ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड उत्तर प्रदेश में अमेठी के एक गांव सेमरा में दलित विधवा के घर ग्रामीण भारत की गरीबी देखने गए थे। गरीबी जैसे नुमाइश की चीज हो या जैसे कि यह कोई भारतीय उद्योग हो। वह अमीरी के प्रतिनिधि हैं। जिस हालत में उस महिला शिवकुमारी की जिंदगी चल रही है उसी हाल में कमोबेश 30 प्रतिशत भारत है। शिवकुमारी ने जैसे-तैसे उन बड़े मेहमानों का स्वागत किया। बहुत से भारतीयों की तरह शिवकुमारी भी नहीं समझ पाई कि उसकी गरीबी और अभाव के जिम्मेदार दरअसल इन्हीं गोरे साहबों के पूर्वज रहे हैं। 1610 में जहांगीर के दरबार में व्यापारियों के रूप में इनका पहला जत्था पहुंचा था। जहांगीर के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी इंग्लैंड के अपराधी प्रवृत्ति के समाज बहिष्कृत दुष्ट नाविकों की संस्था है। 1757 के पहले तक भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में शुमार था। ये दुर्भाग्य की काली छाया लेकर आए। मसाले, दस्तकारी के समान का कारोबार कर उन्होंने अकूत धन कमाया। फिर उनके उद्योगों में पैदा माल को खपाने के लिए स्थानीय उद्योगों का नाश कर भारत को सिर्फ बाजार बना दिया गया। उन्होंने राज्यों को हड़प कर राजस्व की वसूली पर कब्जा किया। भारत से कच्चे माल की आपूर्ति भी उन्होंने अपने हाथ में ले ली। अर्थव्यवस्था का कोई पक्ष ऐसा नहीं था जो उनके शोषण से मुक्त रहा हो। सूदखोरी उन्होंने चलाई। शिवकुमारी के पूर्वज जहांगीर, शाहजहां के जमाने में दस्तकार रहे होंगे या कोई कारोबार करते होंगे। उस जमाने में किसानों, मजदूरों के लिए भी बहुत काम था।
इतिहास गवाह है कि गोरों की कौम ने औद्योगिक क्रांति की सफलता के लिए हिंदुस्तानी दस्तकारों, श्रमिकों का भयंकर शोषण किया था। कपड़ा उद्योग ध्वस्त करने के लिए बताते हैं कि बुनकरों के अंगूठे तक काटे गए। यह सब शिवकुमारी और उसके बच्चों को नहीं मालूम। कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है। वर्तमान शिक्षा में कोई किसान अच्छा किसान, दस्तकार अच्छा दस्तकार, बुनकर अच्छा बुनकर नहीं बनता। हमारी शिक्षा हमें अच्छा ड्राइवर, अच्छा मैकेनिक भी नहीं बनाती। अंग्रेजी पढ़ाई हमें बाबू बनाने के लिए थी। अगर तुम बाबू नहीं बन सके तो किसी काम के न होकर नौकरी तलाश करते हुए बेकार रहोगे। उनके इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने भारत को एक देश बनाया। अंग्रेजी भाषा दी, ज्ञान दिया। ताज्जुब है भारत से तीन गुना बड़ा चीन कैसे बिना अंग्रेजों के एक किए हुए एक देश बना हुआ है? कैसे बिना अंग्रेजी के वे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते जा रहे हैं। भारत से चले जाने के बाद भी वे हममें गुलाम मानसिकता छोड़ गए हैं। अपना इतिहास न जानना इस देश की बड़ी परेशानियों में से एक है। इसीलिए इतिहास से सबक की बात भी नहीं उठती। पता नहीं सेमरा के कितने लोग जानते हैं कि करीब ही स्थित जबरौली और पुरवा में उन्हीं गोरे शोषकों के खिलाफ 1858 में सुल्तानपुर, रायबरेली के लोगों ने अपने राजाओं के नेतृत्व में कितनी जबरदस्त जंग लड़ी थी। सेमरा की गरीबी दिखाने के साथ-साथ मिलिबैंड को वह जंग का मैदान भी दिखाया जाना चाहिए था, जहां नवंबर 1858 में उनके पूर्वजों के खिलाफ राजा बेनी माधव ने शहादत का आखिरी मोर्चा लगाया था। उन्हें वे पीपल और बरगद के वृक्ष भी दिखाए जाने चाहिए थे, विजय के बाद जिन पर लटका कर गर्वाेन्मत्त अंग्रेजों ने सैकड़ों बागियों को सजा-ए-मौत दी थी।
फिर भी उनके अमेठी तक आ जाने का असल मकसद क्या था? व्यक्तिगत रिश्तों के चलते अगर वह निजी यात्रा पर होते तो कोई बात नहीं, लेकिन वह ब्रिटिश मंत्री होकर आए और बाकायदा प्रेस से मुखातिब हुए। अगर कोई विदेशी सरकार का मंत्री यहां आकर दलीय रुझान दिखाता है तो उसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर लिया जाना चाहिए। श्रीमान मिलिबैंड अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह भी कह गए कि मुंबई हमले के आरोपियों पर मुकदमा अगर पाकिस्तान में ही चले कोई हर्ज नहीं है। ब्रिटिश डिप्लोमेसी ने अपना रंग बदल लिया है, यह साफ जाहिर है। उन्हें पाकिस्तान की जरूरत है। पता नहीं हम क्यों इतने मजबूर देश बने हुए हैं? कमजोरियां न सेनाओं में हैं और न हिंदुस्तान के जज्बे में, समस्या तो उस व्यवस्था में है जो इस देश के लायक अपना असल नेता नहीं खोज पा रही है। जब हम नेता खोजते हैं तो राजनीतिक चापलूस हमारे सामने घराने बैठा देते हैं। आज हम गुलाम नहीं हैं, लेकिन इस लंबे दौर में गुलामी का अर्क रिसकर हमारी आत्माओं में जा बसा है। काश! मिलिबैंड शिवकुमारी और सारे भारत से उन अपराधों के लिए क्षमा मांगते जो उनकी कौम ने हम पर किए हैं। उनकी कौम सिराजुद्दौला से लेकर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस तक सबकी गुनाहगार है।
[आर. विक्रम सिंह पूर्व सैन्य अधिकारी हैं]