आपको यह जानकार हैरानी होगी कि पब्लिक के बीच स्टेटस चाहने वाले नेताओं की सुरक्षा में एंटी टेरर एनएसजी क्रैक फोर्स के 1700 जवान तैनात हैं। यानी जिन जवानों को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए ट्रेंड किया गया है वे नेताओं की हिफाजत में दिन-रात जुटे रहते हैं। आप जो अपना टैक्स चुकाते हैं, उसमें से एक बड़ी राशि ( 250 करोड़ रुपये) इन नेताओं की सुरक्षा पर खर्च हो जाती है। इनमें किसी एक पार्टी का नेता शामिल नहीं है, सिक्यूरिटी लेने के मामले में सभी नेताओं में भाईचारा है।
जिन वीआईपी लोगों की सुरक्षा पर यह मोटी रकम खर्च की जाती है, उसमें पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा से लेकर अमर सिंह, रामविलास पासवान, सज्जन कुमार, बी. एल. जोशी, आर. एल. भाटिया, शरद यादव, रामेश्वर ठाकुर, ई. अहमद, मुरली मनोहर जोशी, बृजभूषण शरण और प्रमोद तिवारी जैसे नेता हैं। इन लोगों को यह सुरक्षा इसलिए दी गई हैं कि इनकी जिंदगी खतरे में है। यहां पर यह सवाल सहज ही उठता है कि जिन सज्जन कुमार को यह सुरक्षा मिली हुई है, उनके खिलाफ हत्या के मामले चल रहे हैं।
बड़े पैमाने पर वीआईपी सिक्यूरिटी मुहैया कराने का नतीजा यह निकला है कि जिन्हें आतंकवादी विरोधी गतिविधियों के लिए तैयार किया था, वे अब राइफल लेकर किसी खादी वाले की सुरक्षा में लगे हुए हैं। विमान अपहरण पर कार्रवाई करने और एंटी टेरर ऑपरेशंस के लिए 1984 में नैशनल सिक्यूरिटी गार्ड्स (एनएसजी) का गठन किया गया था। एनएसजी के 2 विंग बनाए गए, जिसे स्पेशल ऐक्शन ग्रुप (एसएजी) और स्पेशल रेंजर्स ग्रुप (एसआरजी) नाम दिया गया। एसएजी में सेना के जवानों को डेपुटेशन पर भेजा जाता है जबकि एसआरजी में आईटीबीपी, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ और एसएसबी के जवान डेपुटेशन पर भेजे जाते हैं। इसी एसआरजी में से आधे से ज्यादा जवानों को वीआईपी सिक्यूरिटी में लगा दिया गया है।
यहां बता दें कि स्पेशल प्रोटक्शन ग्रुप यानी एसपीजी सिर्फ प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री और गांधी परिवार की सुरक्षा के लिए है। यहां यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है कि एसपीजी का बजट वित्त वर्ष 2008-09 के लिए 180 करोड़ है जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 117 करोड़ था। वहीं एनएसजी, जिस पर देश के एक अरब लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है उसका बजट वित्त वर्ष 2008-09 के लिए 158 करोड़ है जो पिछले वित्त वर्ष से कम है। पिछले वित्त वर्ष में उसका बजट 159 करोड़ रुपये मंजूर किया गया था।
इन तमाम सुरक्षा कवच के अलावा राज्यों की पुलिस भी वीआईपी सुरक्षा में लगी होती है। अकेले दिल्ली में ही 14,200 पुलिसकर्मी 24 घंटे वीआईपी सिक्यूरिटी में लगे रहते हैं।
जितने भी लेवल की सुरक्षा वीआईपी लोगों के पास होती है, उन सभी वाहनों पर रेड लाइट लगी होती है और ये लोग अक्सर ट्रैफिक में आम आदमी के लिए परेशानी का सबब बनते हैं। यही वजह है कि हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने नेताओं की सुरक्षा पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ये लोग कोई राष्ट्रीय धरोहर तो हैं नहीं जो इनकी सुरक्षा करने की जरूरत है।
राहुल त्रिपाठी कार्तिकेय
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