Sunday, February 8, 2009

सत्यम जैसे घोटाले रोकने की जरूरत

सत्यम कांड को प्रकाश में आए कुछ हफ्ते बीत चुके हैं, पर आम निवेशक अब तक यह बात साफ तौर पर समझ पाने में असफल है कि आखिर इसमें घोटाला क्या हुआ है। आम निवेशक ही नहीं, ऐसे मामलों में विशेषज्ञ कोटि की जानकारी रखने वालों को भी इस बारे में अब तक ज्यादा कुछ मालूम नहीं चल पाया है।

सत्यम कांड से पहले हमारा देश ऐसे ही घपले-घोटाले वाला हर्षद मेहता प्रकरण देख चुका है। पर 1992 के हर्षद मेहता घोटाले पर कायदे की केस स्टडी, किताबें या शोध अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। वित्तीय प्रबंधन के छात्रों को यह समझाना मुश्किल है कि उस घोटाले में कौन सी प्रक्रियागत, नीतिगत और प्रशासनिक चूकें हुई थीं। वैसी संस्थागत तैयारियां कहीं भी नहीं दिखाई पड़तीं, जिनसे आम निवेशक ऐसे मसलों को समझ पाए, जबकि इनमें ज्यादातर धन तो उसी का डूबता है।

आज वैसे तो कई टीवी चैनल और वेबसाइटें हैं, जो आम निवेशकों को यह राय देती हैं कि फलाना शेयरों में निवेश से फायदा होगा। नुकसान हो जाए, तो फिर बताते हैं कि अब इन नए शेयरों में निवेश करो। लेकिन इस पर चर्चा आम तौर पर नहीं होती कि शेयर बाजार में निवेश के क्या जोखिम हैं और आखिर कोई शेयर कुछ ही दिनों में पांच सौ से दस रुपये का कैसे हो जाता है। दरअसल, इसमें किसी की दिलचस्पी भी नहीं है।

एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था की नींव में मजबूत वित्तीय साक्षरता की बड़ी भूमिका होती है। इसीलिए आज का सच यह है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बहसें करने और किसी कंपनी में स्वतंत्र निदेशकों के हाथ मजबूत करने की बात करने के बावजूद, जब तक आम निवेशक को अपने हित और अपने दायित्वों का पता नहीं होगा, तब तक सत्यम जैसे घोटालों का सिलसिला रोका नहीं जा सकता।

किसी भी कंपनी में निदेशक मूलत: तीन तरह के होते हैं। सबसे ज्यादा और सबसे महत्वपूर्ण निदेशक प्रवर्तक समूह के होते हैं, यानी वे जिन्होंने कंपनी बनाई है। दूसरे निदेशक वे होते हैं, जो महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों से आते हैं, जैसे एलआईसी, जीआईसी, यूटीआई वगैरह से। तीसरी श्रेणी में स्वतंत्र निदेशक होते हैं, जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे स्वतंत्र रूप से और नि:स्वार्थ भाव से कंपनी के निदेशकों की कारगुजारियों पर नजर रखेंगे।

पर सच यह है कि स्वतंत्र निदेशक किसी भी कंपनी में स्वतंत्र नहीं होते, हो भी नहीं सकते। जो भी इन स्वतंत्र निदेशकों को कंपनी में लेकर आता है, उनके प्रति इनकी यह अलिखित जिम्मेदारी बनती है कि वे उनकी कंपनी के लिए कड़े सवाल खड़े नहीं करेंगे। शर्त यही है कि आप हमें आगे भी निदेशक बनाते रहें। इस आपसी समझदारी के तहत कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक बैठे हुए हैं। इसलिए कह सकते हैं कि देश में अभी कई सत्यम घोटालों का सामने आना बाकी है।

नियमों के तहत सत्यम कंपनी में भी स्वतंत्र निदेशक थे। इनमें से एक शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। दूसरे केंद्र सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे। एक और टॉप इंडियन बिजनेस स्कूल के डीन थे। पर ये न तो सत्यम में कुछ भी गलत होते हुए देख पाए और न ही घोटालों को रोक पाए। क्यों? इस सवाल का जवाब यह है कि गतिविधियां ज्ञान से नहीं, स्वार्थ से संचालित होती हैं। स्वतंत्र निदेशक का किसी कंपनी में क्या स्वार्थ हो सकता है? विदेशी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब को कई करोड़ के प्रोजेक्ट सत्यम से मिले थे।

यहां सवाल यह भी है कि कोई बड़ा जानकार अपना समय और ऊर्जा किसी कंपनी के खातों की जांच में क्यों लगाएगा? ऐसा तीन सूरतों में संभव है। एक, जब ऐसा करने की साफ तौर पर जवाबदेही हो। दूसरे, उसके वित्तीय हित ऐसी जांच से जुड़े हों। तीसरे, जब वह राष्ट्रीय सामाजिक हित चेतना के भावों से ओतप्रोत हो। तीसरी संभावना की बात फिलहाल नहीं की जा सकती।

पहली स्थिति यानी किसी कंपनी के खातों की जांच-पड़ताल की जवाबदेही, स्वतंत्र निदेशकों की नहीं बनती। उनके वित्तीय हित किसी कंपनी से 'उचित सवाल नहीं पूछने पर' ही सध सकते हैं, पूछने पर नहीं। ऐसी सूरत में करोड़ों के निवेश आखिर छोड़े किसके भरोसे जाते हैं? इसका जवाब यह है कि प्रवर्तकों की भलमनसाहत के भरोसे। लेकिन अगर कोई प्रवर्तक राजू जैसा निकल जाए, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में क्या सेबी ऐक्ट और क्या कंपनी ऐक्ट- ये सब के सब धरे रह जाते हैं।

प्रवर्तकों की ऐसी प्रवृत्ति पर रोक सिर्फ वे हजारों निवेशक और शेयरधारक ही लगा सकते हैं, जिन्हें बतौर शेयरधारक अपने अधिकारों का पता हो और जिन्हें शेयरों से जुड़ी जिम्मेदारियों का अहसास हो। जो कंपनी की सभा में खड़े होकर पूछ सकें कि मिस्टर राजू, आपके खिलाफ इनकम टैक्स के घपलों का मामला क्या है? एक कंपनी में लगे पब्लिक के पैसों को आप अपने बेटों की कंपनी में क्यों लिवाए जा रहे हैं? अभी तो स्थिति यह है कि दस से 15 प्रतिशत शेयर रख कर प्रवर्तक समूह मालिक समूह घोषित हो जाता है। तकनीकी तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी का कोई एक मालिक नहीं होता। जिसके पास दस शेयर भी हैं, वह भी उस कंपनी का आंशिक मालिक होता है। उसके अपने अधिकार हैं, वह अपनी शंकाओं के निवारण के लिए सवाल पूछ सकता है। पर मसला यह है कि ज्यादातर निवेशक यही समझते हैं कि कंपनी का मालिक कोई दस-बीस प्रतिशत शेयर रखने वाला राजू है। हमें क्या? बड़े संस्थागत निवेशक तब तक कुछ नहीं करते, जब तक शेयर भाव ठीकठाक चल रहे हों। उनकी चिंता तब शुरू होती है, जब शेयर डूबने लगते हैं।

जरूरी यह है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध और पब्लिक से पैसा उगाहने वाली हर कंपनी के आंकड़ों और गतिविधियों पर सवाल उठाने के लिए निवेशक वैसे ही जागरूक हों, जैसे स्वस्थ लोकतंत्र के वोटर होते हैं। इसके लिए वित्तीय साक्षरता की मुहिम चलाई जानी चाहिए। इस मुहिम की अपेक्षा तो वैसे हर्षद मेहता घोटाले के बाद ही थी, पर अब सत्यम के घोटाले के बाद निश्चय ही चेत जाना चाहिए। रिजर्व बैंक, सेबी और कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को इस काम में अहम भूमिका निभानी चाहिए।

आलोक पुराणिक

Thursday, February 5, 2009

उनका और हमारा प्रजातंत्र

कोई भी समस्या हो, हम अमेरिका की ओर निहारते है। अमेरिकी लोग जिद के पक्के होते हैं और उनका यह स्वभाव वहां के प्रजातंत्र में झलकता है। बराक ओबामा के बच्चों के स्कूल पांच जनवरी से खुल रहे थे। इसलिए उन्होंने बुश प्रशासन से अस्थाई निवास आवंटित कराने का अनुग्रह किया, लेकिन प्रशासन ने वाशिंगटन में कोई भी सरकारी आवास आवंटित करने में असमर्थता जता दी। एक राज्य के गवर्नर टेलीफोन पर एक प्रत्याशी से सीनेट में नामांकित करने के लिए कुछ अनुग्रह कर थे कि तभी एफबीआई ने उनको गिरफ्तार कर लिया। आठ वर्ष राष्ट्रपति रहने के पश्चात जब बिल क्लिंटन अपने निवास लौटे तो सामान बांधने वालों ने भूलवश एक सोफा उनके सामान के साथ बांध दिया। इस कारण उन्हे 3600 डालर भरने पड़े। उपराष्ट्रपति डिक चेनी को विलंब से आने के कारण सीनेट के सदस्यों का कोपभाजन बनना पड़ा। उनके विलंब से आने का कारण यह था कि उन्हें पार्किग शुल्क जमा करने के लिए लाइन में लगना पड़ा था। राष्ट्रपति द्वारा मंत्रियों की नियुक्ति प्रस्तावित करने के बाद सीनेट की कमेटी जब तक उनकी बखिया नहीं उधेड़ लेती तब तक उनकी नियुक्ति नहीं होती।

न्यूजर्सी के गवर्नर को अपने मातहत के साथ समलैगिंक संबंधों और एक सीनेटर को कालगर्ल से मित्रता के कारण अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा। यह तो रहा इन लोगों का प्रजातंत्र। अब एक बानगी विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की देखिए। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री का राजकीय निवास कालिदास मार्ग पर है। इसके अतिरिक्त भूतपूर्व मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा आवास माल एवेन्यू में है, जिसका हमेशा विस्तार होता रहता है। तीसरा निवास दिल्ली में है। इसके अतिरिक्त एक विशाल निजी निवास लखनऊ कैंट में है। राजकीय नियमों के अनुसार किसी भी राजकीय पदाधिकारी को एक से अधिक निवास आवंटित नहीं हो सकता। यही नहीं, नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव-सबको एक सरकारी आवास लखनऊ में भूतपूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते तथा दूसरा दिल्ली में आवंटित है। नौकरशाह और अन्य राजनेता भी पीछे नहीं है, जो सेवानिवृत्ति के पश्चात भी सरकारी बंगलों का मोह नहीं त्याग पाते। यह स्थिति तब है जब एक व्यक्ति को एक से अधिक आवास आवंटित न करने का सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। यदि बुश प्रशासन हमसे कुछ सबक सीख सकता तो बेचारे ओबामा को होटल में रोजाना 1200 डालर खर्च न करने पड़ते। इस मामले में हम अमेरिका से बहुत आगे है। हमारी हर राजनीतिक पार्टी ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विजयी संभावना का आकलन कर टिकटों का मूल्य निर्धारित कर रखा हैं। जो मूल्य चुकाएगा वह टिकट पाएगा। लाखों और करोड़ों रुपये की दरे है। उसके पश्चात भी यह आवश्यक नहीं टिकटधारी चुनाव में विजयी हो जाए। राज्य की राजनीति में सक्रिय नेताओं को भी चिंता की कोई बात नहीं। सरकार भी तो उनके हीपुण्य प्रतापों का फल है। डाक बंगलों की चादरे, तौलिए, क्राकरी तथा सरकारी बंगलों का फर्नीचर, एयर कंडीशनर, स्टेशनरी आदि भी तो नेताओं की निजी संपत्ति ही हैं। गुंडों और माफिया तत्वों के लिए भी राजनीति में भरपूर अवसर हैं। उत्तर प्रदेश में जेल में बंद एक नेता को शायद माफियाओं के प्रतिनिधि के रूप में शपथ लेने सीधे जेल से राजभवन लाया गया था, जबकि वह कोई राजनीतिक अपराधी नहीं, बल्कि हत्या के अपराध में बंदी था। आने वाले चुनाव में नामी-गिरामी माफियाओं के आकाओं को अपनी-अपनी पार्टी से टिकट देने की होड़ लगी है। इन सब पार्टियों का लक्ष्य मात्र संसद में संख्या वृद्धि करना है, न कि स्वच्छ प्रतिनिधित्व या जनसेवा। वैसे भी जीतकर जब शासन की डोर हाथ में आ जाती है तो जनसेवा तो वैसे ही बिना धन सेवा के प्राप्त नहीं होती। फिर आदर्श जनसेवकों को चुनने से क्या लाभ? हमारे मतदाता भी अब दमदार प्रत्याशी को ही अपना मत देते है। जो जितना बड़ा माफिया है उसके विजयी होने के अवसर उतने अधिक है। इसीलिए आम भारतीय को परिणिता से ज्यादा गजनी फिल्म भाती है। पुलिस भी एक साधारण मामले की रपट तभी लिखती है जब किसी माफिया का प्यादा उसके साथ थाने जाए। उनका वर्चस्व इतना है कि वे जेल की चहारदीवारियों के अंदर से चुनाव धड़ल्ले से जीतते है। यदि सिर्फ एक राज्य उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो पिछली विधानसभा में 207 दागी विजयी हुए थे। इस बार कुछ सुधार हुआ है और मात्र 155 दागी ही विधायक बनकर आए। कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल में 19 दागी मंत्री थे। अब यह संख्या 22 हो गई है। जैसे आसार नजर आ रहे है, अगले चुनाव में उतरने वाले आपराधिक छवि और इतिहास वाले लोगों की संख्या बढ़ने की संभावना है।

यह विडंबना ही है कि जार्ज बुश के साथ हमारे राष्ट्र के इतने अच्छे संबंध होने के पश्चात भी हम अमेरिका से यह नहीं सीख सके कि सार्वजनिक पदों पर रहने वाले लोगों को कितना साफ-सुथरा जीवन बिताना चाहिए। यदि रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल करने के भारतीय राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों को अपना लिया होता तो उसकी पराजय नहीं होती। बुश ने सभ्य, भले तथा युद्ध के नामी योद्धा जान मैक्केन को चुनावी जंग में उतारा। यदि किसी माफिया को उतारा गया होता तो शायद उसकी यह फजीहत नहीं होती। चुनाव भी उन्होंने घिसे-पिटे मुद्दों पर लड़ा, जैसे आर्थिक व्यवस्था का ह्रास, प्रदूषण, र्इंधन के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा आदि। उन्होंने न कंबल बांटे, न साइकिल और शराब को छुआ। ऐसे में भला इस युग में कोई चुनाव जीत सकता है? हमारे मतदाताओं को अपने स्वर्णिम वोट का एक सुनहरा अवसर कुछ ही महीनों में फिर मिलने लगा है। इस बार देखते है कि वह किस प्रजातंत्र का वरण करते है? उसका जो अमेरिका वालों ने चुना है या वह जो हमारे यहां बाहुबल से संचालित होता है? प्रतीक्षा कर अनुभव करने की बात है।

[हरीशचंद्र पंत राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी हैं]