया था। लोगों के दिलोदिमाग को किस तरह झकझोरा जा रहा था उसका एक खास उदाहरण व्यापक रूप से वितरित किए गए उस कैसेट का है, जिसमें एक ऐसा गीत था जिसे कश्मीर का स्वाधीनता गीत कहा जा रहा था।

कश्मीरी मुस्लिम मष्तिष्क को भावनात्मक रूप से बरगलाने के इन प्रयासों के खिलाफ न तो केंद्र सरकार ने कुछ किया और न ही राज्य सरकार ने। राष्ट्रीय अथवा स्थानीय स्तर पर किसी नेता ने लोगों को यह समझाने की कोशिश नहींकी कि जो कुछ उनके दिमाग में भरा जा रहा है उसकी असलियत क्या है और एक ऐसे देश में जिहाद का कोई स्थान नहीं जो संवैधानिक रूप से लोगों को मजहब की आजादी प्रदान करता है। दूसरी ओर जमाते इस्लामी तथा दूसरे कट्टरपंथी संगठनों ने आईएसआई के वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग की मदद से अपनी गतिविधियां कई गुना बढ़ा दीं और मीडिया, शिक्षा पद्धति तथा शासन के अन्य अनेक संस्थानों के ढांचे में घुसपैठ कर ली। सीआईए ने अफगान युद्ध में आईएसआई को जो भारी-भरकम धनराशि उपलब्ध कराई थी उसका लगभग 60 प्रतिशत भाग इस पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा घाटी में आतंकवाद के तानेबाने में झोंक दिया गया।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की इतनी गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए मैंने कई नए और कठोर कदम उठाए। राष्ट्र विरोधी सामग्री को जब्त करना, उन स्थानों से लाउडस्पीकर हटवाना जहां से मजहब के नाम पर हिंसा भड़काने का काम किया जा रहा था और गुरिल्ला शैली में गुरिल्ला युद्ध से निपटने के सिद्धांत पर विशेष दस्तों का गठन ऐसे ही कुछ कदम थे। आतंकवाद के खिलाफ कई स्तर पर कदम उठाने का परिणाम ठोस सुधार के रूप में सामने आया, जिसे लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने महसूस किया। लेफ्टिनेंट जनरल एनसी रावले ने जो कुछ मुझे लिखा था वह और भी अधिक प्रासंगिक है-''मुझे गुरिल्ला अभियानों का अच्छा-खासा अनुभव है। दो महीने पहले तक मेरा विचार था कि हम कश्मीर खो चुके हैं। जब से आपने मौजूदा नीति अपनाई है, पूरी स्थिति ही बदल गई है। अब मुझे लगता है कि हम कश्मीर नहीं हारेंगे।'' जमीनी स्तर पर तेजी से सुधरती स्थितियों ने आईएसआई तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की साजिश गड़बड़ा दी। वे यह सोचने लगे थे कि कुछ ही हफ्तों के भीतर कश्मीर घाटी उनकी झोली में गिर जाएगी।

बुरी तरह हतोत्साहित होकर उन्होंने मेरे खिलाफ खास तरह का दुष्प्रचार आरंभ कर दिया। मुझे याद है कि बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर आकर कैसे-कैसे भाषण दिए थे। एक मौके पर उन्होंने कहा-''जग-जग-मोहन को भाग-भाग मोहन कर देंगे।'' मुझे आश्चर्य होता है कि व्यक्ति के रूप में वह मुझे क्यों निशाना बनाना चाहती थीं? शायद वह यह समझती थीं कि मेरे लक्ष्य की ओर केंद्रित व्यापक दृष्टिकोण के कारण पाकिस्तान की योजनाएं धरी रह जाएंगी। दुर्भाग्य से लगभग उसी समय कई तरह के तत्वों द्वारा मेरे खिलाफ मिथ्या सूचनाओं पर आधारित एक अभियान आरंभ कर दिया गया, जो बेनजीर भुट्टो के इरादों की पूर्ति करने वाला था। इनमें से कुछ लोग ऐसे थे जिनके राजनीतिक स्वार्थ थे। कुछ अन्य लोगों ने मानवाधिकारों की आड़ में इस अभियान में हाथ बंटाया और जमकर दुष्प्रचार किया। यह कहा गया कि राज्यपाल ने इसलिए कश्मीरी पंडितों को हटाया है ताकि वह घाटी में बमबारी कर सकें। इस सबका असर यह हुआ कि आतंक विरोधी अभियान की दिशा बाधित हो गई। सुरक्षा बलों तथा दूसरी एजेंसियों में एक प्रकार की हताशा फैल गई। खुद मुझे परिदृश्य से हटना पड़ा। तब अनंतनाग के एक शीर्ष आतंकवादी मंजूर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जगमोहन के हटाए जाने से हमारी उम्मीदें फिर बढ़ गई हैं।

इसके बाद क्या हुआ, यह हर कोई देख सकता है। जम्मू-कश्मीर में लगभग साठ हजार लोग मारे जा चुके हैं। जिस बुराई को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से मिटाया जा सकता था उसे हमने देश के बड़े हिस्से में फैल जाने दिया। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में हमने कभी वह स्पष्टता तथा दृढ़ता विकसित करने की कोशिश नहीं की जो आतंकवाद सरीखी बुराई से लड़ने के लिए आवश्यक है। आज भी हम अपने आप से यह सवाल नहीं कर रहे हैं कि जब जम्मू-कश्मीर के प्रानकोट में 28 नागरिकों को लाइन में खड़ा कर गोली से उड़ा दिया गया था तब कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली थी, क्यों गुस्से का एक भी नारा सुनाई नहीं दिया, क्यों कोई जुलूस नहीं निकला? यदि राजनीति, व्यवसाय, बौद्धिक समुदाय और मीडिया के विशिष्ट वर्ग ने जम्मू-कश्मीर में बसों में जलाए जा रहे निर्दोष लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की होती तो आतंकवाद का दैत्य ताज और ट्राइडेंट होटलों के डाइनिंग हाल तक नहीं पहुंचता। यह वर्ग सही समय पर सच्चाई का सामना करने के बजाय अपराधों की तार्किकता सिद्ध करने में जुट जाता है। यदि आज के भारत की सच्चाइयों को भी इसी तरह दफनाया जाता रहेगा तो मुंबई का नरसंहार अंतिम नहीं होगा।

[जगमोहन : लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं]

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