Monday, December 22, 2008

खतरे से खेलता पाकिस्तान

पाकिस्तान भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाने की भरसक कोशिश कर रहा है। मुंबई पर आतंकी हमले और इसके पश्चात पाकिस्तानी राजनेताओं और मीडिया की भड़काऊ बयानबाजी से दोनों देशों में तनाव बढ़ना स्वाभाविक था। परिणामस्वरूप अमेरिका अपनी नीति और खासतौर से अफगानिस्तान में अपनी रणनीति को नए सिरे से तय करने में जुट गया है। पाकिस्तानी सरकार और सेना इस बात से पूरी तरह अवगत हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन ने लश्करे-तैयबा और मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों के बीच हुई वायरलेस पर बातचीत को बीच में ही पकड़ लिया था। अमेरिका और ब्रिटेन पूरी तरह आश्वस्त हैं कि मुंबई हमले में लश्करे-तैयबा का हाथ है और पाकिस्तानी भूमि से आतंकवाद फैलाया जा रहा है। इसके अलावा पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और वहां के मीडिया की भारत से सुबूत मांगने की रट से यह बात रेखांकित होती है कि पाकिस्तानी सेना और उसकी पिट्ठू सरकार आतंकवाद जारी रखने पर आमादा हैं। उनका उद्देश्य अमेरिका को ब्लैकमेल करना है। आतंकवाद के जरिए उकसाने के पाकिस्तानी जाल में न फंसकर भारत ने वहां की सेना के इरादों को धूमिल कर दिया है। अब भारत को पाकिस्तान के अगले कदम पर सावधानी से निगाह रखनी होगी। पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत पर और आतंकी हमले करवाने की पूरी आशंका है ताकि भारत को बदले की कार्रवाई के लिए उकसाया जा सके। भारत की कार्रवाई को पाकिस्तान तालिबान के खिलाफ युद्धरत अमेरिका के साथ पूर्ण सहयोग न करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। पाकिस्तान से होकर अफगानिस्तान ले जाई जा रही अमेरिकी रसद पर हमलों में भी तेजी आई है।

पाकिस्तानी जनरलों का ख्याल है कि इस रणनीति से वे अमेरिकी सहायता प्राप्त करने, अमेरिकी सुरक्षा बलों को थकाने और उन्हें अफगानिस्तान से वापस जाने के लिए बाध्य कर सकते हैं। इसके बाद वे अफगानिस्तान पर कब्जा जमा सकते हैं और भारत पर हमले तेज कर सकते हैं। पाकिस्तानी जनरलों को अपनी सामरिक क्षमताओं के बारे में गलतफहमी है। 1947 में जनरल अकबर खान ने भारतीय सेना के कश्मीर पहुंचने से पहले ही कश्मीर पर कब्जा जमाने का प्रयास किया था। परिणाम यह हुआ कि कश्मीर के महाराजा भारत में विलय को तैयार हो गए और कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा भारत के पास आ गया। 1965 में पाकिस्तान के जनरलों ने आपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया। इसके तहत उन्होंने कश्मीर में घुसने और पंजाब पर हमले करने की योजना बनाई। उन्हें फिर मुंह की खानी पड़ी। 1971 में उन्होंने भारत में एक करोड़ बांग्लादेशी शरणार्थियों की घुसपैठ करा दी। उनका मानना था कि अमेरिका और चीन के सहयोग से वे अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे। यह कदम बांग्लादेश के उदय का कारण बना। 1999 में मुशर्रफ ने सोचा कि कारगिल क्षेत्र में अचानक घुसकर वे भारत को पछाड़ देंगे, किंतु उन्हें भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। इस बार पाकिस्तानी जनरलों ने भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाने और आतंकवाद के माध्यम से छद्म युद्ध छेड़ने की साजिश रची है ताकि अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर किया जा सके। इसके गंभीर दुष्परिणाम स्वयं पाकिस्तान को भोगने पड़ सकते हैं। अगर अफगान और पाकिस्तानी तालिबान मिलकर अमेरिका को हराने में सफल रहे तो वे डूरंड रेखा के दोनों ओर के इलाकों को मिलाकर पश्तूनिस्तान बनाने में कामयाब हो जाएंगे। यह पाकिस्तान के पठान कबाइलियों का बहुत पुराना सपना रहा है। पाकिस्तानी सेना के सामने जितना बड़ा खतरा भारत सीमा पर है उससे बड़ी चुनौती अफगानिस्तानी और पाकिस्तानी तालिबान से निपटने की है।

एक व्यक्ति जो पाकिस्तान के इस खतरे को पूरी तरह समझता है वह हैं अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा। इसलिए अगर पाकिस्तान के जनरल अमेरिका को ब्लैकमेल करने की कोशिश करते हैं तो अमेरिका इस्लामाबाद को साफ तौर पर चेतावनी दे सकता है कि कबीलाई इलाकों से सेना हटाने पर पाकिस्तान की अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने पर पश्तूनिस्तान बनने के अलावा ईरानी मदद से दारी भाषी लोग ताजिक और उजबेक क्षेत्रों के साथ मिलकर एक अलग देश बना सकते हैं। आजकल पाकिस्तान के लोग अमेरिकी कर्नल राल्फ पीटर्स के अध्ययन का बड़ा हवाला देते हैं, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के बिखरने का निष्कर्ष व्यक्त किया है। रूस और चीन को भी अफगानिस्तान के टूटने और वहाबी पश्तूनिस्तान के उदय के असर की चिंता करनी चाहिए। सबसे अधिक तो पाकिस्तान को चिंतित होना चाहिए। दीवालिया होने से बचने के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक सहायता की जरूरत है। तेल के दाम गिर जाने के कारण यह संभावना कम ही है कि सऊदी अरब पाकिस्तान को बचाने के लिए आगे आएगा। इसलिए पाकिस्तान एक हद तक ही अमेरिका का साथ न देने और उससे मोलभाव करने की स्थिति में रह गया है।

पाकिस्तानी जनरलों को ज्यादा होशियार बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वास्तव में वे आग से खेल रहे हैं और उनका देश टूटने की कगार पर पहुंच गया है। दुर्भाग्य से पिछले आठ वर्र्षो से अमेरिका की गलत नीतियों के कारण पाकिस्तान ने गलतफहमी पाल ली है कि वह फिर से अमेरिका के साथ छल-कपट करके बेदाग बच सकता है। भारत और अमेरिका के रणनीतिकारों के लिए यह बेहद जरूरी हो जाता है कि वे मिलकर काम करें और अफगानिस्तान में अमेरिकी प्रयासों को विफल करने के पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब न होने दें। अब तक अफगानिस्तान में अमेरिका पूरी तरह अपनी नीति पर चल रहा था। अब समय आ गया है कि उसे 'एकला चलो' की नीति का परित्याग करके अफगानिस्तान के मामले में भारत से भी सलाह-मशविरा करना चाहिए।

[के. सुब्रहमण्यम : लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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