Sunday, December 28, 2008

राजनीति का असली चेहरा

पिछले दिनों आमिर खान की फिल्म गजनी देखने का मौका मिला। यह एक ऐसे नायक की कथा है जो अल्पस्मृति रोग से ग्रस्त है और खुद पर ही प्रहार करने वाले अपराधी राजनेता के बहकावे में आकर उसकी मदद को तैयार हो जाता है। मुझे इस फिल्म को देखकर लगा कि भारतीय परिदृश्य भी आज कुछ ऐसा ही है। एक ओर वह जनता है जो निरंतर क्रमिक अंतराल के बाद स्मृतिलोप का शिकार होकर उन्हीं राजनेताओं को वोट देकर सत्ता में भेजती है जिनका वास्तविक चेहरा अपराधी का होता है। दूसरी ओर राजनेता हैं जो जनता के इस अल्प स्मृतिदोष का लाभ उठाकर हर बार 'शुभचिंतक' के नाते जनता के सामने आते हैं, वोट लेते हैं और चुनाव को पूंजी निवेश का एक ऐसा संविधान प्रदत्त उपक्रम मानते हैं जिसमें एक रुपये लगाओ तो हजार रुपये मिल जाते हैं। वह भी सिर्फ शब्दों के आडंबर के माध्यम से। ये वे लोग हैं जिन्हें विश्वास नहीं होता कि कोई उनकी मूर्तियां लगाएगा या बगीचों के नाम रखेगा। वे भूल जाते हैं कि उनसे बड़े-बड़े, प्रतापी और प्रभावी राजनेताओं की विराट प्रतिमाएं भी नहीं रह पाईं और उन्हें कई बार उनके जीते जी ही उखाड़ फेंका गया। यह किसी से छिपा नहीं कि लेनिन के नाम का शहर लेनिनग्राद और उनकी मूर्तियां गायब हो गईं और यह भी कि सद्दाम हुसैन की मूर्तियों का क्या हाल हुआ? यह तो अभी हाल की ही बात है। फिर भी हर राजनेता यह सोचकर चलता है कि वह बड़ा लोकप्रिय व प्रजावत्सल है। हजारों करोड़ों की योजनाएं उसने चालू करवा दीं, जनता के लिए स्कूल खुलवा दिए, कारखाने लगवा दिए। अब और क्या चाहिए इनको? जनता उनकी वास्तविकता को हर दिन जानते और पहचानते हुए भी हर बार उन्हें वोट दे तो फिर इसे क्या कहेंगे? नेता खराब और जनता फरिश्ता, क्या यह समीकरण सही बैठता है?

लगभग सभी नेताओं की जीवनशैली एक सी है। कई बार तो लगता है कि उन्होंने कितना पैसा कमाया होगा, इसका अंदाजा उन्हें भी पूरी तरह से नहीं होता होगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि राजनीति में आचरण उल्टे पिरामिड की तरह होता है। जैसा ऊपर देखते हैं वैसा ही मंझले और निचले दर्जे के कार्यकर्ता करते हैं। पैसा हो और थैले में आवश्यक संख्या में सरकटे चूजे तो लोकतंत्र की गाय से मन माना दूध दुहा जा सकता है, ऐसा मानने वालों की संख्या कम नहीं। यह तय है कि कुछ दिनों और उत्तर प्रदेश में अभियंता मनोज गुप्ता की हत्या की खबरें छपेंगी। फिर कुछ और घटनाएं इस पर छा जाएंगी। मनोज गुप्ता के परिवार वाले अंग्रेजी मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखते, इसलिए बात देहाती स्तर तक ही कुछ पोस्टरों और राजनेताओं के स्वार्थ केंद्रित शोर की जुगुप्साजनक राजनीति में उलझकर खत्म हो जाएगी।

जिस व्यवस्था ने मनोज गुप्ता की जान ले ली, न उस पर किसी का ध्यान जाएगा और न उसे कोई बदलने की मांग करेगा। इसलिए नहीं करेगा, क्योंकि यह व्यवस्था हर पार्टी और संगठन का वक्त-बेवक्त स्वार्थ साधती है। प्रशासन, अधिकारी, पुलिस-ये सब लोकतंत्र की गाय के दुहने के लिए राजनेताओं के उपकरण मात्र बना दिए गए हैं। हर बड़े पदों पर बिठाए जाने वाले अधिकारियों को मालूम है कि कौन सा पद 'फायदे' का है और कौन सा 'कायदे' का? जो फायदे के पद हैं उनकी ठीक वैसी ही नीलामी होती है जैसे ज्यादा कमाई वाले थानों में नियुक्ति के लिए बोलियां लगाई जाती हैं। यह उस देश में हो रहा है जहां कहा गया, 'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप अवसि नरक अधिकारी'। यह सब जानते हुए भी मानता कौन है? राजनेता भावनाओं का ज्वार पैदा करते हैं तो जनता जान की बाजी लगा देती है। उस ज्वार में नेताजी को सत्ता मिलती हैं और जनता को जलालत। वह अपनी आंखों से देखती है कि जिन पर हत्या के आरोप लगते हैं वे नेता बन जाते हैं और जेल के रास्ते से ऊंचे पद तक पहुंच जाते हैं। सत्ता में आते ही वे आतंकवादियों की पैरवी करने तक से नहीं चूकते। फिर भी वे सत्ता में बने रहते हैं, क्योंकि जिनके लिए देश केवल एक पूंजीनिवेश और विलासिता का प्लेटफार्म है। वे यह नहीं कह सकते कि सत्ता मिले न मिले, बंगले बनें न बनें, लेकिन मैं प्रजा हित से समझौता नहीं कर सकता। ऐसे लोग राजनीति में हैं, मगर अपवाद स्वरूप। जो मुख्यधारा के शिखर बने हैं उन लोगों से हम आतंकवाद की विभीषिका से लड़ने की उम्मीद कर सकते हैं? आखिर जो सत्ता प्रतिष्ठान एक अकर्मण्य गृहमंत्री को उसके पद से हटाने के लिए 200 लोगों की हत्या की प्रतीक्षा करे वह घरेलू राजनीतिक आतंकवादियों से किसी मनोज गुप्ता की रक्षा कर पाएगा, यह आशा करना ही व्यर्थ है।

बात गजनी से शुरू हुई थी। इसमें राजनीति के प्रभावी अपराधी के दुष्कृत्य से क्रुद्ध नायक राज्यसत्ता की रक्षक भुजा पर भरोसा करने के बजाय स्वयं प्रतिशोध लेता है और जनता के मन को आनंद तथा संतोष रहता है। शायद कोई यह न लिखेगा कि फिल्म भले ही सत्य की विजय के लिए ही क्यों न हो, लेकिन गैर-कानूनी ढंग से समाधान का मार्ग निकालती है। सवाल उठता है कि पिछले 20 वर्षों से हमारे हजारों स्त्री, पुरुषों, बच्चों को पाकिस्तान समर्थित जिहादियों ने मार डाला तो क्या उसका हिसाब चुकाने के लिए हम इसी थकी हुई, भ्रष्ट, आत्मकेंद्रित राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर रहें? दुनिया का सबसे युवा देश अरबपतियों की वैश्विक सूची में यदि एक ओर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रहा है तो दूसरी ओर रीढ़ हीन सत्ता राजनीति का कलुषित चेहरा हमारे वीरत्व और आत्मविश्वास को चुनौती दे रहा है। संक्रमण काल में इस राजनीति के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध असहिष्णु जनाक्रोश का उभरना तय है। प्रकृति कभी क्षुद्रता और अंधा अहंकार क्षमा नहीं करती।

[तरुण विजय: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

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