क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से आ रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!
Sunday, November 22, 2009
Thursday, November 19, 2009
अंग्रेजी की चक्की में क्यों पिसे बच्चे
डा. वेद प्रताप वैदिक
भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने में अंग्रेजी के अखबार विशेष भूमिका निभाते है | भारत में अंग्रेजी के जितने अखबार निकलते है उतने दुनिया के किसी भी गैर अंग्रेजी भाषी देश से नहीं निकलते है | दिल्ली के एक अंग्रजी अखबार ने कुछ ऐसे आंकड़े उछाले है जिनसे ये सिद्ध होता है की अंग्रेजी सुरसा के बदन की तरह निरंतर बढाती चली जा रही है |
एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में 74 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | उनकी संख्या 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है जबकि हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में सिर्फ 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | यानी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी तीन गुना तेजी से दौड़ रही है |
ऐसा कहने का आशय क्या है ? आशय ये है की हिंदी वालो जागो, आँखे खोलो | अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाओ | दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलो | विदेशो में बड़ी बड़ी नौकरिया हथियाना हो तो अपने बच्चो को अभी से अंग्रेजी की घुट्टी पिलाना शुरू करो | वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा से चिपके रहने में कोई फायदा नहीं है | इस खबर में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और महाराष्ट्र की इसलिए विशेष तारीफ़ की गयी है की उनके 60 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है |
इस खबर में संख्या का जो खेल खेल गया है पहले हम उसकी खबर ले | यह ठीक है की अंग्रेजी माध्यम के छात्र 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है, लेकिन हम ये क्यों भूल गए की हिंदी माध्यम के छात्र 6 करोड़ 31 लाख से बढ़ कर 7 करोड़ 73 लाख हो गए | हिंदी का प्रतिशत 49.5 से बढ़ कर 52.2 हो गया है जबकि अंग्रेजी का 4.3 से बढ़ कर 6.3 ही हुआ है | यह कुल 15 करोड़ छात्रों की संख्या में से निकाला हुआ प्रतिशत है |
इस संख्या को इस कोण से भी देखे की कुल 15 करोड़ छात्रों में से अंग्रेजी माध्यम वाले छात्र एक करोड़ भी नहीं है | अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले 'सिर्फ' हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या 8-9 गुना बढ़ी है | पिछले 200 साल से पूरी सरकारी मशीनरी और भारतीय भद्रलोक ने अपना खून पसीना एक कर लिया | भारतीय भाषाओ के विरुद्ध जो भी साजिश संभव थी, वह भी कर ली |
इसके बावजूद भी क्या नतीजा सामने आया? 110 करोड़ के भारत में सिर्फ 95 लाख बच्चे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है | यानी पूरे भारत में अंग्रेजी पढ़ने वालो की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है | ये एक प्रतिशत बड़े हो कर कैसी अंग्रेजी लिखते बोलते है ये सबको पता है | नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी नयी पुस्तक "आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन " (Argumentative Indian) की भूमिका में उनकी अंग्रेजी सुधारने वाली एक अंग्रेजी लड़की का बड़ा अभार माना है | यह उनकी सच्चाई और विनम्रता का प्रमाण है | जब अमर्त्य बाबू का यह हाल है तो अंग्रेजी के अखाडे में दंड पेलने वाले नौसिखियों का क्या कहना?
भारत में एक करोड़ बच्चे विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी की चक्की में पिस रहे है | ऐसी पिसाई दुनिया में कही नहीं होती | दुनिया के किसी भी शक्तिशाली या मालदार देश में उनके बच्चो की गर्दन पर ऐसी छुरी नहीं फेरी जाती | वहां गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा कला के विभिन्न विषय विदेशी माध्यम से नहीं पढाये जाते | ये सारे विषय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, जापान और रूस जैसे देशो मे स्वदेशी भाषा के माध्यम से पढाये जाते है | इसलिए सारे विषयो को सीखने में बच्चो को विशेष सुविधा होती है | सीखने की रफ़्तार तेज़ होती है | उनके नंबर भी ज्यादा आते है | वे फेल भी कम होते है | उन्हें विदेशी भाषा से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती |
अपनी भाषा में वे सरलता से सीख लेते है | उनकी सारी शक्ति विषयो को सीखने में लगती है | भारत में इसका उल्टा होता है | बच्चो को मार मार कर विदेशी भाषा रटाई जाती है | जितना समय वे अन्य पांच विषयो को सीखने पर लगाते है, उस से ज्यादा उन्हें अकेली अंग्रेजी पर लगाना होता है | फिर भी सबसे ज्यादा बच्चे अगर किसी विषय में फेल होते है तो अंग्रेजी में होते है | यही कारण है की बी ए में पहुंचते पहुंचते 15 करोड़ में से 14 करोड़ 40 लाख बच्चे पढाई से मुंह मोड़ लेते है |
सिर्फ 4-5 प्रतिशत बच्चे ही कॉलेज पहुँच पाते है | हमारे देश के पिछडेपन का एक मूल कारण यह भी है की हमारे यहाँ सुशिक्षित लोगो की संख्या 15 प्रतिशत भी नहीं है | साक्षर लोग यानी अपने हस्ताक्षर कर सकने वाले लोग 70 प्रतिशत हो सकते है, लेकिन क्या साक्षरों को सुशिक्षित कह सकते है? दूसरे शब्दों में अंग्रेजी के कारण बच्चे शिक्षा से ही पिंड छुडा लेते है | इस प्रकार अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बनती है |
जिन बच्चो को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढाई जाती है और जिनका माध्यम अंग्रेजी है, उन बच्चो की कितनी दुर्दशा होती है, उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रुरत है | ये बच्चे निरंतर दबाव और तनाव की ज़िन्दगी जीते है | वे अपनी भाषा, अपने संगीत, अपनी कला, अपनी परंपरा और अपने मूल्यों से बेगाने होते चले जाते है | वे कही भी गहरे उतरने के लायक नहीं रहते | उनका मन मस्तिष्क चिमगादड़ की तरह हो जाता है | वे उल्टे हो कर लटकने लगते है | उन्हें बताया जाता है की पश्चिम ही छत है | अमेरिका और ब्रिटेन ही सबसे अच्छे है | उनसे ही जुडो | वे उनसे इतने जुड़ जाते है की वे बड़े हो कर इन्ही पश्चिमी देशो में रहने के लिए उतावले हो जाते है | इसीलिए हमारे अंग्रेजी माध्यम से लोग पश्चिम की गटर में बह जाते है | इसे ही "ब्रेन-ड्रेन" कहा जाता है | इन लाखो छात्रों की पढाई और लालन पालन पर यह गरीब देश करोडो अरबो रूपए खर्च करता है और जब फल पक कर तैयार होता है तो गिरने के लिए वह अमेरिकी झोली तलाशता है | इस से बढ़ कर भारत की लूट क्या हो सकती है ?
जो लोग पढ़ लिख कर विदेशो में बस जाते है, वे भारत के लिए क्या करते है? भारत की बात जाने दे, अपने परिवारों के लिए भी ख़ास कुछ नहीं करते | उनसे ज्यादा पैसा तो वे बेपढे लिखे मज़दूर भेजते है जो खाडी देशो में काम करते है | ये कमाऊ पूत है और वे उडाऊ पूत | अंग्रेजी की पढाई देश में उडाऊ पूत पैदा करती है | यदि अमेरिका जा कर हमारे 10-15 लाख नौजवानों ने नौकरिया हथिया ली तो इसमें फूल कर कुप्पा होने की क्या बात है |
इसमें शक नहीं की अगर वे अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें ये नौकरिया नहीं मिलती, लेकिन ज़रा सोचे की इन 10-15 लाख लोगो के लिए हम अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है? 15 लाख लोगो को विदेशो में नौकरी मिल जाए, इसलिए हम 15 करोड़ बच्चो को अंग्रेजी की चक्की में पीसने को तैयार है? हम कितने बुद्धू और क्रूर राष्ट्र है?
और इतना ही नहीं अंग्रेजी के मोह के कारण हम चीनी, जापानी, रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन और हिस्पानी जैसी भाषायें भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते | यही नहीं हम तो अपने देश के अलग अलग राज्यों की भाषाए भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते है | हमने अपना संसार बहुत छोटा कर लिया है | यदि हम हमारे बच्चो को अंग्रेजी के साथ साथ अन्य प्रमुख देसी और विदेशी भाषायें सीखने की छूट दे देते तो भारत अपने व्यापार और कूटनीति में अब तक संसार का अग्रणी देश बन जाता |
ज़रा ध्यान दीजिये! यहाँ मैंने छूट देने की बात कही है, थोपने की नहीं | भारत में अनेक विदेशी भाषाए जम कर पढाई जानी चाहिए, जैसी की आजकल चीन में पढाई जा रही है | चीनी लोग अंग्रेजी की गुलामी नहीं कर रहे है, उसे अपना गुलाम बना कर उस से अपना काम निकाल रहे है | अमेरिका में चीनियों की संख्या भारतीयों से भी ज्यादा है | उनके लिए अंग्रेजी महारानी नहीं नौकरानी है | हमने अंग्रेजी को महारानी बना रखा है |
इसलिए 15 करोड़ बच्चो पर हम उसे थोप देते है और एक करोड़ बच्चो से कहते है की तुम्हे जो सीखना हो, वह अंग्रेजी माध्यम से ही सीखो | किसी भी विदेशी भाषा को पढाई का माध्यम बनाना अक्ल के साथ दुश्मनी है | इस पर संवैधानिक प्रतिबन्ध लगना चाहिए | कौन लगायेगा यह प्रतिबन्ध? हमारे सारे नेतागण तो कुर्सी और पैसे के खेल में पगला रहे है |
उन्हें इन बुनियादी सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है | यह काम देश के प्रबुद्ध जन को ही करना होगा | अगर वे कोई ज़बरदस्त जन अभियान चला दे तो अपने देश के बच्चो का बड़ा कल्याण होगा और नेतागण तो अपने आप उसके पीछे चले आयेंगे |
भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने में अंग्रेजी के अखबार विशेष भूमिका निभाते है | भारत में अंग्रेजी के जितने अखबार निकलते है उतने दुनिया के किसी भी गैर अंग्रेजी भाषी देश से नहीं निकलते है | दिल्ली के एक अंग्रजी अखबार ने कुछ ऐसे आंकड़े उछाले है जिनसे ये सिद्ध होता है की अंग्रेजी सुरसा के बदन की तरह निरंतर बढाती चली जा रही है |
एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में 74 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | उनकी संख्या 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है जबकि हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में सिर्फ 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | यानी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी तीन गुना तेजी से दौड़ रही है |
ऐसा कहने का आशय क्या है ? आशय ये है की हिंदी वालो जागो, आँखे खोलो | अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाओ | दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलो | विदेशो में बड़ी बड़ी नौकरिया हथियाना हो तो अपने बच्चो को अभी से अंग्रेजी की घुट्टी पिलाना शुरू करो | वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा से चिपके रहने में कोई फायदा नहीं है | इस खबर में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और महाराष्ट्र की इसलिए विशेष तारीफ़ की गयी है की उनके 60 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है |
इस खबर में संख्या का जो खेल खेल गया है पहले हम उसकी खबर ले | यह ठीक है की अंग्रेजी माध्यम के छात्र 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है, लेकिन हम ये क्यों भूल गए की हिंदी माध्यम के छात्र 6 करोड़ 31 लाख से बढ़ कर 7 करोड़ 73 लाख हो गए | हिंदी का प्रतिशत 49.5 से बढ़ कर 52.2 हो गया है जबकि अंग्रेजी का 4.3 से बढ़ कर 6.3 ही हुआ है | यह कुल 15 करोड़ छात्रों की संख्या में से निकाला हुआ प्रतिशत है |
इस संख्या को इस कोण से भी देखे की कुल 15 करोड़ छात्रों में से अंग्रेजी माध्यम वाले छात्र एक करोड़ भी नहीं है | अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले 'सिर्फ' हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या 8-9 गुना बढ़ी है | पिछले 200 साल से पूरी सरकारी मशीनरी और भारतीय भद्रलोक ने अपना खून पसीना एक कर लिया | भारतीय भाषाओ के विरुद्ध जो भी साजिश संभव थी, वह भी कर ली |
इसके बावजूद भी क्या नतीजा सामने आया? 110 करोड़ के भारत में सिर्फ 95 लाख बच्चे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है | यानी पूरे भारत में अंग्रेजी पढ़ने वालो की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है | ये एक प्रतिशत बड़े हो कर कैसी अंग्रेजी लिखते बोलते है ये सबको पता है | नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी नयी पुस्तक "आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन " (Argumentative Indian) की भूमिका में उनकी अंग्रेजी सुधारने वाली एक अंग्रेजी लड़की का बड़ा अभार माना है | यह उनकी सच्चाई और विनम्रता का प्रमाण है | जब अमर्त्य बाबू का यह हाल है तो अंग्रेजी के अखाडे में दंड पेलने वाले नौसिखियों का क्या कहना?
भारत में एक करोड़ बच्चे विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी की चक्की में पिस रहे है | ऐसी पिसाई दुनिया में कही नहीं होती | दुनिया के किसी भी शक्तिशाली या मालदार देश में उनके बच्चो की गर्दन पर ऐसी छुरी नहीं फेरी जाती | वहां गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा कला के विभिन्न विषय विदेशी माध्यम से नहीं पढाये जाते | ये सारे विषय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, जापान और रूस जैसे देशो मे स्वदेशी भाषा के माध्यम से पढाये जाते है | इसलिए सारे विषयो को सीखने में बच्चो को विशेष सुविधा होती है | सीखने की रफ़्तार तेज़ होती है | उनके नंबर भी ज्यादा आते है | वे फेल भी कम होते है | उन्हें विदेशी भाषा से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती |
अपनी भाषा में वे सरलता से सीख लेते है | उनकी सारी शक्ति विषयो को सीखने में लगती है | भारत में इसका उल्टा होता है | बच्चो को मार मार कर विदेशी भाषा रटाई जाती है | जितना समय वे अन्य पांच विषयो को सीखने पर लगाते है, उस से ज्यादा उन्हें अकेली अंग्रेजी पर लगाना होता है | फिर भी सबसे ज्यादा बच्चे अगर किसी विषय में फेल होते है तो अंग्रेजी में होते है | यही कारण है की बी ए में पहुंचते पहुंचते 15 करोड़ में से 14 करोड़ 40 लाख बच्चे पढाई से मुंह मोड़ लेते है |
सिर्फ 4-5 प्रतिशत बच्चे ही कॉलेज पहुँच पाते है | हमारे देश के पिछडेपन का एक मूल कारण यह भी है की हमारे यहाँ सुशिक्षित लोगो की संख्या 15 प्रतिशत भी नहीं है | साक्षर लोग यानी अपने हस्ताक्षर कर सकने वाले लोग 70 प्रतिशत हो सकते है, लेकिन क्या साक्षरों को सुशिक्षित कह सकते है? दूसरे शब्दों में अंग्रेजी के कारण बच्चे शिक्षा से ही पिंड छुडा लेते है | इस प्रकार अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बनती है |
जिन बच्चो को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढाई जाती है और जिनका माध्यम अंग्रेजी है, उन बच्चो की कितनी दुर्दशा होती है, उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रुरत है | ये बच्चे निरंतर दबाव और तनाव की ज़िन्दगी जीते है | वे अपनी भाषा, अपने संगीत, अपनी कला, अपनी परंपरा और अपने मूल्यों से बेगाने होते चले जाते है | वे कही भी गहरे उतरने के लायक नहीं रहते | उनका मन मस्तिष्क चिमगादड़ की तरह हो जाता है | वे उल्टे हो कर लटकने लगते है | उन्हें बताया जाता है की पश्चिम ही छत है | अमेरिका और ब्रिटेन ही सबसे अच्छे है | उनसे ही जुडो | वे उनसे इतने जुड़ जाते है की वे बड़े हो कर इन्ही पश्चिमी देशो में रहने के लिए उतावले हो जाते है | इसीलिए हमारे अंग्रेजी माध्यम से लोग पश्चिम की गटर में बह जाते है | इसे ही "ब्रेन-ड्रेन" कहा जाता है | इन लाखो छात्रों की पढाई और लालन पालन पर यह गरीब देश करोडो अरबो रूपए खर्च करता है और जब फल पक कर तैयार होता है तो गिरने के लिए वह अमेरिकी झोली तलाशता है | इस से बढ़ कर भारत की लूट क्या हो सकती है ?
जो लोग पढ़ लिख कर विदेशो में बस जाते है, वे भारत के लिए क्या करते है? भारत की बात जाने दे, अपने परिवारों के लिए भी ख़ास कुछ नहीं करते | उनसे ज्यादा पैसा तो वे बेपढे लिखे मज़दूर भेजते है जो खाडी देशो में काम करते है | ये कमाऊ पूत है और वे उडाऊ पूत | अंग्रेजी की पढाई देश में उडाऊ पूत पैदा करती है | यदि अमेरिका जा कर हमारे 10-15 लाख नौजवानों ने नौकरिया हथिया ली तो इसमें फूल कर कुप्पा होने की क्या बात है |
इसमें शक नहीं की अगर वे अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें ये नौकरिया नहीं मिलती, लेकिन ज़रा सोचे की इन 10-15 लाख लोगो के लिए हम अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है? 15 लाख लोगो को विदेशो में नौकरी मिल जाए, इसलिए हम 15 करोड़ बच्चो को अंग्रेजी की चक्की में पीसने को तैयार है? हम कितने बुद्धू और क्रूर राष्ट्र है?
और इतना ही नहीं अंग्रेजी के मोह के कारण हम चीनी, जापानी, रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन और हिस्पानी जैसी भाषायें भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते | यही नहीं हम तो अपने देश के अलग अलग राज्यों की भाषाए भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते है | हमने अपना संसार बहुत छोटा कर लिया है | यदि हम हमारे बच्चो को अंग्रेजी के साथ साथ अन्य प्रमुख देसी और विदेशी भाषायें सीखने की छूट दे देते तो भारत अपने व्यापार और कूटनीति में अब तक संसार का अग्रणी देश बन जाता |
ज़रा ध्यान दीजिये! यहाँ मैंने छूट देने की बात कही है, थोपने की नहीं | भारत में अनेक विदेशी भाषाए जम कर पढाई जानी चाहिए, जैसी की आजकल चीन में पढाई जा रही है | चीनी लोग अंग्रेजी की गुलामी नहीं कर रहे है, उसे अपना गुलाम बना कर उस से अपना काम निकाल रहे है | अमेरिका में चीनियों की संख्या भारतीयों से भी ज्यादा है | उनके लिए अंग्रेजी महारानी नहीं नौकरानी है | हमने अंग्रेजी को महारानी बना रखा है |
इसलिए 15 करोड़ बच्चो पर हम उसे थोप देते है और एक करोड़ बच्चो से कहते है की तुम्हे जो सीखना हो, वह अंग्रेजी माध्यम से ही सीखो | किसी भी विदेशी भाषा को पढाई का माध्यम बनाना अक्ल के साथ दुश्मनी है | इस पर संवैधानिक प्रतिबन्ध लगना चाहिए | कौन लगायेगा यह प्रतिबन्ध? हमारे सारे नेतागण तो कुर्सी और पैसे के खेल में पगला रहे है |
उन्हें इन बुनियादी सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है | यह काम देश के प्रबुद्ध जन को ही करना होगा | अगर वे कोई ज़बरदस्त जन अभियान चला दे तो अपने देश के बच्चो का बड़ा कल्याण होगा और नेतागण तो अपने आप उसके पीछे चले आयेंगे |
Subscribe to:
Posts (Atom)