Thursday, December 25, 2008

लक्ष्य से भटकी हुई लड़ाई

भारत जल रहा है और नई दिल्ली यह तय नहीं कर पा रही कि उसे किस राह जाना है? मनोवैज्ञानिक दबाव में माहिर पाकिस्तान के युद्धक तंत्र ने भारतीय सुरक्षा बलों की पहले से ही तनी रस्सियों में और बल डाल दिए हैं। हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात करने पड़े हैं। मेट्रो स्टेशन, शापिंग माल, प्रमुख स्थल-सभी कुछ सुरक्षा के घेरे में हैं। यही शत्रु चाहता भी है-भारतीय सुरक्षा बलों को इधर-उधर दौड़ाकर थकाना और उनकी धार कुंद करना। यह स्थिति सामरिक क्षेत्र के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के रणनीतिक स्तर पर दूरदर्शी दृष्टिकोण के स्थान पर कंपनी कमांडर जैसे नजरिये का ही दुष्परिणाम है। इसके साथ ही यह केंद्र तथा राज्यों के पुलिस और खुफिया तंत्र की विफलता का महत्वपूर्ण कारण भी है। पिछले तीन दशकों से हमेशा जारी रेड अलर्ट से यह तंत्र ऐसी निष्क्रिय इकाइयों में तब्दील हो गया है जिसके पास हासिल करने के लिए कोई घोषित लक्ष्य नहीं है। जिस आसानी से भारत की संसद और मुंबई पर हमला किया गया वह इस तथ्य की पुष्टि करता है। बदतर स्थिति यह है कि इस खतरे पर हमारे नेतृत्व का नजरिया बेहद निराशाजनक है। चप्पे-चप्पे की सुरक्षा के सतही प्रयास करके भारत जाल में फंस रहा है। यह तरीका बिल्कुल अव्यावहारिक है। राजनीतिक और सामरिक उद्देश्यों में स्पष्टता के अभाव में भारतीय नेतृत्व पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से सुरक्षा बलों को उपद्रव और आतंकवाद के कीचड़ में धकेल रहा है। इससे हमारे सुरक्षा बल विभ्रम का शिकार हो रहे हैं। सुरक्षा बलों को लड़ाइयों में भेजते समय हमेशा स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए। उनका मनोबल बनाए रखने के लिए त्वरित सैन्य कार्रवाई और इसके सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित होने चाहिए, अन्यथा लड़ाई जीती नहीं जा सकती।

कल्पना कीजिए कि अगर कराची के दस प्रशिक्षित आतंकी भारत की वित्तीय राजधानी को कई दिनों तक बंधक बना सकते हैं तो देश के विभिन्न शहरों में ऐसे पांच सौ आतंकी घुस आने पर क्या हाल होगा? क्या वे पूरे देश को घुटनों के बल नहीं ला देंगे? यह कहना कि खुफिया एजेंसियों की विफलता के कारण कट्टरपंथ के खतरों का आभास नहीं हो पाया, सरासर गलत है। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई द्वारा निर्यातित, प्रशिक्षित तथा पेट्रो डालर से वित्तपोषित आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को देश में ही फंसा देने से उनका मनोबल कमजोर हो जाता है। या तो नई दिल्ली में राजनीतिक तंत्र युद्ध के इस सच को नहीं समझ पा रहा है या फिर लड़ाई को शत्रु के पाले में ले जाने में अत्यधिक सशंकित है। यह युद्ध समग्र भारतीय संघ में फैलने से पहले ही रणक्षेत्र पाकिस्तानी भूभाग को बनाना पड़ेगा। कट्टर इस्लाम की प्रयोगशाला पाकिस्तान के तार अन्य तानाशाहियों के साथ जुड़े हुए हैं। चीन एशिया की महाशक्ति बने रहने के लिए भारत का उदय देखना नहीं चाहता। माओवादी नेपाल चीन का पक्षधर है। कट्टरवादी इस्लाम की दूसरी प्रयोगशाला बांग्लादेश का इन तानाशाही शासनों के साथ गुप्त सहयोग है। चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की साठगांठ भारतीय भूभाग की अखंडता के लिए खतरा है। सुरक्षा बलों को घरेलू मोर्चे पर क्षति उठाने से बचाने के लिए हमें मजहबी कट्टरता द्वारा थोपे गए युद्ध को उसी की भूमि पर ले जाना होगा। जब तक आपूर्ति का स्त्रोत नहीं मिटेगा, इस युद्ध को जीता नहीं जा सकता। इस ड्रामे की निर्देशक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई हैं। इन वाह्यं सूत्रों को नाकाम करना जरूरी है। यह तभी संभव है जब पाकिस्तान की युद्ध की चुनौती को पलट दिया जाए। अगर वाह्यं कड़ियों से जहरीला प्रवाह नहीं रोका जाता तो भारतीय मुसलमान भी कट्टरपंथी हो जाएंगे, जो पाकिस्तान का प्रमुख ध्येय है। इसी प्रकार बहुसंख्यकों की ढिलाई, जो भारत की उदारवादी विचारधारा की परिचायक है, भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त कर देगी। हमारे सामने सुशासन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।

इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि मुंबई और भारत के अन्य शहरों पर किए गए हमले स्थानीय समर्थन के बगैर संभव नहीं हैं। 'शाश्वत असहाय' प्रजाति के भारतीयों का एक अन्य भ्रम यह है कि स्थिर पाकिस्तान भारत के हित में है। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है। यह विखंडन की कगार पर है। इसे खुद के खात्मे के लिए मदद की जरूरत है ताकि नक्शों का पुनर्निर्धारण किया जा सके। यह मदद जल्द देनी चाहिए, अन्यथा भारत के लिए इसकी कीमत बराबर बढ़ती चली जाएगी। इस युद्ध को दुश्मनों की हदों में ले जाने के लिए भारत को स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों के साथ निर्णायक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले तो कूटनीतिक संबंध समाप्त करने में देर नहींकरनी चाहिए। पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित करना, व्यावसायिक संबंध समाप्त करना, बस और रेल सेवा रद्द करना, सिंधु जल संधि के संबंध में फिर से वार्ता की घोषणा करना ऐसे अन्य उपाय हैं। इसके अलावा नेपाल और बांग्लादेश सीमा को प्राथमिकता के साथ सील कर दिया जाना चाहिए। भारत को सहयोगी लोकतांत्रिक देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ कर पाकिस्तान के खिलाफ उनका समर्थन हासिल करना चाहिए। अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ने के लिए मीडिया का भी इस्तेमाल करना चाहिए। युद्धकाल में मीडिया का बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल एक हथियार की तरह काम आता है। खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट दिशा-निर्देशों और संसाधनों से लैस कर शत्रु देश की अधिकाधिक जानकारी हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। बुश प्रशासन की यह रणनीति दिशाहीन और बेअसर है कि वह भारत के समर्थन के बिना अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर जीत हासिल कर सकता है। भारत के सीधे दखल के बिना यह संभव नहीं है। निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस नीति में बदलाव करने की जरूरत है। भारत को अन्य देशों से अपेक्षा रखने के बजाय अपनी लड़ाई खुद लड़ना सीखना होगा।

[भरत वर्मा: लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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