भारत-पाक सीमा पर कुपवाड़ा में 22 मई 2002 के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हिम्मत हो तो छिपकर वार करने के बजाय पाकिस्तान सामने आए और दो-दो हाथ कर ले, अब निर्णायक लड़ाई का वक्त आ गया है। फिर शिमला में 26 मई 2002 को कहा कि संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद ही हमें पाकिस्तान को सबक सिखा देना चाहिए था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपील पर हमने पाक को एक मौका दिया। अब हमारा धैर्य टूट रहा है। पाकिस्तान पर इस सबका असर नहीं पड़ा और वह फिर अपने काम पर लग गया। आतंकवादी आते रहे। भारत पर हमलावर रहे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही कोई डेढ़ दर्जन हृदयविदारक आतंकी हमले हुए। फिर मुंबई पर सीधा आक्रमण हुआ। देश में उबाल आ गया। पाकिस्तानी षड्यंत्र के पुख्ता सबूत भी मिल गए। प्रधानमंत्री अब पाकिस्तान से कड़ी कार्रवाई का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तानी जवाब गौरतलब है कि वह जंग के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री ने कहा कि युद्ध कोई नहीं चाहता। युद्ध मुद्दा नहीं, असली मुद्दा है आतंकवाद और पाकिस्तान को इस पर नतीजा देना होगा। हैरत है कि प्रधानमंत्री अब भी आतंकवाद को युद्ध नहीं मानते।
युद्ध का कोई विकल्प नहीं होता। हमलावर शत्रु सदाशयता का अर्थ कायरता ही लेता है। पाकिस्तान अपने जन्मकाल से ही युद्धरत है। वह कबाइली युद्ध , कच्छ युद्ध , पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध (1971) और कारगिल (1999) सहित 4 प्रत्यक्ष युद्धों में भारत से हार चुका है। वह प्रच्छन्न आतंकी युद्ध के जरिये लगातार हमलावर रहता है। वह आतंकवाद के प्रशिक्षण की यूनिवर्सिटी चलाता है। विश्व समुदाय के पास आतंकी ट्रेनिंग सेंटरों के सबूत हैं, सबूत भारत के पास भी हैं। मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल आमिर कसाब के पाकिस्तानी नागरिक होने के सबूत पाक मीडिया ने भी दिए हैं। अमेरिकी एफबीआई ने भी तमाम तथ्य दिए हैं, लेकिन पाकिस्तान तथ्य नहीं मानता और युद्ध के लिए ललकार रहा है। हमले की प्रत्येक वारदात से इनकार और युद्ध की तत्परता पाकिस्तान का स्वभाव है। याद कीजिए जब 26 मई 2002 को वाजपेयी ने शिमला में कहा कि हमारे धैर्य का बांध टूट रहा है तो ठीक दूसरे दिन 27 मई को परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि हम अल्लाह का नाम लेकर जंग में उतरेंगे। हमारी सेना तैयार है। पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे जेएन दीक्षित के अनुसार कंधार विमान अपहरण की साजिश मुंबई और ढाका में मौजूद आईएसआई एजेंटों ने बनाई थी। दीक्षित ने ध्यान दिलाया था कि अपहर्ताओं ने 33 पाकिस्तानी आतंकियों की रिहाई की मांग की थी। रिहा मुख्य आतंकी अजहर मसूद पाकिस्तान में अपने गांव बहावलपुर पहुंचा। उसका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ।
पाकिस्तान वास्तविक राष्ट्र-राज्य नहीं है। वह दरअसल एक सुव्यवस्थित विचारधारा है। इस विचारधारा का जन्म पाकिस्तान से भी पुराना है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के एक छात्र रहमत अली ने 1933 में 'नाऊ आर नेवर' शीर्षक से एक लेख के जरिये दक्षिण एशिया में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की पैरवी की थी। उन्होंने इस काल्पनिक राष्ट्र का नाम पाकिस्तान रखा। 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' लिखने वाले शायर इकबाल ने इस विचार का तर्क सहित समर्थन किया। मुस्लिम लीग के लाहौर सम्मेलन (1940) में जिन्ना ने पाकिस्तान प्रस्ताव रखा और यह पारित हो गया। जिन्ना के मुताबिक मुसलमान अलग राष्ट्र थे। नेहरू, लार्ड माउंटबेटन और जिन्ना ने भारत बांट दिया। उम्मीद थी कि समस्या का स्थायी समाधान हो गया। भारतीय राजनीतिक तंत्र में 'इतिहास बोध' का अभाव है। इतिहास क्रूर होता है। वह भुलक्कड़ों को क्षमा नहीं करता। पाकिस्तान का इतिहास 1947 से ही शुरू होता है, लेकिन विचारधारा की जड़ें मध्यकाल में हैं। बिन कासिम ने 7वीं सदी में भारत पर हमला किया था। गजनी और गोरी के हमले इतिहास की निर्मम सच्चाइयां हैं। नेहरू को उम्मीद थी कि पाकिस्तान कुछ समय बाद स्वत: ही नष्ट हो जाएगा। वह इस्लामी राजनीतिक चिंतन और जिहाद की ताकत पर आंखें मूंदे रहे। पाकिस्तान अलग रहकर मौज उड़ाने के लिए नहीं बना था। पाकिस्तानी विचार के जन्मदाता रहमत अली ने पाकिस्तान निर्माण के वक्त भारतीय मुसलमानों के बारे में कहा था, ''वे हमारा खून हैं। वे वाकिफ हैं कि पाकिस्तान 'मिल्लत' के सर्वोच्च हित में है। यह हमारे लिए किला है और उनके (भारतीय मुसलमानों) लिए लंगर।'' एफके दुर्रानी ने 'मीनिंग आफ पाकिस्तान'में लिखा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए जरूरी था कि उसको शिविर बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जाए। पाकिस्तान के पहले हुक्मरान संस्थापक जिन्ना भारत के शत्रु थे। कबाइली हमला उन्हीं के वक्त हुआ। प्रथम वजीरेआजम लियाकत अली खां ने 'नेहरू लियाकत समझौता' (1950) किया। समझौता व्यर्थ रहा। पहले राष्ट्रपति इस्कंदर अली मिर्जा भी भारत विरोधी थे। पहले सैन्य शासक जनरल अयूब खां का रुख भी भारत के प्रति युद्धक था। याह्या खां के समय भारत से युद्ध (1971) हुआ। जुल्फिकार अली भुट्टो (1971) जिया उल हक (1977), बेनजीर भुट्टो (1988-1990 व 1993-1996) और नवाज शरीफ भी भारत पर आक्रामक थे। कारगिल युद्ध परवेज मुशर्रफ की ही खुराफात था। संप्रति यूसुफ रजा गिलानी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हैं, लेकिन पाकिस्तान में चार ए-अल्लाह, आर्मी, आतंक और अमेरिका- का रुतबा है। प्रधानमंत्री सेना के दबाव में हैं। आतंकवाद पाकिस्तानी विचारधारा में जिहाद है, अमेरिका अपने ऊपर हुए हमले के विरुद्ध सीधा आक्रमण करता है, लेकिन पाकिस्तान से जुड़ी हर वारदात में अमेरिकी राजनयिकों की 'संतुलन सेवाएं' नि:शुल्क उपलब्ध हैं।
पाकिस्तान आतंकी विचारधारा पर भारी खर्च करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल आफ गवर्नमेंट की अमेरिकी विद्वान जेसिका स्टर्न ने 'फारेन अफेयर्स' (नवंबर- दिसंबर 2000) में लिखा था कि पाकिस्तान में 45 हजार मदरसे हैं। इनमें केवल 4000 ही सरकार में पंजीकृत हैं। आंकडे़ 8 बरस पुराने हैं। भुट्टो के सहायक और पाकिस्तानी इतिहासकार केके अजीज ने अपने शोध में पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों का विष-विश्लेषण किया है। कक्षा 2 की इतिहास की किताब के अनुसार नेहरू ने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुओं की सरकार होगी, जिन्ना ने कहा-यहां मुसलमान भी रहते हैं। कक्षा 3 की किताब के अनुसार राजा जयपाल ने महमूद गजनवी के मुल्क में घुसने की कोशिश की। महमूद ने राजा को हरा दिया, लाहौर हथिया लिया। पाकिस्तानी तरुणाई का विकास इसी विष-विचार से किया जाता है, फिर आतंकी शिविर सेवाएं देते हैं। फिर आईएसआई मदद करती है। सीमा पर भले ही युद्धविराम हो, लेकिन आईएसआई के आतंकी बिना अल्पविराम आक्रामक हैं। भारत सोचे कि क्या करना है? भारत की विदेश नीति मित्रतापूर्ण है, पाकिस्तान की नीति युद्धक है। नेहरू से लेकर वाजपेयी और मनमोहन तक प्रेम की मनुहार है, लेकिन जवाब में युद्ध और परमाणु बम की धमकियां हैं। भारत पाकिस्तान विषयक विदेश नीति का आद्योपांत पुनरीक्षण करे। युद्ध ठीक नहीं होता, लेकिन थोपे गए युद्ध को टालने का कोई उपाय तो करना ही होगा।
[हृदयनारायण दीक्षित: लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं]
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