क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से आ रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!
मुकुल शुक्ला..... गर्व से कहो हम भारतीय है !
Sunday, November 22, 2009
Thursday, November 19, 2009
अंग्रेजी की चक्की में क्यों पिसे बच्चे
डा. वेद प्रताप वैदिक
भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने में अंग्रेजी के अखबार विशेष भूमिका निभाते है | भारत में अंग्रेजी के जितने अखबार निकलते है उतने दुनिया के किसी भी गैर अंग्रेजी भाषी देश से नहीं निकलते है | दिल्ली के एक अंग्रजी अखबार ने कुछ ऐसे आंकड़े उछाले है जिनसे ये सिद्ध होता है की अंग्रेजी सुरसा के बदन की तरह निरंतर बढाती चली जा रही है |
एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में 74 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | उनकी संख्या 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है जबकि हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में सिर्फ 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | यानी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी तीन गुना तेजी से दौड़ रही है |
ऐसा कहने का आशय क्या है ? आशय ये है की हिंदी वालो जागो, आँखे खोलो | अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाओ | दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलो | विदेशो में बड़ी बड़ी नौकरिया हथियाना हो तो अपने बच्चो को अभी से अंग्रेजी की घुट्टी पिलाना शुरू करो | वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा से चिपके रहने में कोई फायदा नहीं है | इस खबर में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और महाराष्ट्र की इसलिए विशेष तारीफ़ की गयी है की उनके 60 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है |
इस खबर में संख्या का जो खेल खेल गया है पहले हम उसकी खबर ले | यह ठीक है की अंग्रेजी माध्यम के छात्र 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है, लेकिन हम ये क्यों भूल गए की हिंदी माध्यम के छात्र 6 करोड़ 31 लाख से बढ़ कर 7 करोड़ 73 लाख हो गए | हिंदी का प्रतिशत 49.5 से बढ़ कर 52.2 हो गया है जबकि अंग्रेजी का 4.3 से बढ़ कर 6.3 ही हुआ है | यह कुल 15 करोड़ छात्रों की संख्या में से निकाला हुआ प्रतिशत है |
इस संख्या को इस कोण से भी देखे की कुल 15 करोड़ छात्रों में से अंग्रेजी माध्यम वाले छात्र एक करोड़ भी नहीं है | अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले 'सिर्फ' हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या 8-9 गुना बढ़ी है | पिछले 200 साल से पूरी सरकारी मशीनरी और भारतीय भद्रलोक ने अपना खून पसीना एक कर लिया | भारतीय भाषाओ के विरुद्ध जो भी साजिश संभव थी, वह भी कर ली |
इसके बावजूद भी क्या नतीजा सामने आया? 110 करोड़ के भारत में सिर्फ 95 लाख बच्चे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है | यानी पूरे भारत में अंग्रेजी पढ़ने वालो की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है | ये एक प्रतिशत बड़े हो कर कैसी अंग्रेजी लिखते बोलते है ये सबको पता है | नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी नयी पुस्तक "आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन " (Argumentative Indian) की भूमिका में उनकी अंग्रेजी सुधारने वाली एक अंग्रेजी लड़की का बड़ा अभार माना है | यह उनकी सच्चाई और विनम्रता का प्रमाण है | जब अमर्त्य बाबू का यह हाल है तो अंग्रेजी के अखाडे में दंड पेलने वाले नौसिखियों का क्या कहना?
भारत में एक करोड़ बच्चे विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी की चक्की में पिस रहे है | ऐसी पिसाई दुनिया में कही नहीं होती | दुनिया के किसी भी शक्तिशाली या मालदार देश में उनके बच्चो की गर्दन पर ऐसी छुरी नहीं फेरी जाती | वहां गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा कला के विभिन्न विषय विदेशी माध्यम से नहीं पढाये जाते | ये सारे विषय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, जापान और रूस जैसे देशो मे स्वदेशी भाषा के माध्यम से पढाये जाते है | इसलिए सारे विषयो को सीखने में बच्चो को विशेष सुविधा होती है | सीखने की रफ़्तार तेज़ होती है | उनके नंबर भी ज्यादा आते है | वे फेल भी कम होते है | उन्हें विदेशी भाषा से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती |
अपनी भाषा में वे सरलता से सीख लेते है | उनकी सारी शक्ति विषयो को सीखने में लगती है | भारत में इसका उल्टा होता है | बच्चो को मार मार कर विदेशी भाषा रटाई जाती है | जितना समय वे अन्य पांच विषयो को सीखने पर लगाते है, उस से ज्यादा उन्हें अकेली अंग्रेजी पर लगाना होता है | फिर भी सबसे ज्यादा बच्चे अगर किसी विषय में फेल होते है तो अंग्रेजी में होते है | यही कारण है की बी ए में पहुंचते पहुंचते 15 करोड़ में से 14 करोड़ 40 लाख बच्चे पढाई से मुंह मोड़ लेते है |
सिर्फ 4-5 प्रतिशत बच्चे ही कॉलेज पहुँच पाते है | हमारे देश के पिछडेपन का एक मूल कारण यह भी है की हमारे यहाँ सुशिक्षित लोगो की संख्या 15 प्रतिशत भी नहीं है | साक्षर लोग यानी अपने हस्ताक्षर कर सकने वाले लोग 70 प्रतिशत हो सकते है, लेकिन क्या साक्षरों को सुशिक्षित कह सकते है? दूसरे शब्दों में अंग्रेजी के कारण बच्चे शिक्षा से ही पिंड छुडा लेते है | इस प्रकार अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बनती है |
जिन बच्चो को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढाई जाती है और जिनका माध्यम अंग्रेजी है, उन बच्चो की कितनी दुर्दशा होती है, उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रुरत है | ये बच्चे निरंतर दबाव और तनाव की ज़िन्दगी जीते है | वे अपनी भाषा, अपने संगीत, अपनी कला, अपनी परंपरा और अपने मूल्यों से बेगाने होते चले जाते है | वे कही भी गहरे उतरने के लायक नहीं रहते | उनका मन मस्तिष्क चिमगादड़ की तरह हो जाता है | वे उल्टे हो कर लटकने लगते है | उन्हें बताया जाता है की पश्चिम ही छत है | अमेरिका और ब्रिटेन ही सबसे अच्छे है | उनसे ही जुडो | वे उनसे इतने जुड़ जाते है की वे बड़े हो कर इन्ही पश्चिमी देशो में रहने के लिए उतावले हो जाते है | इसीलिए हमारे अंग्रेजी माध्यम से लोग पश्चिम की गटर में बह जाते है | इसे ही "ब्रेन-ड्रेन" कहा जाता है | इन लाखो छात्रों की पढाई और लालन पालन पर यह गरीब देश करोडो अरबो रूपए खर्च करता है और जब फल पक कर तैयार होता है तो गिरने के लिए वह अमेरिकी झोली तलाशता है | इस से बढ़ कर भारत की लूट क्या हो सकती है ?
जो लोग पढ़ लिख कर विदेशो में बस जाते है, वे भारत के लिए क्या करते है? भारत की बात जाने दे, अपने परिवारों के लिए भी ख़ास कुछ नहीं करते | उनसे ज्यादा पैसा तो वे बेपढे लिखे मज़दूर भेजते है जो खाडी देशो में काम करते है | ये कमाऊ पूत है और वे उडाऊ पूत | अंग्रेजी की पढाई देश में उडाऊ पूत पैदा करती है | यदि अमेरिका जा कर हमारे 10-15 लाख नौजवानों ने नौकरिया हथिया ली तो इसमें फूल कर कुप्पा होने की क्या बात है |
इसमें शक नहीं की अगर वे अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें ये नौकरिया नहीं मिलती, लेकिन ज़रा सोचे की इन 10-15 लाख लोगो के लिए हम अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है? 15 लाख लोगो को विदेशो में नौकरी मिल जाए, इसलिए हम 15 करोड़ बच्चो को अंग्रेजी की चक्की में पीसने को तैयार है? हम कितने बुद्धू और क्रूर राष्ट्र है?
और इतना ही नहीं अंग्रेजी के मोह के कारण हम चीनी, जापानी, रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन और हिस्पानी जैसी भाषायें भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते | यही नहीं हम तो अपने देश के अलग अलग राज्यों की भाषाए भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते है | हमने अपना संसार बहुत छोटा कर लिया है | यदि हम हमारे बच्चो को अंग्रेजी के साथ साथ अन्य प्रमुख देसी और विदेशी भाषायें सीखने की छूट दे देते तो भारत अपने व्यापार और कूटनीति में अब तक संसार का अग्रणी देश बन जाता |
ज़रा ध्यान दीजिये! यहाँ मैंने छूट देने की बात कही है, थोपने की नहीं | भारत में अनेक विदेशी भाषाए जम कर पढाई जानी चाहिए, जैसी की आजकल चीन में पढाई जा रही है | चीनी लोग अंग्रेजी की गुलामी नहीं कर रहे है, उसे अपना गुलाम बना कर उस से अपना काम निकाल रहे है | अमेरिका में चीनियों की संख्या भारतीयों से भी ज्यादा है | उनके लिए अंग्रेजी महारानी नहीं नौकरानी है | हमने अंग्रेजी को महारानी बना रखा है |
इसलिए 15 करोड़ बच्चो पर हम उसे थोप देते है और एक करोड़ बच्चो से कहते है की तुम्हे जो सीखना हो, वह अंग्रेजी माध्यम से ही सीखो | किसी भी विदेशी भाषा को पढाई का माध्यम बनाना अक्ल के साथ दुश्मनी है | इस पर संवैधानिक प्रतिबन्ध लगना चाहिए | कौन लगायेगा यह प्रतिबन्ध? हमारे सारे नेतागण तो कुर्सी और पैसे के खेल में पगला रहे है |
उन्हें इन बुनियादी सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है | यह काम देश के प्रबुद्ध जन को ही करना होगा | अगर वे कोई ज़बरदस्त जन अभियान चला दे तो अपने देश के बच्चो का बड़ा कल्याण होगा और नेतागण तो अपने आप उसके पीछे चले आयेंगे |
भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने में अंग्रेजी के अखबार विशेष भूमिका निभाते है | भारत में अंग्रेजी के जितने अखबार निकलते है उतने दुनिया के किसी भी गैर अंग्रेजी भाषी देश से नहीं निकलते है | दिल्ली के एक अंग्रजी अखबार ने कुछ ऐसे आंकड़े उछाले है जिनसे ये सिद्ध होता है की अंग्रेजी सुरसा के बदन की तरह निरंतर बढाती चली जा रही है |
एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में 74 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | उनकी संख्या 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है जबकि हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में सिर्फ 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | यानी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी तीन गुना तेजी से दौड़ रही है |
ऐसा कहने का आशय क्या है ? आशय ये है की हिंदी वालो जागो, आँखे खोलो | अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाओ | दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलो | विदेशो में बड़ी बड़ी नौकरिया हथियाना हो तो अपने बच्चो को अभी से अंग्रेजी की घुट्टी पिलाना शुरू करो | वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा से चिपके रहने में कोई फायदा नहीं है | इस खबर में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और महाराष्ट्र की इसलिए विशेष तारीफ़ की गयी है की उनके 60 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है |
इस खबर में संख्या का जो खेल खेल गया है पहले हम उसकी खबर ले | यह ठीक है की अंग्रेजी माध्यम के छात्र 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है, लेकिन हम ये क्यों भूल गए की हिंदी माध्यम के छात्र 6 करोड़ 31 लाख से बढ़ कर 7 करोड़ 73 लाख हो गए | हिंदी का प्रतिशत 49.5 से बढ़ कर 52.2 हो गया है जबकि अंग्रेजी का 4.3 से बढ़ कर 6.3 ही हुआ है | यह कुल 15 करोड़ छात्रों की संख्या में से निकाला हुआ प्रतिशत है |
इस संख्या को इस कोण से भी देखे की कुल 15 करोड़ छात्रों में से अंग्रेजी माध्यम वाले छात्र एक करोड़ भी नहीं है | अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले 'सिर्फ' हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या 8-9 गुना बढ़ी है | पिछले 200 साल से पूरी सरकारी मशीनरी और भारतीय भद्रलोक ने अपना खून पसीना एक कर लिया | भारतीय भाषाओ के विरुद्ध जो भी साजिश संभव थी, वह भी कर ली |
इसके बावजूद भी क्या नतीजा सामने आया? 110 करोड़ के भारत में सिर्फ 95 लाख बच्चे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है | यानी पूरे भारत में अंग्रेजी पढ़ने वालो की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है | ये एक प्रतिशत बड़े हो कर कैसी अंग्रेजी लिखते बोलते है ये सबको पता है | नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी नयी पुस्तक "आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन " (Argumentative Indian) की भूमिका में उनकी अंग्रेजी सुधारने वाली एक अंग्रेजी लड़की का बड़ा अभार माना है | यह उनकी सच्चाई और विनम्रता का प्रमाण है | जब अमर्त्य बाबू का यह हाल है तो अंग्रेजी के अखाडे में दंड पेलने वाले नौसिखियों का क्या कहना?
भारत में एक करोड़ बच्चे विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी की चक्की में पिस रहे है | ऐसी पिसाई दुनिया में कही नहीं होती | दुनिया के किसी भी शक्तिशाली या मालदार देश में उनके बच्चो की गर्दन पर ऐसी छुरी नहीं फेरी जाती | वहां गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा कला के विभिन्न विषय विदेशी माध्यम से नहीं पढाये जाते | ये सारे विषय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, जापान और रूस जैसे देशो मे स्वदेशी भाषा के माध्यम से पढाये जाते है | इसलिए सारे विषयो को सीखने में बच्चो को विशेष सुविधा होती है | सीखने की रफ़्तार तेज़ होती है | उनके नंबर भी ज्यादा आते है | वे फेल भी कम होते है | उन्हें विदेशी भाषा से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती |
अपनी भाषा में वे सरलता से सीख लेते है | उनकी सारी शक्ति विषयो को सीखने में लगती है | भारत में इसका उल्टा होता है | बच्चो को मार मार कर विदेशी भाषा रटाई जाती है | जितना समय वे अन्य पांच विषयो को सीखने पर लगाते है, उस से ज्यादा उन्हें अकेली अंग्रेजी पर लगाना होता है | फिर भी सबसे ज्यादा बच्चे अगर किसी विषय में फेल होते है तो अंग्रेजी में होते है | यही कारण है की बी ए में पहुंचते पहुंचते 15 करोड़ में से 14 करोड़ 40 लाख बच्चे पढाई से मुंह मोड़ लेते है |
सिर्फ 4-5 प्रतिशत बच्चे ही कॉलेज पहुँच पाते है | हमारे देश के पिछडेपन का एक मूल कारण यह भी है की हमारे यहाँ सुशिक्षित लोगो की संख्या 15 प्रतिशत भी नहीं है | साक्षर लोग यानी अपने हस्ताक्षर कर सकने वाले लोग 70 प्रतिशत हो सकते है, लेकिन क्या साक्षरों को सुशिक्षित कह सकते है? दूसरे शब्दों में अंग्रेजी के कारण बच्चे शिक्षा से ही पिंड छुडा लेते है | इस प्रकार अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बनती है |
जिन बच्चो को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढाई जाती है और जिनका माध्यम अंग्रेजी है, उन बच्चो की कितनी दुर्दशा होती है, उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रुरत है | ये बच्चे निरंतर दबाव और तनाव की ज़िन्दगी जीते है | वे अपनी भाषा, अपने संगीत, अपनी कला, अपनी परंपरा और अपने मूल्यों से बेगाने होते चले जाते है | वे कही भी गहरे उतरने के लायक नहीं रहते | उनका मन मस्तिष्क चिमगादड़ की तरह हो जाता है | वे उल्टे हो कर लटकने लगते है | उन्हें बताया जाता है की पश्चिम ही छत है | अमेरिका और ब्रिटेन ही सबसे अच्छे है | उनसे ही जुडो | वे उनसे इतने जुड़ जाते है की वे बड़े हो कर इन्ही पश्चिमी देशो में रहने के लिए उतावले हो जाते है | इसीलिए हमारे अंग्रेजी माध्यम से लोग पश्चिम की गटर में बह जाते है | इसे ही "ब्रेन-ड्रेन" कहा जाता है | इन लाखो छात्रों की पढाई और लालन पालन पर यह गरीब देश करोडो अरबो रूपए खर्च करता है और जब फल पक कर तैयार होता है तो गिरने के लिए वह अमेरिकी झोली तलाशता है | इस से बढ़ कर भारत की लूट क्या हो सकती है ?
जो लोग पढ़ लिख कर विदेशो में बस जाते है, वे भारत के लिए क्या करते है? भारत की बात जाने दे, अपने परिवारों के लिए भी ख़ास कुछ नहीं करते | उनसे ज्यादा पैसा तो वे बेपढे लिखे मज़दूर भेजते है जो खाडी देशो में काम करते है | ये कमाऊ पूत है और वे उडाऊ पूत | अंग्रेजी की पढाई देश में उडाऊ पूत पैदा करती है | यदि अमेरिका जा कर हमारे 10-15 लाख नौजवानों ने नौकरिया हथिया ली तो इसमें फूल कर कुप्पा होने की क्या बात है |
इसमें शक नहीं की अगर वे अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें ये नौकरिया नहीं मिलती, लेकिन ज़रा सोचे की इन 10-15 लाख लोगो के लिए हम अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है? 15 लाख लोगो को विदेशो में नौकरी मिल जाए, इसलिए हम 15 करोड़ बच्चो को अंग्रेजी की चक्की में पीसने को तैयार है? हम कितने बुद्धू और क्रूर राष्ट्र है?
और इतना ही नहीं अंग्रेजी के मोह के कारण हम चीनी, जापानी, रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन और हिस्पानी जैसी भाषायें भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते | यही नहीं हम तो अपने देश के अलग अलग राज्यों की भाषाए भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते है | हमने अपना संसार बहुत छोटा कर लिया है | यदि हम हमारे बच्चो को अंग्रेजी के साथ साथ अन्य प्रमुख देसी और विदेशी भाषायें सीखने की छूट दे देते तो भारत अपने व्यापार और कूटनीति में अब तक संसार का अग्रणी देश बन जाता |
ज़रा ध्यान दीजिये! यहाँ मैंने छूट देने की बात कही है, थोपने की नहीं | भारत में अनेक विदेशी भाषाए जम कर पढाई जानी चाहिए, जैसी की आजकल चीन में पढाई जा रही है | चीनी लोग अंग्रेजी की गुलामी नहीं कर रहे है, उसे अपना गुलाम बना कर उस से अपना काम निकाल रहे है | अमेरिका में चीनियों की संख्या भारतीयों से भी ज्यादा है | उनके लिए अंग्रेजी महारानी नहीं नौकरानी है | हमने अंग्रेजी को महारानी बना रखा है |
इसलिए 15 करोड़ बच्चो पर हम उसे थोप देते है और एक करोड़ बच्चो से कहते है की तुम्हे जो सीखना हो, वह अंग्रेजी माध्यम से ही सीखो | किसी भी विदेशी भाषा को पढाई का माध्यम बनाना अक्ल के साथ दुश्मनी है | इस पर संवैधानिक प्रतिबन्ध लगना चाहिए | कौन लगायेगा यह प्रतिबन्ध? हमारे सारे नेतागण तो कुर्सी और पैसे के खेल में पगला रहे है |
उन्हें इन बुनियादी सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है | यह काम देश के प्रबुद्ध जन को ही करना होगा | अगर वे कोई ज़बरदस्त जन अभियान चला दे तो अपने देश के बच्चो का बड़ा कल्याण होगा और नेतागण तो अपने आप उसके पीछे चले आयेंगे |
Sunday, March 1, 2009
एकता की मजबूत कड़ी
परदेस में रहते हुए अपने देश को देखने-समझने की कई बार नई दृष्टि मिलती है। अमेरिका में कई अच्छी चीजें है, जिनमें सबसे प्रमुख है वहां के लोगों की राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय चेतना। उनकी यह भावना हमें अपनी स्थिति पर सोचने के लिए विवश और प्रेरित करती है। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके लिए सजग रूप से प्रयास करना पड़ता है और जिसमें बुद्धिजीवियों और नेतृत्व वर्ग की बड़ी भूमिका होती है। हमारा नेतृत्व और अभिजन वर्ग कभी भी इसके लिए बहुत गंभीर नहीं रहा। उसकी दृष्टि हमेशा संकीर्ण रही। हमारी राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्वों में एक है हमारे देश में अनेक भाषाओं का होना। महात्मा गांधी, तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि स्वाधीनता संग्राम के महानायकों ने समझ लिया था कि देश की एकता तब तक नहींहो सकती है जब तक वाणी या भाषा की एकता न हो जाए। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, स्पेन, जापान, चीन आदि देशों में एक मुख्य भाषा है जिसने पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। यह सुविधा अपने देश में नहीं है। हम बहुरंगी भाषा-संस्कृति वाले देश हैं, जो कई बार हमारी सीमा बन जाती है और राष्ट्रीय एकात्मकता नहीं हो पाती है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण अमेरिका में दिखता है। जब विभिन्न देशों के लोग आपस में मिलते है तो वे अपनी राष्ट्र भाषाओं में बात करते है। हम भारतीय उन विरले लोगों में है जो विदेश में भी परस्पर अपनी राष्ट्रभाषा में न बात कर अंग्रेजी में बात करते है और दूसरों की नजर में हास्यास्पद और नीचे हो जाते है। विदेशी लोग सोचते है कि प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का दावा करने वाले इस देश के पास क्या अपनी कोई भाषा नही है? आजादी के साठ साल के बाद भी हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को वह स्थान क्यों नहीं दिला पाए हैं जिसकी वह हकदार है? ऐसा क्यों है, इसको समझने के लिए हमें अपने देश की अब तक की भाषा नीति को समझना होगा।
जब 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना था, तब इसने भाषा-शिक्षा के लिए संघ सरकार से एक नीति निर्धारित करने के लिए कहा। इसके तहत आल इंडिया एजूकेशन काउंसिल की स्थापना की गई, जिसने सितंबर 1956 में अपनी अनुसंशाएं सौंप दी। इस रपट में त्रि-भाषा का फार्मूला सुझाया गया। इसके अनुसार हर राज्य में सेकेंडरी स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा , गैर-हिंदी भाषी राज्यों में वहां की क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। मुख्यमंत्रियों की एक कांफ्रेंस में इसे स्वीकार भी लिया गया। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस त्रि-भाषा फार्मूला को अपनाने की बात की गई। 1986 की शिक्षा नीति और फिर 1992 में भारतीय संसद की कार्ययोजना में भी इसे शामिल किया गया, पर इसका पूरी तरह से तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में केंद्र सरकार ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकी, दूसरी तरफ राज्यों की उदासीनता की वजह से यह योजना एक तरह से ठंडे बस्ते में रह गई। एक जनवरी, 2000 को नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फार स्कूल एजूकेशन ने इस त्रि-भाषा फार्मूले पर विचार करते हुए यह रेखांकित किया कि कुछ राज्यों ने सिर्फ द्वि-भाषा नीति ही अपनाई तो कुछ ने आधुनिक भारतीय भाषा की जगह क्लासिकल भाषाओं जैसे संस्कृत या अरबी को अपनाया। कुछ बोर्डो और संस्थाओं ने तो हिंदी की जगह फ्रेंच या जर्मन भाषा तक को अनुमति दे दी। इस तरह यह नीति जो एक अच्छी और सुविचारित नीति थी और जो देश को एक सूत्र में बांध सकती थी, केंद्र और राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव में कागजों तक ही सीमित रह गई। इसमें गैर हिंदी भाषी राज्यों की अपेक्षा हिंदी भाषी राज्यों के नेतृत्व और अभिजन वर्ग की ज्यादा जिम्मेदारी थी।
आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के राज्यों में बड़ी संख्या में छात्र हिंदी पढ़ते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमें भी किसी अन्य राज्य की भाषा सीख लेनी चाहिए। अगर हम अपनी प्यारी हिंदी को सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा बनाना चाहते है तो हमें अन्य राज्यों की मानसिकता का भी ख्याल रखना होगा। गैर हिंदी भाषियों के इस तर्क और भय को कि इससे हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, हम उन राज्यों की भाषा सीखकर दूर कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता की चिंता किसको है? कुछ लोगों का यह तर्क कि तीन-तीन भाषाएं सीखना एक मुश्किल कार्य होगा, सही नहीं है, क्योंकि आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के छात्र तीन भाषाएं बिना किसी खास कठिनाई के सीख रहे थे। आज भी केरल जैसे राज्य उदाहरण है, जहां बड़ी संख्या में लोग मलयालम और अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी सीखते और जानते है। हिंदी-इतर राज्य अपने को अलग-थलग महसूस करते है और हमें शंका की दृष्टि से देखते है। अगर हम भी कोई दक्षिण भारतीय या अन्य भाषा सीखते तो वे सहर्ष हिंदी सीखने को तैयार होते और हिंदी सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होती। इसके बल पर हमारी राष्ट्रीय एकता और भी मजबूत होती।
यूरोपीय यूनियन की आधिकारिक भाषा नीति है कि अपने देश की भाषा के अलावा कोई दो अन्य विदेशी भाषा सीखना भी जरूरी है। इससे यूरोप की एकता मजबूत हो रही है। जब एक देश के लोग दूसरे देशों की भाषा सीख सकते है तो अपने देश की एकता के लिए इस नियम को लागू न करना राष्ट्रहित की अनदेखी ही कही जाएगी। अमेरिका जैसे अंग्रेजी वाले देश में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर पर एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। उसके बिना डिग्री नहीं मिल सकती है, लेकिन क्या हिंदी भाषी नेतृत्व और अभिजन वर्ग अपनी हिंदी को उसका हक दिलाने के लिए कोई पहल करने के लिए तैयार है?
[राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करना जरूरी मान रहे हैं निरंजन कुमार]
जब 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना था, तब इसने भाषा-शिक्षा के लिए संघ सरकार से एक नीति निर्धारित करने के लिए कहा। इसके तहत आल इंडिया एजूकेशन काउंसिल की स्थापना की गई, जिसने सितंबर 1956 में अपनी अनुसंशाएं सौंप दी। इस रपट में त्रि-भाषा का फार्मूला सुझाया गया। इसके अनुसार हर राज्य में सेकेंडरी स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा , गैर-हिंदी भाषी राज्यों में वहां की क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। मुख्यमंत्रियों की एक कांफ्रेंस में इसे स्वीकार भी लिया गया। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस त्रि-भाषा फार्मूला को अपनाने की बात की गई। 1986 की शिक्षा नीति और फिर 1992 में भारतीय संसद की कार्ययोजना में भी इसे शामिल किया गया, पर इसका पूरी तरह से तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में केंद्र सरकार ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकी, दूसरी तरफ राज्यों की उदासीनता की वजह से यह योजना एक तरह से ठंडे बस्ते में रह गई। एक जनवरी, 2000 को नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फार स्कूल एजूकेशन ने इस त्रि-भाषा फार्मूले पर विचार करते हुए यह रेखांकित किया कि कुछ राज्यों ने सिर्फ द्वि-भाषा नीति ही अपनाई तो कुछ ने आधुनिक भारतीय भाषा की जगह क्लासिकल भाषाओं जैसे संस्कृत या अरबी को अपनाया। कुछ बोर्डो और संस्थाओं ने तो हिंदी की जगह फ्रेंच या जर्मन भाषा तक को अनुमति दे दी। इस तरह यह नीति जो एक अच्छी और सुविचारित नीति थी और जो देश को एक सूत्र में बांध सकती थी, केंद्र और राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव में कागजों तक ही सीमित रह गई। इसमें गैर हिंदी भाषी राज्यों की अपेक्षा हिंदी भाषी राज्यों के नेतृत्व और अभिजन वर्ग की ज्यादा जिम्मेदारी थी।
आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के राज्यों में बड़ी संख्या में छात्र हिंदी पढ़ते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमें भी किसी अन्य राज्य की भाषा सीख लेनी चाहिए। अगर हम अपनी प्यारी हिंदी को सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा बनाना चाहते है तो हमें अन्य राज्यों की मानसिकता का भी ख्याल रखना होगा। गैर हिंदी भाषियों के इस तर्क और भय को कि इससे हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, हम उन राज्यों की भाषा सीखकर दूर कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता की चिंता किसको है? कुछ लोगों का यह तर्क कि तीन-तीन भाषाएं सीखना एक मुश्किल कार्य होगा, सही नहीं है, क्योंकि आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के छात्र तीन भाषाएं बिना किसी खास कठिनाई के सीख रहे थे। आज भी केरल जैसे राज्य उदाहरण है, जहां बड़ी संख्या में लोग मलयालम और अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी सीखते और जानते है। हिंदी-इतर राज्य अपने को अलग-थलग महसूस करते है और हमें शंका की दृष्टि से देखते है। अगर हम भी कोई दक्षिण भारतीय या अन्य भाषा सीखते तो वे सहर्ष हिंदी सीखने को तैयार होते और हिंदी सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होती। इसके बल पर हमारी राष्ट्रीय एकता और भी मजबूत होती।
यूरोपीय यूनियन की आधिकारिक भाषा नीति है कि अपने देश की भाषा के अलावा कोई दो अन्य विदेशी भाषा सीखना भी जरूरी है। इससे यूरोप की एकता मजबूत हो रही है। जब एक देश के लोग दूसरे देशों की भाषा सीख सकते है तो अपने देश की एकता के लिए इस नियम को लागू न करना राष्ट्रहित की अनदेखी ही कही जाएगी। अमेरिका जैसे अंग्रेजी वाले देश में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर पर एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। उसके बिना डिग्री नहीं मिल सकती है, लेकिन क्या हिंदी भाषी नेतृत्व और अभिजन वर्ग अपनी हिंदी को उसका हक दिलाने के लिए कोई पहल करने के लिए तैयार है?
[राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करना जरूरी मान रहे हैं निरंजन कुमार]
Sunday, February 8, 2009
सत्यम जैसे घोटाले रोकने की जरूरत
सत्यम कांड को प्रकाश में आए कुछ हफ्ते बीत चुके हैं, पर आम निवेशक अब तक यह बात साफ तौर पर समझ पाने में असफल है कि आखिर इसमें घोटाला क्या हुआ है। आम निवेशक ही नहीं, ऐसे मामलों में विशेषज्ञ कोटि की जानकारी रखने वालों को भी इस बारे में अब तक ज्यादा कुछ मालूम नहीं चल पाया है।
सत्यम कांड से पहले हमारा देश ऐसे ही घपले-घोटाले वाला हर्षद मेहता प्रकरण देख चुका है। पर 1992 के हर्षद मेहता घोटाले पर कायदे की केस स्टडी, किताबें या शोध अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। वित्तीय प्रबंधन के छात्रों को यह समझाना मुश्किल है कि उस घोटाले में कौन सी प्रक्रियागत, नीतिगत और प्रशासनिक चूकें हुई थीं। वैसी संस्थागत तैयारियां कहीं भी नहीं दिखाई पड़तीं, जिनसे आम निवेशक ऐसे मसलों को समझ पाए, जबकि इनमें ज्यादातर धन तो उसी का डूबता है।
आज वैसे तो कई टीवी चैनल और वेबसाइटें हैं, जो आम निवेशकों को यह राय देती हैं कि फलाना शेयरों में निवेश से फायदा होगा। नुकसान हो जाए, तो फिर बताते हैं कि अब इन नए शेयरों में निवेश करो। लेकिन इस पर चर्चा आम तौर पर नहीं होती कि शेयर बाजार में निवेश के क्या जोखिम हैं और आखिर कोई शेयर कुछ ही दिनों में पांच सौ से दस रुपये का कैसे हो जाता है। दरअसल, इसमें किसी की दिलचस्पी भी नहीं है।
एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था की नींव में मजबूत वित्तीय साक्षरता की बड़ी भूमिका होती है। इसीलिए आज का सच यह है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बहसें करने और किसी कंपनी में स्वतंत्र निदेशकों के हाथ मजबूत करने की बात करने के बावजूद, जब तक आम निवेशक को अपने हित और अपने दायित्वों का पता नहीं होगा, तब तक सत्यम जैसे घोटालों का सिलसिला रोका नहीं जा सकता।
किसी भी कंपनी में निदेशक मूलत: तीन तरह के होते हैं। सबसे ज्यादा और सबसे महत्वपूर्ण निदेशक प्रवर्तक समूह के होते हैं, यानी वे जिन्होंने कंपनी बनाई है। दूसरे निदेशक वे होते हैं, जो महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों से आते हैं, जैसे एलआईसी, जीआईसी, यूटीआई वगैरह से। तीसरी श्रेणी में स्वतंत्र निदेशक होते हैं, जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे स्वतंत्र रूप से और नि:स्वार्थ भाव से कंपनी के निदेशकों की कारगुजारियों पर नजर रखेंगे।
पर सच यह है कि स्वतंत्र निदेशक किसी भी कंपनी में स्वतंत्र नहीं होते, हो भी नहीं सकते। जो भी इन स्वतंत्र निदेशकों को कंपनी में लेकर आता है, उनके प्रति इनकी यह अलिखित जिम्मेदारी बनती है कि वे उनकी कंपनी के लिए कड़े सवाल खड़े नहीं करेंगे। शर्त यही है कि आप हमें आगे भी निदेशक बनाते रहें। इस आपसी समझदारी के तहत कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक बैठे हुए हैं। इसलिए कह सकते हैं कि देश में अभी कई सत्यम घोटालों का सामने आना बाकी है।
नियमों के तहत सत्यम कंपनी में भी स्वतंत्र निदेशक थे। इनमें से एक शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। दूसरे केंद्र सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे। एक और टॉप इंडियन बिजनेस स्कूल के डीन थे। पर ये न तो सत्यम में कुछ भी गलत होते हुए देख पाए और न ही घोटालों को रोक पाए। क्यों? इस सवाल का जवाब यह है कि गतिविधियां ज्ञान से नहीं, स्वार्थ से संचालित होती हैं। स्वतंत्र निदेशक का किसी कंपनी में क्या स्वार्थ हो सकता है? विदेशी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब को कई करोड़ के प्रोजेक्ट सत्यम से मिले थे।
यहां सवाल यह भी है कि कोई बड़ा जानकार अपना समय और ऊर्जा किसी कंपनी के खातों की जांच में क्यों लगाएगा? ऐसा तीन सूरतों में संभव है। एक, जब ऐसा करने की साफ तौर पर जवाबदेही हो। दूसरे, उसके वित्तीय हित ऐसी जांच से जुड़े हों। तीसरे, जब वह राष्ट्रीय सामाजिक हित चेतना के भावों से ओतप्रोत हो। तीसरी संभावना की बात फिलहाल नहीं की जा सकती।
पहली स्थिति यानी किसी कंपनी के खातों की जांच-पड़ताल की जवाबदेही, स्वतंत्र निदेशकों की नहीं बनती। उनके वित्तीय हित किसी कंपनी से 'उचित सवाल नहीं पूछने पर' ही सध सकते हैं, पूछने पर नहीं। ऐसी सूरत में करोड़ों के निवेश आखिर छोड़े किसके भरोसे जाते हैं? इसका जवाब यह है कि प्रवर्तकों की भलमनसाहत के भरोसे। लेकिन अगर कोई प्रवर्तक राजू जैसा निकल जाए, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में क्या सेबी ऐक्ट और क्या कंपनी ऐक्ट- ये सब के सब धरे रह जाते हैं।
प्रवर्तकों की ऐसी प्रवृत्ति पर रोक सिर्फ वे हजारों निवेशक और शेयरधारक ही लगा सकते हैं, जिन्हें बतौर शेयरधारक अपने अधिकारों का पता हो और जिन्हें शेयरों से जुड़ी जिम्मेदारियों का अहसास हो। जो कंपनी की सभा में खड़े होकर पूछ सकें कि मिस्टर राजू, आपके खिलाफ इनकम टैक्स के घपलों का मामला क्या है? एक कंपनी में लगे पब्लिक के पैसों को आप अपने बेटों की कंपनी में क्यों लिवाए जा रहे हैं? अभी तो स्थिति यह है कि दस से 15 प्रतिशत शेयर रख कर प्रवर्तक समूह मालिक समूह घोषित हो जाता है। तकनीकी तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी का कोई एक मालिक नहीं होता। जिसके पास दस शेयर भी हैं, वह भी उस कंपनी का आंशिक मालिक होता है। उसके अपने अधिकार हैं, वह अपनी शंकाओं के निवारण के लिए सवाल पूछ सकता है। पर मसला यह है कि ज्यादातर निवेशक यही समझते हैं कि कंपनी का मालिक कोई दस-बीस प्रतिशत शेयर रखने वाला राजू है। हमें क्या? बड़े संस्थागत निवेशक तब तक कुछ नहीं करते, जब तक शेयर भाव ठीकठाक चल रहे हों। उनकी चिंता तब शुरू होती है, जब शेयर डूबने लगते हैं।
जरूरी यह है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध और पब्लिक से पैसा उगाहने वाली हर कंपनी के आंकड़ों और गतिविधियों पर सवाल उठाने के लिए निवेशक वैसे ही जागरूक हों, जैसे स्वस्थ लोकतंत्र के वोटर होते हैं। इसके लिए वित्तीय साक्षरता की मुहिम चलाई जानी चाहिए। इस मुहिम की अपेक्षा तो वैसे हर्षद मेहता घोटाले के बाद ही थी, पर अब सत्यम के घोटाले के बाद निश्चय ही चेत जाना चाहिए। रिजर्व बैंक, सेबी और कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को इस काम में अहम भूमिका निभानी चाहिए।
आलोक पुराणिक
सत्यम कांड से पहले हमारा देश ऐसे ही घपले-घोटाले वाला हर्षद मेहता प्रकरण देख चुका है। पर 1992 के हर्षद मेहता घोटाले पर कायदे की केस स्टडी, किताबें या शोध अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। वित्तीय प्रबंधन के छात्रों को यह समझाना मुश्किल है कि उस घोटाले में कौन सी प्रक्रियागत, नीतिगत और प्रशासनिक चूकें हुई थीं। वैसी संस्थागत तैयारियां कहीं भी नहीं दिखाई पड़तीं, जिनसे आम निवेशक ऐसे मसलों को समझ पाए, जबकि इनमें ज्यादातर धन तो उसी का डूबता है।
आज वैसे तो कई टीवी चैनल और वेबसाइटें हैं, जो आम निवेशकों को यह राय देती हैं कि फलाना शेयरों में निवेश से फायदा होगा। नुकसान हो जाए, तो फिर बताते हैं कि अब इन नए शेयरों में निवेश करो। लेकिन इस पर चर्चा आम तौर पर नहीं होती कि शेयर बाजार में निवेश के क्या जोखिम हैं और आखिर कोई शेयर कुछ ही दिनों में पांच सौ से दस रुपये का कैसे हो जाता है। दरअसल, इसमें किसी की दिलचस्पी भी नहीं है।
एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था की नींव में मजबूत वित्तीय साक्षरता की बड़ी भूमिका होती है। इसीलिए आज का सच यह है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बहसें करने और किसी कंपनी में स्वतंत्र निदेशकों के हाथ मजबूत करने की बात करने के बावजूद, जब तक आम निवेशक को अपने हित और अपने दायित्वों का पता नहीं होगा, तब तक सत्यम जैसे घोटालों का सिलसिला रोका नहीं जा सकता।
किसी भी कंपनी में निदेशक मूलत: तीन तरह के होते हैं। सबसे ज्यादा और सबसे महत्वपूर्ण निदेशक प्रवर्तक समूह के होते हैं, यानी वे जिन्होंने कंपनी बनाई है। दूसरे निदेशक वे होते हैं, जो महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों से आते हैं, जैसे एलआईसी, जीआईसी, यूटीआई वगैरह से। तीसरी श्रेणी में स्वतंत्र निदेशक होते हैं, जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे स्वतंत्र रूप से और नि:स्वार्थ भाव से कंपनी के निदेशकों की कारगुजारियों पर नजर रखेंगे।
पर सच यह है कि स्वतंत्र निदेशक किसी भी कंपनी में स्वतंत्र नहीं होते, हो भी नहीं सकते। जो भी इन स्वतंत्र निदेशकों को कंपनी में लेकर आता है, उनके प्रति इनकी यह अलिखित जिम्मेदारी बनती है कि वे उनकी कंपनी के लिए कड़े सवाल खड़े नहीं करेंगे। शर्त यही है कि आप हमें आगे भी निदेशक बनाते रहें। इस आपसी समझदारी के तहत कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक बैठे हुए हैं। इसलिए कह सकते हैं कि देश में अभी कई सत्यम घोटालों का सामने आना बाकी है।
नियमों के तहत सत्यम कंपनी में भी स्वतंत्र निदेशक थे। इनमें से एक शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। दूसरे केंद्र सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे। एक और टॉप इंडियन बिजनेस स्कूल के डीन थे। पर ये न तो सत्यम में कुछ भी गलत होते हुए देख पाए और न ही घोटालों को रोक पाए। क्यों? इस सवाल का जवाब यह है कि गतिविधियां ज्ञान से नहीं, स्वार्थ से संचालित होती हैं। स्वतंत्र निदेशक का किसी कंपनी में क्या स्वार्थ हो सकता है? विदेशी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब को कई करोड़ के प्रोजेक्ट सत्यम से मिले थे।
यहां सवाल यह भी है कि कोई बड़ा जानकार अपना समय और ऊर्जा किसी कंपनी के खातों की जांच में क्यों लगाएगा? ऐसा तीन सूरतों में संभव है। एक, जब ऐसा करने की साफ तौर पर जवाबदेही हो। दूसरे, उसके वित्तीय हित ऐसी जांच से जुड़े हों। तीसरे, जब वह राष्ट्रीय सामाजिक हित चेतना के भावों से ओतप्रोत हो। तीसरी संभावना की बात फिलहाल नहीं की जा सकती।
पहली स्थिति यानी किसी कंपनी के खातों की जांच-पड़ताल की जवाबदेही, स्वतंत्र निदेशकों की नहीं बनती। उनके वित्तीय हित किसी कंपनी से 'उचित सवाल नहीं पूछने पर' ही सध सकते हैं, पूछने पर नहीं। ऐसी सूरत में करोड़ों के निवेश आखिर छोड़े किसके भरोसे जाते हैं? इसका जवाब यह है कि प्रवर्तकों की भलमनसाहत के भरोसे। लेकिन अगर कोई प्रवर्तक राजू जैसा निकल जाए, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में क्या सेबी ऐक्ट और क्या कंपनी ऐक्ट- ये सब के सब धरे रह जाते हैं।
प्रवर्तकों की ऐसी प्रवृत्ति पर रोक सिर्फ वे हजारों निवेशक और शेयरधारक ही लगा सकते हैं, जिन्हें बतौर शेयरधारक अपने अधिकारों का पता हो और जिन्हें शेयरों से जुड़ी जिम्मेदारियों का अहसास हो। जो कंपनी की सभा में खड़े होकर पूछ सकें कि मिस्टर राजू, आपके खिलाफ इनकम टैक्स के घपलों का मामला क्या है? एक कंपनी में लगे पब्लिक के पैसों को आप अपने बेटों की कंपनी में क्यों लिवाए जा रहे हैं? अभी तो स्थिति यह है कि दस से 15 प्रतिशत शेयर रख कर प्रवर्तक समूह मालिक समूह घोषित हो जाता है। तकनीकी तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी का कोई एक मालिक नहीं होता। जिसके पास दस शेयर भी हैं, वह भी उस कंपनी का आंशिक मालिक होता है। उसके अपने अधिकार हैं, वह अपनी शंकाओं के निवारण के लिए सवाल पूछ सकता है। पर मसला यह है कि ज्यादातर निवेशक यही समझते हैं कि कंपनी का मालिक कोई दस-बीस प्रतिशत शेयर रखने वाला राजू है। हमें क्या? बड़े संस्थागत निवेशक तब तक कुछ नहीं करते, जब तक शेयर भाव ठीकठाक चल रहे हों। उनकी चिंता तब शुरू होती है, जब शेयर डूबने लगते हैं।
जरूरी यह है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध और पब्लिक से पैसा उगाहने वाली हर कंपनी के आंकड़ों और गतिविधियों पर सवाल उठाने के लिए निवेशक वैसे ही जागरूक हों, जैसे स्वस्थ लोकतंत्र के वोटर होते हैं। इसके लिए वित्तीय साक्षरता की मुहिम चलाई जानी चाहिए। इस मुहिम की अपेक्षा तो वैसे हर्षद मेहता घोटाले के बाद ही थी, पर अब सत्यम के घोटाले के बाद निश्चय ही चेत जाना चाहिए। रिजर्व बैंक, सेबी और कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को इस काम में अहम भूमिका निभानी चाहिए।
आलोक पुराणिक
Thursday, February 5, 2009
उनका और हमारा प्रजातंत्र
कोई भी समस्या हो, हम अमेरिका की ओर निहारते है। अमेरिकी लोग जिद के पक्के होते हैं और उनका यह स्वभाव वहां के प्रजातंत्र में झलकता है। बराक ओबामा के बच्चों के स्कूल पांच जनवरी से खुल रहे थे। इसलिए उन्होंने बुश प्रशासन से अस्थाई निवास आवंटित कराने का अनुग्रह किया, लेकिन प्रशासन ने वाशिंगटन में कोई भी सरकारी आवास आवंटित करने में असमर्थता जता दी। एक राज्य के गवर्नर टेलीफोन पर एक प्रत्याशी से सीनेट में नामांकित करने के लिए कुछ अनुग्रह कर थे कि तभी एफबीआई ने उनको गिरफ्तार कर लिया। आठ वर्ष राष्ट्रपति रहने के पश्चात जब बिल क्लिंटन अपने निवास लौटे तो सामान बांधने वालों ने भूलवश एक सोफा उनके सामान के साथ बांध दिया। इस कारण उन्हे 3600 डालर भरने पड़े। उपराष्ट्रपति डिक चेनी को विलंब से आने के कारण सीनेट के सदस्यों का कोपभाजन बनना पड़ा। उनके विलंब से आने का कारण यह था कि उन्हें पार्किग शुल्क जमा करने के लिए लाइन में लगना पड़ा था। राष्ट्रपति द्वारा मंत्रियों की नियुक्ति प्रस्तावित करने के बाद सीनेट की कमेटी जब तक उनकी बखिया नहीं उधेड़ लेती तब तक उनकी नियुक्ति नहीं होती।
न्यूजर्सी के गवर्नर को अपने मातहत के साथ समलैगिंक संबंधों और एक सीनेटर को कालगर्ल से मित्रता के कारण अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा। यह तो रहा इन लोगों का प्रजातंत्र। अब एक बानगी विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की देखिए। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री का राजकीय निवास कालिदास मार्ग पर है। इसके अतिरिक्त भूतपूर्व मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा आवास माल एवेन्यू में है, जिसका हमेशा विस्तार होता रहता है। तीसरा निवास दिल्ली में है। इसके अतिरिक्त एक विशाल निजी निवास लखनऊ कैंट में है। राजकीय नियमों के अनुसार किसी भी राजकीय पदाधिकारी को एक से अधिक निवास आवंटित नहीं हो सकता। यही नहीं, नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव-सबको एक सरकारी आवास लखनऊ में भूतपूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते तथा दूसरा दिल्ली में आवंटित है। नौकरशाह और अन्य राजनेता भी पीछे नहीं है, जो सेवानिवृत्ति के पश्चात भी सरकारी बंगलों का मोह नहीं त्याग पाते। यह स्थिति तब है जब एक व्यक्ति को एक से अधिक आवास आवंटित न करने का सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। यदि बुश प्रशासन हमसे कुछ सबक सीख सकता तो बेचारे ओबामा को होटल में रोजाना 1200 डालर खर्च न करने पड़ते। इस मामले में हम अमेरिका से बहुत आगे है। हमारी हर राजनीतिक पार्टी ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विजयी संभावना का आकलन कर टिकटों का मूल्य निर्धारित कर रखा हैं। जो मूल्य चुकाएगा वह टिकट पाएगा। लाखों और करोड़ों रुपये की दरे है। उसके पश्चात भी यह आवश्यक नहीं टिकटधारी चुनाव में विजयी हो जाए। राज्य की राजनीति में सक्रिय नेताओं को भी चिंता की कोई बात नहीं। सरकार भी तो उनके हीपुण्य प्रतापों का फल है। डाक बंगलों की चादरे, तौलिए, क्राकरी तथा सरकारी बंगलों का फर्नीचर, एयर कंडीशनर, स्टेशनरी आदि भी तो नेताओं की निजी संपत्ति ही हैं। गुंडों और माफिया तत्वों के लिए भी राजनीति में भरपूर अवसर हैं। उत्तर प्रदेश में जेल में बंद एक नेता को शायद माफियाओं के प्रतिनिधि के रूप में शपथ लेने सीधे जेल से राजभवन लाया गया था, जबकि वह कोई राजनीतिक अपराधी नहीं, बल्कि हत्या के अपराध में बंदी था। आने वाले चुनाव में नामी-गिरामी माफियाओं के आकाओं को अपनी-अपनी पार्टी से टिकट देने की होड़ लगी है। इन सब पार्टियों का लक्ष्य मात्र संसद में संख्या वृद्धि करना है, न कि स्वच्छ प्रतिनिधित्व या जनसेवा। वैसे भी जीतकर जब शासन की डोर हाथ में आ जाती है तो जनसेवा तो वैसे ही बिना धन सेवा के प्राप्त नहीं होती। फिर आदर्श जनसेवकों को चुनने से क्या लाभ? हमारे मतदाता भी अब दमदार प्रत्याशी को ही अपना मत देते है। जो जितना बड़ा माफिया है उसके विजयी होने के अवसर उतने अधिक है। इसीलिए आम भारतीय को परिणिता से ज्यादा गजनी फिल्म भाती है। पुलिस भी एक साधारण मामले की रपट तभी लिखती है जब किसी माफिया का प्यादा उसके साथ थाने जाए। उनका वर्चस्व इतना है कि वे जेल की चहारदीवारियों के अंदर से चुनाव धड़ल्ले से जीतते है। यदि सिर्फ एक राज्य उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो पिछली विधानसभा में 207 दागी विजयी हुए थे। इस बार कुछ सुधार हुआ है और मात्र 155 दागी ही विधायक बनकर आए। कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल में 19 दागी मंत्री थे। अब यह संख्या 22 हो गई है। जैसे आसार नजर आ रहे है, अगले चुनाव में उतरने वाले आपराधिक छवि और इतिहास वाले लोगों की संख्या बढ़ने की संभावना है।
यह विडंबना ही है कि जार्ज बुश के साथ हमारे राष्ट्र के इतने अच्छे संबंध होने के पश्चात भी हम अमेरिका से यह नहीं सीख सके कि सार्वजनिक पदों पर रहने वाले लोगों को कितना साफ-सुथरा जीवन बिताना चाहिए। यदि रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल करने के भारतीय राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों को अपना लिया होता तो उसकी पराजय नहीं होती। बुश ने सभ्य, भले तथा युद्ध के नामी योद्धा जान मैक्केन को चुनावी जंग में उतारा। यदि किसी माफिया को उतारा गया होता तो शायद उसकी यह फजीहत नहीं होती। चुनाव भी उन्होंने घिसे-पिटे मुद्दों पर लड़ा, जैसे आर्थिक व्यवस्था का ह्रास, प्रदूषण, र्इंधन के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा आदि। उन्होंने न कंबल बांटे, न साइकिल और शराब को छुआ। ऐसे में भला इस युग में कोई चुनाव जीत सकता है? हमारे मतदाताओं को अपने स्वर्णिम वोट का एक सुनहरा अवसर कुछ ही महीनों में फिर मिलने लगा है। इस बार देखते है कि वह किस प्रजातंत्र का वरण करते है? उसका जो अमेरिका वालों ने चुना है या वह जो हमारे यहां बाहुबल से संचालित होता है? प्रतीक्षा कर अनुभव करने की बात है।
[हरीशचंद्र पंत राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी हैं]
न्यूजर्सी के गवर्नर को अपने मातहत के साथ समलैगिंक संबंधों और एक सीनेटर को कालगर्ल से मित्रता के कारण अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा। यह तो रहा इन लोगों का प्रजातंत्र। अब एक बानगी विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की देखिए। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री का राजकीय निवास कालिदास मार्ग पर है। इसके अतिरिक्त भूतपूर्व मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा आवास माल एवेन्यू में है, जिसका हमेशा विस्तार होता रहता है। तीसरा निवास दिल्ली में है। इसके अतिरिक्त एक विशाल निजी निवास लखनऊ कैंट में है। राजकीय नियमों के अनुसार किसी भी राजकीय पदाधिकारी को एक से अधिक निवास आवंटित नहीं हो सकता। यही नहीं, नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव-सबको एक सरकारी आवास लखनऊ में भूतपूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते तथा दूसरा दिल्ली में आवंटित है। नौकरशाह और अन्य राजनेता भी पीछे नहीं है, जो सेवानिवृत्ति के पश्चात भी सरकारी बंगलों का मोह नहीं त्याग पाते। यह स्थिति तब है जब एक व्यक्ति को एक से अधिक आवास आवंटित न करने का सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। यदि बुश प्रशासन हमसे कुछ सबक सीख सकता तो बेचारे ओबामा को होटल में रोजाना 1200 डालर खर्च न करने पड़ते। इस मामले में हम अमेरिका से बहुत आगे है। हमारी हर राजनीतिक पार्टी ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विजयी संभावना का आकलन कर टिकटों का मूल्य निर्धारित कर रखा हैं। जो मूल्य चुकाएगा वह टिकट पाएगा। लाखों और करोड़ों रुपये की दरे है। उसके पश्चात भी यह आवश्यक नहीं टिकटधारी चुनाव में विजयी हो जाए। राज्य की राजनीति में सक्रिय नेताओं को भी चिंता की कोई बात नहीं। सरकार भी तो उनके हीपुण्य प्रतापों का फल है। डाक बंगलों की चादरे, तौलिए, क्राकरी तथा सरकारी बंगलों का फर्नीचर, एयर कंडीशनर, स्टेशनरी आदि भी तो नेताओं की निजी संपत्ति ही हैं। गुंडों और माफिया तत्वों के लिए भी राजनीति में भरपूर अवसर हैं। उत्तर प्रदेश में जेल में बंद एक नेता को शायद माफियाओं के प्रतिनिधि के रूप में शपथ लेने सीधे जेल से राजभवन लाया गया था, जबकि वह कोई राजनीतिक अपराधी नहीं, बल्कि हत्या के अपराध में बंदी था। आने वाले चुनाव में नामी-गिरामी माफियाओं के आकाओं को अपनी-अपनी पार्टी से टिकट देने की होड़ लगी है। इन सब पार्टियों का लक्ष्य मात्र संसद में संख्या वृद्धि करना है, न कि स्वच्छ प्रतिनिधित्व या जनसेवा। वैसे भी जीतकर जब शासन की डोर हाथ में आ जाती है तो जनसेवा तो वैसे ही बिना धन सेवा के प्राप्त नहीं होती। फिर आदर्श जनसेवकों को चुनने से क्या लाभ? हमारे मतदाता भी अब दमदार प्रत्याशी को ही अपना मत देते है। जो जितना बड़ा माफिया है उसके विजयी होने के अवसर उतने अधिक है। इसीलिए आम भारतीय को परिणिता से ज्यादा गजनी फिल्म भाती है। पुलिस भी एक साधारण मामले की रपट तभी लिखती है जब किसी माफिया का प्यादा उसके साथ थाने जाए। उनका वर्चस्व इतना है कि वे जेल की चहारदीवारियों के अंदर से चुनाव धड़ल्ले से जीतते है। यदि सिर्फ एक राज्य उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो पिछली विधानसभा में 207 दागी विजयी हुए थे। इस बार कुछ सुधार हुआ है और मात्र 155 दागी ही विधायक बनकर आए। कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल में 19 दागी मंत्री थे। अब यह संख्या 22 हो गई है। जैसे आसार नजर आ रहे है, अगले चुनाव में उतरने वाले आपराधिक छवि और इतिहास वाले लोगों की संख्या बढ़ने की संभावना है।
यह विडंबना ही है कि जार्ज बुश के साथ हमारे राष्ट्र के इतने अच्छे संबंध होने के पश्चात भी हम अमेरिका से यह नहीं सीख सके कि सार्वजनिक पदों पर रहने वाले लोगों को कितना साफ-सुथरा जीवन बिताना चाहिए। यदि रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल करने के भारतीय राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों को अपना लिया होता तो उसकी पराजय नहीं होती। बुश ने सभ्य, भले तथा युद्ध के नामी योद्धा जान मैक्केन को चुनावी जंग में उतारा। यदि किसी माफिया को उतारा गया होता तो शायद उसकी यह फजीहत नहीं होती। चुनाव भी उन्होंने घिसे-पिटे मुद्दों पर लड़ा, जैसे आर्थिक व्यवस्था का ह्रास, प्रदूषण, र्इंधन के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा आदि। उन्होंने न कंबल बांटे, न साइकिल और शराब को छुआ। ऐसे में भला इस युग में कोई चुनाव जीत सकता है? हमारे मतदाताओं को अपने स्वर्णिम वोट का एक सुनहरा अवसर कुछ ही महीनों में फिर मिलने लगा है। इस बार देखते है कि वह किस प्रजातंत्र का वरण करते है? उसका जो अमेरिका वालों ने चुना है या वह जो हमारे यहां बाहुबल से संचालित होता है? प्रतीक्षा कर अनुभव करने की बात है।
[हरीशचंद्र पंत राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी हैं]
Thursday, January 29, 2009
गरीबी की नुमाइश
ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड उत्तर प्रदेश में अमेठी के एक गांव सेमरा में दलित विधवा के घर ग्रामीण भारत की गरीबी देखने गए थे। गरीबी जैसे नुमाइश की चीज हो या जैसे कि यह कोई भारतीय उद्योग हो। वह अमीरी के प्रतिनिधि हैं। जिस हालत में उस महिला शिवकुमारी की जिंदगी चल रही है उसी हाल में कमोबेश 30 प्रतिशत भारत है। शिवकुमारी ने जैसे-तैसे उन बड़े मेहमानों का स्वागत किया। बहुत से भारतीयों की तरह शिवकुमारी भी नहीं समझ पाई कि उसकी गरीबी और अभाव के जिम्मेदार दरअसल इन्हीं गोरे साहबों के पूर्वज रहे हैं। 1610 में जहांगीर के दरबार में व्यापारियों के रूप में इनका पहला जत्था पहुंचा था। जहांगीर के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी इंग्लैंड के अपराधी प्रवृत्ति के समाज बहिष्कृत दुष्ट नाविकों की संस्था है। 1757 के पहले तक भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में शुमार था। ये दुर्भाग्य की काली छाया लेकर आए। मसाले, दस्तकारी के समान का कारोबार कर उन्होंने अकूत धन कमाया। फिर उनके उद्योगों में पैदा माल को खपाने के लिए स्थानीय उद्योगों का नाश कर भारत को सिर्फ बाजार बना दिया गया। उन्होंने राज्यों को हड़प कर राजस्व की वसूली पर कब्जा किया। भारत से कच्चे माल की आपूर्ति भी उन्होंने अपने हाथ में ले ली। अर्थव्यवस्था का कोई पक्ष ऐसा नहीं था जो उनके शोषण से मुक्त रहा हो। सूदखोरी उन्होंने चलाई। शिवकुमारी के पूर्वज जहांगीर, शाहजहां के जमाने में दस्तकार रहे होंगे या कोई कारोबार करते होंगे। उस जमाने में किसानों, मजदूरों के लिए भी बहुत काम था।
इतिहास गवाह है कि गोरों की कौम ने औद्योगिक क्रांति की सफलता के लिए हिंदुस्तानी दस्तकारों, श्रमिकों का भयंकर शोषण किया था। कपड़ा उद्योग ध्वस्त करने के लिए बताते हैं कि बुनकरों के अंगूठे तक काटे गए। यह सब शिवकुमारी और उसके बच्चों को नहीं मालूम। कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है। वर्तमान शिक्षा में कोई किसान अच्छा किसान, दस्तकार अच्छा दस्तकार, बुनकर अच्छा बुनकर नहीं बनता। हमारी शिक्षा हमें अच्छा ड्राइवर, अच्छा मैकेनिक भी नहीं बनाती। अंग्रेजी पढ़ाई हमें बाबू बनाने के लिए थी। अगर तुम बाबू नहीं बन सके तो किसी काम के न होकर नौकरी तलाश करते हुए बेकार रहोगे। उनके इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने भारत को एक देश बनाया। अंग्रेजी भाषा दी, ज्ञान दिया। ताज्जुब है भारत से तीन गुना बड़ा चीन कैसे बिना अंग्रेजों के एक किए हुए एक देश बना हुआ है? कैसे बिना अंग्रेजी के वे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते जा रहे हैं। भारत से चले जाने के बाद भी वे हममें गुलाम मानसिकता छोड़ गए हैं। अपना इतिहास न जानना इस देश की बड़ी परेशानियों में से एक है। इसीलिए इतिहास से सबक की बात भी नहीं उठती। पता नहीं सेमरा के कितने लोग जानते हैं कि करीब ही स्थित जबरौली और पुरवा में उन्हीं गोरे शोषकों के खिलाफ 1858 में सुल्तानपुर, रायबरेली के लोगों ने अपने राजाओं के नेतृत्व में कितनी जबरदस्त जंग लड़ी थी। सेमरा की गरीबी दिखाने के साथ-साथ मिलिबैंड को वह जंग का मैदान भी दिखाया जाना चाहिए था, जहां नवंबर 1858 में उनके पूर्वजों के खिलाफ राजा बेनी माधव ने शहादत का आखिरी मोर्चा लगाया था। उन्हें वे पीपल और बरगद के वृक्ष भी दिखाए जाने चाहिए थे, विजय के बाद जिन पर लटका कर गर्वाेन्मत्त अंग्रेजों ने सैकड़ों बागियों को सजा-ए-मौत दी थी।
फिर भी उनके अमेठी तक आ जाने का असल मकसद क्या था? व्यक्तिगत रिश्तों के चलते अगर वह निजी यात्रा पर होते तो कोई बात नहीं, लेकिन वह ब्रिटिश मंत्री होकर आए और बाकायदा प्रेस से मुखातिब हुए। अगर कोई विदेशी सरकार का मंत्री यहां आकर दलीय रुझान दिखाता है तो उसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर लिया जाना चाहिए। श्रीमान मिलिबैंड अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह भी कह गए कि मुंबई हमले के आरोपियों पर मुकदमा अगर पाकिस्तान में ही चले कोई हर्ज नहीं है। ब्रिटिश डिप्लोमेसी ने अपना रंग बदल लिया है, यह साफ जाहिर है। उन्हें पाकिस्तान की जरूरत है। पता नहीं हम क्यों इतने मजबूर देश बने हुए हैं? कमजोरियां न सेनाओं में हैं और न हिंदुस्तान के जज्बे में, समस्या तो उस व्यवस्था में है जो इस देश के लायक अपना असल नेता नहीं खोज पा रही है। जब हम नेता खोजते हैं तो राजनीतिक चापलूस हमारे सामने घराने बैठा देते हैं। आज हम गुलाम नहीं हैं, लेकिन इस लंबे दौर में गुलामी का अर्क रिसकर हमारी आत्माओं में जा बसा है। काश! मिलिबैंड शिवकुमारी और सारे भारत से उन अपराधों के लिए क्षमा मांगते जो उनकी कौम ने हम पर किए हैं। उनकी कौम सिराजुद्दौला से लेकर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस तक सबकी गुनाहगार है।
[आर. विक्रम सिंह पूर्व सैन्य अधिकारी हैं]
इतिहास गवाह है कि गोरों की कौम ने औद्योगिक क्रांति की सफलता के लिए हिंदुस्तानी दस्तकारों, श्रमिकों का भयंकर शोषण किया था। कपड़ा उद्योग ध्वस्त करने के लिए बताते हैं कि बुनकरों के अंगूठे तक काटे गए। यह सब शिवकुमारी और उसके बच्चों को नहीं मालूम। कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है। वर्तमान शिक्षा में कोई किसान अच्छा किसान, दस्तकार अच्छा दस्तकार, बुनकर अच्छा बुनकर नहीं बनता। हमारी शिक्षा हमें अच्छा ड्राइवर, अच्छा मैकेनिक भी नहीं बनाती। अंग्रेजी पढ़ाई हमें बाबू बनाने के लिए थी। अगर तुम बाबू नहीं बन सके तो किसी काम के न होकर नौकरी तलाश करते हुए बेकार रहोगे। उनके इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने भारत को एक देश बनाया। अंग्रेजी भाषा दी, ज्ञान दिया। ताज्जुब है भारत से तीन गुना बड़ा चीन कैसे बिना अंग्रेजों के एक किए हुए एक देश बना हुआ है? कैसे बिना अंग्रेजी के वे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते जा रहे हैं। भारत से चले जाने के बाद भी वे हममें गुलाम मानसिकता छोड़ गए हैं। अपना इतिहास न जानना इस देश की बड़ी परेशानियों में से एक है। इसीलिए इतिहास से सबक की बात भी नहीं उठती। पता नहीं सेमरा के कितने लोग जानते हैं कि करीब ही स्थित जबरौली और पुरवा में उन्हीं गोरे शोषकों के खिलाफ 1858 में सुल्तानपुर, रायबरेली के लोगों ने अपने राजाओं के नेतृत्व में कितनी जबरदस्त जंग लड़ी थी। सेमरा की गरीबी दिखाने के साथ-साथ मिलिबैंड को वह जंग का मैदान भी दिखाया जाना चाहिए था, जहां नवंबर 1858 में उनके पूर्वजों के खिलाफ राजा बेनी माधव ने शहादत का आखिरी मोर्चा लगाया था। उन्हें वे पीपल और बरगद के वृक्ष भी दिखाए जाने चाहिए थे, विजय के बाद जिन पर लटका कर गर्वाेन्मत्त अंग्रेजों ने सैकड़ों बागियों को सजा-ए-मौत दी थी।
फिर भी उनके अमेठी तक आ जाने का असल मकसद क्या था? व्यक्तिगत रिश्तों के चलते अगर वह निजी यात्रा पर होते तो कोई बात नहीं, लेकिन वह ब्रिटिश मंत्री होकर आए और बाकायदा प्रेस से मुखातिब हुए। अगर कोई विदेशी सरकार का मंत्री यहां आकर दलीय रुझान दिखाता है तो उसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर लिया जाना चाहिए। श्रीमान मिलिबैंड अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह भी कह गए कि मुंबई हमले के आरोपियों पर मुकदमा अगर पाकिस्तान में ही चले कोई हर्ज नहीं है। ब्रिटिश डिप्लोमेसी ने अपना रंग बदल लिया है, यह साफ जाहिर है। उन्हें पाकिस्तान की जरूरत है। पता नहीं हम क्यों इतने मजबूर देश बने हुए हैं? कमजोरियां न सेनाओं में हैं और न हिंदुस्तान के जज्बे में, समस्या तो उस व्यवस्था में है जो इस देश के लायक अपना असल नेता नहीं खोज पा रही है। जब हम नेता खोजते हैं तो राजनीतिक चापलूस हमारे सामने घराने बैठा देते हैं। आज हम गुलाम नहीं हैं, लेकिन इस लंबे दौर में गुलामी का अर्क रिसकर हमारी आत्माओं में जा बसा है। काश! मिलिबैंड शिवकुमारी और सारे भारत से उन अपराधों के लिए क्षमा मांगते जो उनकी कौम ने हम पर किए हैं। उनकी कौम सिराजुद्दौला से लेकर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस तक सबकी गुनाहगार है।
[आर. विक्रम सिंह पूर्व सैन्य अधिकारी हैं]
Wednesday, December 31, 2008
कश्मीर में किस भारत का चेहरा दिखा?
लोकतंत्र की विडंबना देखिए कि जिस प्रान्त से पांच लाख हिन्दुओं को प्रताड़ित कर निकाल दिया गया और 1947 में मुजफ्फराबाद से बेघर हुए शरणार्थियों को अभी तक मतदान का अधिकार नहीं दिया गया, वहां सिर्फ इसलिए लोकतंत्र की जीत के नारे बुलंद हो रहे हैं क्योंकि भारत से अलग होने की मांग करने वाले गिलानी और उनकी हुर्रियत की अपील पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। असली सवाल तो यह उठता है कि इन चुनावों में जो जीते वे किन मुद्दों पर सफल हुए और उनका भारत की एकता पर क्या दूरगामी परिणाम होगा। क्या नैशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की जीत से कश्मीर घाटी को शेष देश से समरस बनाने की इच्छा रखने वाले भारतीयों का बढ़ेगा क्योंकि उमर और महबूबा ही पिछली सरकार को गिराने के लिए जिम्मेदार रहे थे जिनकी तात्कालिक राजनीति का एक ही नारा था - ‘ अमरनाथ के हिन्दू यात्रियों हेतु श्राइनबोर्ड को एक इंच जमीन नहीं देंगे ' ।
जम्मू के अभूतपूर्व सत्याग्रह ने उनकी जिद पलटवा दी और वहां से बीजेपी के ग्यारह विधायकों की जीत ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में केसरिया पक्ष को पुन महत्वपूर्ण सिद्ध कर दिया। वास्तव में दिल्ली में शीला दीक्षित की तीसरी बार विजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है जम्मू में बीजेपी का गत चुनावों की तुलना में ग्यारह गुना ज्यादा बलशाली होकर लौटना। हांलाकि जम्मू में इस महत्वपूण जीत को सेकुलर मीडिया हल्का करके बता रहा है और कुछ ने तो इसे चिन्ताजनक भी कहा है। परन्तु रोचक तथ्य यह है कि जो मीडिया विश्लेषक बीजेपी की जीत बहुत चिन्ताजनक बता रहे हैं वे जम्मू क्षेत्र में पहली बार मुफ्ती की अलगाववाद समर्थक पार्टी पीडीपी के दो विधायक चुने जाने पर खामोश हैं। उल्लेखनीय है कि अमरनाथ सत्याग्रह के समय महबूबा मुफ्ती और उमर अबदुल्ला एक दूसरे के खिलाफ होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति एक जैसा रुख अपनाए हुए थे। उमर ने लोकसभा में एक ‘ मुसलमान ’ के नाते भाषण देकर सनसनी फैला दी थी और महबूबा मुफ्ती अलगाववादियों का साथ देने वाली ‘ आग्नेय राजनेता ’ के नाते पहचान बना रही थीं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि इन चुनावों में अलगाववादी पूरी तरह हारे हैं। वास्तव में अलगाववादी दलों के थके हुए नेताओं से समर्थकों को मायूसी मिल रही थी और अब उनकी जगह महबूबा और मुफ्ती सईद जैसे नेताओं ने ले ली है जो बेहतर एवं प्रभावी ढंग से अलगाववादियों को बचा सकते हैं।
सत्ता राजनीति के समीकरणों में हिस्सेदारी से उनका दिल्ली की सरकार पर भी प्रभाव ज्यादा रहता है। जहां तक कश्मीर में आतंकवाद के अंत का प्रश्न है, उसमें इन राजनेताओं की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वे आतंकवाद के परिणामों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए आतुर रहते हैं। वर्ना दहशतगर्दी के खिलाफ कश्मीर के राजनीतिक दल क्यों चुप रहते? सिवाय बीजेपी के, किसी भी राजनीतिक दल ने अपने चुनाव प्रचार या घोषणा पत्र में आतंकवाद खत्म करने का जिक्र तक नहीं किया। विडम्बना यह है कि हर क्षेत्र में जम्मू से घनघोर भेदभाव बनाए रखने वालीं पार्टियों को ही जम्मू क्षेत्र में भी बहुमत मिला है। यहां की 37 सीटों पर सिर्फ 11 ही उस बीजेपी की झोली में आयी हैं जो भेदभाव के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतरी थी। जिसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु (जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा श्री लालकृष्ण आडवाणी ने हत्या कहा था) के पीछे भी जम्मू कश्मीर के शेष भारत के साथ समानता के आधार पर विलय की मांग थी। डॉ. मुखर्जी का बलिदान इस कारण हुआ कि जम्मू कश्मीर में तिरंगे की शान बनी रहे और वहां भिन्न विधान, प्रधान व झंडे की जगह सिर्फ तिरंगा फहरे, दो अलग अलग कानून न रहे तथा जम्मू के साथ कश्मीर के घाटी के बहुसंख्यक मुस्लिम भेदभाव न करें। पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें जम्मू में प्रवेश करते ही गिरफ्तार करवा कर श्रीनगर के निशांतबाग के पास एक बगलानुमा मकान में नजरबंदी करवा दिया। उनके पोते उमर अब्दुल्ला उन लोगों के साथ पांच साल सत्ता में रहे जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं।
वक्त जब बदलता है तो राजनीति का चेहरा भी नया बनता है। आज उमर अब्दुल्ला की अनेक कारणों से मीडिया में प्रशंसा की जा रही है। वे युवा है, तेजतर्रार राजनीति के नए चेहरे हैं, कश्मीरी मुश्लिम हैं और भारतीय एकता के बारे में असंदिग्ध विचार रखते आ रहे हैं। उनका व्यक्तित्व करिश्माई है और हालांकि अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर संसद में अपने भाषण के तीखे मुस्लिम तेवरों के कारण उनकी विवादास्पद चर्चा हुई, फिर भी उन्हें महबूबा की तरह अलगाववादी नहीं कहा जा सकता। उमर टीवी चैनलों पर तर्कपूर्ण जोरदार ढंग से अपनी बात रखते हैं और कांग्रेस की नई उभरती पीढ़ी के साथ हम कदम नए जोश और नए ताजगी भरे भविष्य का संकेत देते हैं। जिस पीढ़ी में सचिन पायलट (उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सचिन पायलट का विवाह उमर की सगी बहन सारा से हुआ है और इस विवाह का उमर तथा उनके पिता फारूख ने विरोध व बहिष्कार किया था), ज्योतिरादित्य सिंधिया , मिलिंद देवड़ा और निस्संदेह इन सबके नेता राहुल गांधी आकृष्ट करते हैं। इनके तेवर और परिपक्वता का आने वाले वक्त में पता चलेगा, क्योंकि सत्ता से बाहर का मामला अलग होता है और सत्ता संभालने के बाद मुद्दे संभालना एकदम अलग।
दुख की बात यह है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव विश्लेषण में कहीं भी लद्दाख के चुनावों का जिक्र नहीं हुआ-जिसका क्षेत्रफल घाटी और जम्मू से भी बड़ा है। यहां से चार विधायक चुने गए और आश्चर्यजनक रूप से लद्दाख के लिए केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा मांगने वाले मोर्चे के नेता थुप्तान छेवांग कांग्रेसी उम्मीदवार नवांग रिग्जिन से मात्र डेढ़ हजार मतों से हार गए। आरोप है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए मस्जिदों से फतवे जारी करवाये गए। इससे यहां बौद्व मुस्लिम दूरियां बढ़ने की आशंका होगी।
क्या उमर का श्रीनगर में सत्ता संभालना घाटी में भारत की प्रभुता और वर्चस्व के साथ-साथ शांति और हिन्दुओं की वापसी सुनिश्चित करेगा? या वे भी वक्त बिताने और सम्पदा कमाने का वही काम करेंगे जो उनसे पहले के मुख्यमंत्री करते आए? क्या उमर अब्दुल्ला को कश्मीर की भारत से पृथकता बनाए रखने में अपनी भारतीयता सार्थक होती दिखती है? क्या वे 22 फरवरी 1994 के दिन भारत की संसद के द्वारा पारित उस प्रस्ताव को अपने कमरे में लगाना उचित मानेंगे जिस प्रस्ताव में पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर को वापस लेने का संकल्प किया गया है? क्या उमर सिर्फ मुस्लिम पृथकतावादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जैसे - उन्होंने अमरनाथ यात्रा के समय हिन्दुओं को एक इंच जमीन न देने के ऐलान के साथ किया था - कश्मीर में हिन्दु विहीन जम्हूरियत का जश्न मनाएंगे या जम्हूरियत के मायने सबको साथ लेकर देशभक्ति का पाठ सिखाना भी मानेंगे ? यदि उमर उब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने तो उनकी गाड़ी, बंगले और विधानसभा पर दो झंडे फहराए जाएंगे - एक भारत का तिरंगा और दूसरा कश्मीर का हल के निशान वाला लाल झंडा। यदि भारत के दूसरे किसी भी राज्य को अपने पृथक झंडे की आवश्यकता नहीं है तो कश्मीर को क्यों है, यह बात कोई भारतीय कश्मीरी नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा?
ऐसी परिस्थिति में यह समय जम्मू कश्मीर में पुनः उनकी कठिन परीक्षा का है जो डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में हर साल दो बार आयोजन करते हैं और जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के पक्षधर हैं। बीजेपी को 11 स्थान मिले, पर ज्यादा भी मिल सकते थे - अमरनाथ संघर्ष का ज्वार बहुत ऊंचाई तक पहुंचा था। उन्हें सोचना होगा कि पहली बार जम्मू क्षेत्र में पीडीपी का पदार्पण कैसे हुआ? बिस्नाह, डोडा जैसे घायल और नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस की नीतियों से लहुलुहान क्षेत्र उनके हाथ से क्यों फिसले? राजनीति में बीजेपी सत्ता के लिए नहीं, सत्ता के राष्ट्रहित में उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। उस पर जनता का भरोसा नेताओं की व्यक्तिगत छवि से बढ़कर विचारधारा और पूर्वकालीन नेताओं की शहादत के कारण है। यही साख व भरोसा बीजेपी की सबसे बड़ी पूंजी रही है। धर्म, वैभव और सत्ता का अहंकारी चरित्र बाकी दलों के कार्यकर्ताओं में शिकायतें या क्रोध पैदा नहीं करता क्योंकि उनसे सादगी और देशहित में सर्वस्व समर्पण की किसी को उम्मीद नहीं होती। इसलिए जम्मू के समर्थन को सरमाथे पर धरकर भाजपा को डॉ. मुखर्जी के लहू का स्मरण करते हुए ‘ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं ’ वाली नीति के साथ श्रीनगर की रणभूमि में उतरना होगा। तभी कश्मीर घाटी में तिरंगे के रंग में रंगी भारतीयता का दर्शन सुलभ होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
तरुण विजय
जम्मू के अभूतपूर्व सत्याग्रह ने उनकी जिद पलटवा दी और वहां से बीजेपी के ग्यारह विधायकों की जीत ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में केसरिया पक्ष को पुन महत्वपूर्ण सिद्ध कर दिया। वास्तव में दिल्ली में शीला दीक्षित की तीसरी बार विजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है जम्मू में बीजेपी का गत चुनावों की तुलना में ग्यारह गुना ज्यादा बलशाली होकर लौटना। हांलाकि जम्मू में इस महत्वपूण जीत को सेकुलर मीडिया हल्का करके बता रहा है और कुछ ने तो इसे चिन्ताजनक भी कहा है। परन्तु रोचक तथ्य यह है कि जो मीडिया विश्लेषक बीजेपी की जीत बहुत चिन्ताजनक बता रहे हैं वे जम्मू क्षेत्र में पहली बार मुफ्ती की अलगाववाद समर्थक पार्टी पीडीपी के दो विधायक चुने जाने पर खामोश हैं। उल्लेखनीय है कि अमरनाथ सत्याग्रह के समय महबूबा मुफ्ती और उमर अबदुल्ला एक दूसरे के खिलाफ होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति एक जैसा रुख अपनाए हुए थे। उमर ने लोकसभा में एक ‘ मुसलमान ’ के नाते भाषण देकर सनसनी फैला दी थी और महबूबा मुफ्ती अलगाववादियों का साथ देने वाली ‘ आग्नेय राजनेता ’ के नाते पहचान बना रही थीं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि इन चुनावों में अलगाववादी पूरी तरह हारे हैं। वास्तव में अलगाववादी दलों के थके हुए नेताओं से समर्थकों को मायूसी मिल रही थी और अब उनकी जगह महबूबा और मुफ्ती सईद जैसे नेताओं ने ले ली है जो बेहतर एवं प्रभावी ढंग से अलगाववादियों को बचा सकते हैं।
सत्ता राजनीति के समीकरणों में हिस्सेदारी से उनका दिल्ली की सरकार पर भी प्रभाव ज्यादा रहता है। जहां तक कश्मीर में आतंकवाद के अंत का प्रश्न है, उसमें इन राजनेताओं की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वे आतंकवाद के परिणामों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए आतुर रहते हैं। वर्ना दहशतगर्दी के खिलाफ कश्मीर के राजनीतिक दल क्यों चुप रहते? सिवाय बीजेपी के, किसी भी राजनीतिक दल ने अपने चुनाव प्रचार या घोषणा पत्र में आतंकवाद खत्म करने का जिक्र तक नहीं किया। विडम्बना यह है कि हर क्षेत्र में जम्मू से घनघोर भेदभाव बनाए रखने वालीं पार्टियों को ही जम्मू क्षेत्र में भी बहुमत मिला है। यहां की 37 सीटों पर सिर्फ 11 ही उस बीजेपी की झोली में आयी हैं जो भेदभाव के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतरी थी। जिसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु (जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा श्री लालकृष्ण आडवाणी ने हत्या कहा था) के पीछे भी जम्मू कश्मीर के शेष भारत के साथ समानता के आधार पर विलय की मांग थी। डॉ. मुखर्जी का बलिदान इस कारण हुआ कि जम्मू कश्मीर में तिरंगे की शान बनी रहे और वहां भिन्न विधान, प्रधान व झंडे की जगह सिर्फ तिरंगा फहरे, दो अलग अलग कानून न रहे तथा जम्मू के साथ कश्मीर के घाटी के बहुसंख्यक मुस्लिम भेदभाव न करें। पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें जम्मू में प्रवेश करते ही गिरफ्तार करवा कर श्रीनगर के निशांतबाग के पास एक बगलानुमा मकान में नजरबंदी करवा दिया। उनके पोते उमर अब्दुल्ला उन लोगों के साथ पांच साल सत्ता में रहे जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं।
वक्त जब बदलता है तो राजनीति का चेहरा भी नया बनता है। आज उमर अब्दुल्ला की अनेक कारणों से मीडिया में प्रशंसा की जा रही है। वे युवा है, तेजतर्रार राजनीति के नए चेहरे हैं, कश्मीरी मुश्लिम हैं और भारतीय एकता के बारे में असंदिग्ध विचार रखते आ रहे हैं। उनका व्यक्तित्व करिश्माई है और हालांकि अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर संसद में अपने भाषण के तीखे मुस्लिम तेवरों के कारण उनकी विवादास्पद चर्चा हुई, फिर भी उन्हें महबूबा की तरह अलगाववादी नहीं कहा जा सकता। उमर टीवी चैनलों पर तर्कपूर्ण जोरदार ढंग से अपनी बात रखते हैं और कांग्रेस की नई उभरती पीढ़ी के साथ हम कदम नए जोश और नए ताजगी भरे भविष्य का संकेत देते हैं। जिस पीढ़ी में सचिन पायलट (उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सचिन पायलट का विवाह उमर की सगी बहन सारा से हुआ है और इस विवाह का उमर तथा उनके पिता फारूख ने विरोध व बहिष्कार किया था), ज्योतिरादित्य सिंधिया , मिलिंद देवड़ा और निस्संदेह इन सबके नेता राहुल गांधी आकृष्ट करते हैं। इनके तेवर और परिपक्वता का आने वाले वक्त में पता चलेगा, क्योंकि सत्ता से बाहर का मामला अलग होता है और सत्ता संभालने के बाद मुद्दे संभालना एकदम अलग।
दुख की बात यह है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव विश्लेषण में कहीं भी लद्दाख के चुनावों का जिक्र नहीं हुआ-जिसका क्षेत्रफल घाटी और जम्मू से भी बड़ा है। यहां से चार विधायक चुने गए और आश्चर्यजनक रूप से लद्दाख के लिए केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा मांगने वाले मोर्चे के नेता थुप्तान छेवांग कांग्रेसी उम्मीदवार नवांग रिग्जिन से मात्र डेढ़ हजार मतों से हार गए। आरोप है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए मस्जिदों से फतवे जारी करवाये गए। इससे यहां बौद्व मुस्लिम दूरियां बढ़ने की आशंका होगी।
क्या उमर का श्रीनगर में सत्ता संभालना घाटी में भारत की प्रभुता और वर्चस्व के साथ-साथ शांति और हिन्दुओं की वापसी सुनिश्चित करेगा? या वे भी वक्त बिताने और सम्पदा कमाने का वही काम करेंगे जो उनसे पहले के मुख्यमंत्री करते आए? क्या उमर अब्दुल्ला को कश्मीर की भारत से पृथकता बनाए रखने में अपनी भारतीयता सार्थक होती दिखती है? क्या वे 22 फरवरी 1994 के दिन भारत की संसद के द्वारा पारित उस प्रस्ताव को अपने कमरे में लगाना उचित मानेंगे जिस प्रस्ताव में पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर को वापस लेने का संकल्प किया गया है? क्या उमर सिर्फ मुस्लिम पृथकतावादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जैसे - उन्होंने अमरनाथ यात्रा के समय हिन्दुओं को एक इंच जमीन न देने के ऐलान के साथ किया था - कश्मीर में हिन्दु विहीन जम्हूरियत का जश्न मनाएंगे या जम्हूरियत के मायने सबको साथ लेकर देशभक्ति का पाठ सिखाना भी मानेंगे ? यदि उमर उब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने तो उनकी गाड़ी, बंगले और विधानसभा पर दो झंडे फहराए जाएंगे - एक भारत का तिरंगा और दूसरा कश्मीर का हल के निशान वाला लाल झंडा। यदि भारत के दूसरे किसी भी राज्य को अपने पृथक झंडे की आवश्यकता नहीं है तो कश्मीर को क्यों है, यह बात कोई भारतीय कश्मीरी नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा?
ऐसी परिस्थिति में यह समय जम्मू कश्मीर में पुनः उनकी कठिन परीक्षा का है जो डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में हर साल दो बार आयोजन करते हैं और जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के पक्षधर हैं। बीजेपी को 11 स्थान मिले, पर ज्यादा भी मिल सकते थे - अमरनाथ संघर्ष का ज्वार बहुत ऊंचाई तक पहुंचा था। उन्हें सोचना होगा कि पहली बार जम्मू क्षेत्र में पीडीपी का पदार्पण कैसे हुआ? बिस्नाह, डोडा जैसे घायल और नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस की नीतियों से लहुलुहान क्षेत्र उनके हाथ से क्यों फिसले? राजनीति में बीजेपी सत्ता के लिए नहीं, सत्ता के राष्ट्रहित में उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। उस पर जनता का भरोसा नेताओं की व्यक्तिगत छवि से बढ़कर विचारधारा और पूर्वकालीन नेताओं की शहादत के कारण है। यही साख व भरोसा बीजेपी की सबसे बड़ी पूंजी रही है। धर्म, वैभव और सत्ता का अहंकारी चरित्र बाकी दलों के कार्यकर्ताओं में शिकायतें या क्रोध पैदा नहीं करता क्योंकि उनसे सादगी और देशहित में सर्वस्व समर्पण की किसी को उम्मीद नहीं होती। इसलिए जम्मू के समर्थन को सरमाथे पर धरकर भाजपा को डॉ. मुखर्जी के लहू का स्मरण करते हुए ‘ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं ’ वाली नीति के साथ श्रीनगर की रणभूमि में उतरना होगा। तभी कश्मीर घाटी में तिरंगे के रंग में रंगी भारतीयता का दर्शन सुलभ होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
तरुण विजय
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