क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से आ रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!
Sunday, November 22, 2009
Thursday, November 19, 2009
अंग्रेजी की चक्की में क्यों पिसे बच्चे
डा. वेद प्रताप वैदिक
भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने में अंग्रेजी के अखबार विशेष भूमिका निभाते है | भारत में अंग्रेजी के जितने अखबार निकलते है उतने दुनिया के किसी भी गैर अंग्रेजी भाषी देश से नहीं निकलते है | दिल्ली के एक अंग्रजी अखबार ने कुछ ऐसे आंकड़े उछाले है जिनसे ये सिद्ध होता है की अंग्रेजी सुरसा के बदन की तरह निरंतर बढाती चली जा रही है |
एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में 74 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | उनकी संख्या 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है जबकि हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में सिर्फ 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | यानी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी तीन गुना तेजी से दौड़ रही है |
ऐसा कहने का आशय क्या है ? आशय ये है की हिंदी वालो जागो, आँखे खोलो | अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाओ | दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलो | विदेशो में बड़ी बड़ी नौकरिया हथियाना हो तो अपने बच्चो को अभी से अंग्रेजी की घुट्टी पिलाना शुरू करो | वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा से चिपके रहने में कोई फायदा नहीं है | इस खबर में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और महाराष्ट्र की इसलिए विशेष तारीफ़ की गयी है की उनके 60 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है |
इस खबर में संख्या का जो खेल खेल गया है पहले हम उसकी खबर ले | यह ठीक है की अंग्रेजी माध्यम के छात्र 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है, लेकिन हम ये क्यों भूल गए की हिंदी माध्यम के छात्र 6 करोड़ 31 लाख से बढ़ कर 7 करोड़ 73 लाख हो गए | हिंदी का प्रतिशत 49.5 से बढ़ कर 52.2 हो गया है जबकि अंग्रेजी का 4.3 से बढ़ कर 6.3 ही हुआ है | यह कुल 15 करोड़ छात्रों की संख्या में से निकाला हुआ प्रतिशत है |
इस संख्या को इस कोण से भी देखे की कुल 15 करोड़ छात्रों में से अंग्रेजी माध्यम वाले छात्र एक करोड़ भी नहीं है | अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले 'सिर्फ' हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या 8-9 गुना बढ़ी है | पिछले 200 साल से पूरी सरकारी मशीनरी और भारतीय भद्रलोक ने अपना खून पसीना एक कर लिया | भारतीय भाषाओ के विरुद्ध जो भी साजिश संभव थी, वह भी कर ली |
इसके बावजूद भी क्या नतीजा सामने आया? 110 करोड़ के भारत में सिर्फ 95 लाख बच्चे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है | यानी पूरे भारत में अंग्रेजी पढ़ने वालो की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है | ये एक प्रतिशत बड़े हो कर कैसी अंग्रेजी लिखते बोलते है ये सबको पता है | नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी नयी पुस्तक "आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन " (Argumentative Indian) की भूमिका में उनकी अंग्रेजी सुधारने वाली एक अंग्रेजी लड़की का बड़ा अभार माना है | यह उनकी सच्चाई और विनम्रता का प्रमाण है | जब अमर्त्य बाबू का यह हाल है तो अंग्रेजी के अखाडे में दंड पेलने वाले नौसिखियों का क्या कहना?
भारत में एक करोड़ बच्चे विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी की चक्की में पिस रहे है | ऐसी पिसाई दुनिया में कही नहीं होती | दुनिया के किसी भी शक्तिशाली या मालदार देश में उनके बच्चो की गर्दन पर ऐसी छुरी नहीं फेरी जाती | वहां गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा कला के विभिन्न विषय विदेशी माध्यम से नहीं पढाये जाते | ये सारे विषय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, जापान और रूस जैसे देशो मे स्वदेशी भाषा के माध्यम से पढाये जाते है | इसलिए सारे विषयो को सीखने में बच्चो को विशेष सुविधा होती है | सीखने की रफ़्तार तेज़ होती है | उनके नंबर भी ज्यादा आते है | वे फेल भी कम होते है | उन्हें विदेशी भाषा से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती |
अपनी भाषा में वे सरलता से सीख लेते है | उनकी सारी शक्ति विषयो को सीखने में लगती है | भारत में इसका उल्टा होता है | बच्चो को मार मार कर विदेशी भाषा रटाई जाती है | जितना समय वे अन्य पांच विषयो को सीखने पर लगाते है, उस से ज्यादा उन्हें अकेली अंग्रेजी पर लगाना होता है | फिर भी सबसे ज्यादा बच्चे अगर किसी विषय में फेल होते है तो अंग्रेजी में होते है | यही कारण है की बी ए में पहुंचते पहुंचते 15 करोड़ में से 14 करोड़ 40 लाख बच्चे पढाई से मुंह मोड़ लेते है |
सिर्फ 4-5 प्रतिशत बच्चे ही कॉलेज पहुँच पाते है | हमारे देश के पिछडेपन का एक मूल कारण यह भी है की हमारे यहाँ सुशिक्षित लोगो की संख्या 15 प्रतिशत भी नहीं है | साक्षर लोग यानी अपने हस्ताक्षर कर सकने वाले लोग 70 प्रतिशत हो सकते है, लेकिन क्या साक्षरों को सुशिक्षित कह सकते है? दूसरे शब्दों में अंग्रेजी के कारण बच्चे शिक्षा से ही पिंड छुडा लेते है | इस प्रकार अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बनती है |
जिन बच्चो को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढाई जाती है और जिनका माध्यम अंग्रेजी है, उन बच्चो की कितनी दुर्दशा होती है, उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रुरत है | ये बच्चे निरंतर दबाव और तनाव की ज़िन्दगी जीते है | वे अपनी भाषा, अपने संगीत, अपनी कला, अपनी परंपरा और अपने मूल्यों से बेगाने होते चले जाते है | वे कही भी गहरे उतरने के लायक नहीं रहते | उनका मन मस्तिष्क चिमगादड़ की तरह हो जाता है | वे उल्टे हो कर लटकने लगते है | उन्हें बताया जाता है की पश्चिम ही छत है | अमेरिका और ब्रिटेन ही सबसे अच्छे है | उनसे ही जुडो | वे उनसे इतने जुड़ जाते है की वे बड़े हो कर इन्ही पश्चिमी देशो में रहने के लिए उतावले हो जाते है | इसीलिए हमारे अंग्रेजी माध्यम से लोग पश्चिम की गटर में बह जाते है | इसे ही "ब्रेन-ड्रेन" कहा जाता है | इन लाखो छात्रों की पढाई और लालन पालन पर यह गरीब देश करोडो अरबो रूपए खर्च करता है और जब फल पक कर तैयार होता है तो गिरने के लिए वह अमेरिकी झोली तलाशता है | इस से बढ़ कर भारत की लूट क्या हो सकती है ?
जो लोग पढ़ लिख कर विदेशो में बस जाते है, वे भारत के लिए क्या करते है? भारत की बात जाने दे, अपने परिवारों के लिए भी ख़ास कुछ नहीं करते | उनसे ज्यादा पैसा तो वे बेपढे लिखे मज़दूर भेजते है जो खाडी देशो में काम करते है | ये कमाऊ पूत है और वे उडाऊ पूत | अंग्रेजी की पढाई देश में उडाऊ पूत पैदा करती है | यदि अमेरिका जा कर हमारे 10-15 लाख नौजवानों ने नौकरिया हथिया ली तो इसमें फूल कर कुप्पा होने की क्या बात है |
इसमें शक नहीं की अगर वे अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें ये नौकरिया नहीं मिलती, लेकिन ज़रा सोचे की इन 10-15 लाख लोगो के लिए हम अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है? 15 लाख लोगो को विदेशो में नौकरी मिल जाए, इसलिए हम 15 करोड़ बच्चो को अंग्रेजी की चक्की में पीसने को तैयार है? हम कितने बुद्धू और क्रूर राष्ट्र है?
और इतना ही नहीं अंग्रेजी के मोह के कारण हम चीनी, जापानी, रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन और हिस्पानी जैसी भाषायें भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते | यही नहीं हम तो अपने देश के अलग अलग राज्यों की भाषाए भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते है | हमने अपना संसार बहुत छोटा कर लिया है | यदि हम हमारे बच्चो को अंग्रेजी के साथ साथ अन्य प्रमुख देसी और विदेशी भाषायें सीखने की छूट दे देते तो भारत अपने व्यापार और कूटनीति में अब तक संसार का अग्रणी देश बन जाता |
ज़रा ध्यान दीजिये! यहाँ मैंने छूट देने की बात कही है, थोपने की नहीं | भारत में अनेक विदेशी भाषाए जम कर पढाई जानी चाहिए, जैसी की आजकल चीन में पढाई जा रही है | चीनी लोग अंग्रेजी की गुलामी नहीं कर रहे है, उसे अपना गुलाम बना कर उस से अपना काम निकाल रहे है | अमेरिका में चीनियों की संख्या भारतीयों से भी ज्यादा है | उनके लिए अंग्रेजी महारानी नहीं नौकरानी है | हमने अंग्रेजी को महारानी बना रखा है |
इसलिए 15 करोड़ बच्चो पर हम उसे थोप देते है और एक करोड़ बच्चो से कहते है की तुम्हे जो सीखना हो, वह अंग्रेजी माध्यम से ही सीखो | किसी भी विदेशी भाषा को पढाई का माध्यम बनाना अक्ल के साथ दुश्मनी है | इस पर संवैधानिक प्रतिबन्ध लगना चाहिए | कौन लगायेगा यह प्रतिबन्ध? हमारे सारे नेतागण तो कुर्सी और पैसे के खेल में पगला रहे है |
उन्हें इन बुनियादी सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है | यह काम देश के प्रबुद्ध जन को ही करना होगा | अगर वे कोई ज़बरदस्त जन अभियान चला दे तो अपने देश के बच्चो का बड़ा कल्याण होगा और नेतागण तो अपने आप उसके पीछे चले आयेंगे |
भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व को बढाने में अंग्रेजी के अखबार विशेष भूमिका निभाते है | भारत में अंग्रेजी के जितने अखबार निकलते है उतने दुनिया के किसी भी गैर अंग्रेजी भाषी देश से नहीं निकलते है | दिल्ली के एक अंग्रजी अखबार ने कुछ ऐसे आंकड़े उछाले है जिनसे ये सिद्ध होता है की अंग्रेजी सुरसा के बदन की तरह निरंतर बढाती चली जा रही है |
एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन वर्षो में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या में 74 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | उनकी संख्या 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है जबकि हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में सिर्फ 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है | यानी हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी तीन गुना तेजी से दौड़ रही है |
ऐसा कहने का आशय क्या है ? आशय ये है की हिंदी वालो जागो, आँखे खोलो | अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाओ | दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलो | विदेशो में बड़ी बड़ी नौकरिया हथियाना हो तो अपने बच्चो को अभी से अंग्रेजी की घुट्टी पिलाना शुरू करो | वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा से चिपके रहने में कोई फायदा नहीं है | इस खबर में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू और महाराष्ट्र की इसलिए विशेष तारीफ़ की गयी है की उनके 60 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है |
इस खबर में संख्या का जो खेल खेल गया है पहले हम उसकी खबर ले | यह ठीक है की अंग्रेजी माध्यम के छात्र 54 लाख से बढ़ कर 95 लाख हो गयी है, लेकिन हम ये क्यों भूल गए की हिंदी माध्यम के छात्र 6 करोड़ 31 लाख से बढ़ कर 7 करोड़ 73 लाख हो गए | हिंदी का प्रतिशत 49.5 से बढ़ कर 52.2 हो गया है जबकि अंग्रेजी का 4.3 से बढ़ कर 6.3 ही हुआ है | यह कुल 15 करोड़ छात्रों की संख्या में से निकाला हुआ प्रतिशत है |
इस संख्या को इस कोण से भी देखे की कुल 15 करोड़ छात्रों में से अंग्रेजी माध्यम वाले छात्र एक करोड़ भी नहीं है | अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले 'सिर्फ' हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या 8-9 गुना बढ़ी है | पिछले 200 साल से पूरी सरकारी मशीनरी और भारतीय भद्रलोक ने अपना खून पसीना एक कर लिया | भारतीय भाषाओ के विरुद्ध जो भी साजिश संभव थी, वह भी कर ली |
इसके बावजूद भी क्या नतीजा सामने आया? 110 करोड़ के भारत में सिर्फ 95 लाख बच्चे ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे है | यानी पूरे भारत में अंग्रेजी पढ़ने वालो की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है | ये एक प्रतिशत बड़े हो कर कैसी अंग्रेजी लिखते बोलते है ये सबको पता है | नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी नयी पुस्तक "आर्ग्युमेन्टेटिव इंडियन " (Argumentative Indian) की भूमिका में उनकी अंग्रेजी सुधारने वाली एक अंग्रेजी लड़की का बड़ा अभार माना है | यह उनकी सच्चाई और विनम्रता का प्रमाण है | जब अमर्त्य बाबू का यह हाल है तो अंग्रेजी के अखाडे में दंड पेलने वाले नौसिखियों का क्या कहना?
भारत में एक करोड़ बच्चे विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी की चक्की में पिस रहे है | ऐसी पिसाई दुनिया में कही नहीं होती | दुनिया के किसी भी शक्तिशाली या मालदार देश में उनके बच्चो की गर्दन पर ऐसी छुरी नहीं फेरी जाती | वहां गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा कला के विभिन्न विषय विदेशी माध्यम से नहीं पढाये जाते | ये सारे विषय अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, जापान और रूस जैसे देशो मे स्वदेशी भाषा के माध्यम से पढाये जाते है | इसलिए सारे विषयो को सीखने में बच्चो को विशेष सुविधा होती है | सीखने की रफ़्तार तेज़ होती है | उनके नंबर भी ज्यादा आते है | वे फेल भी कम होते है | उन्हें विदेशी भाषा से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती |
अपनी भाषा में वे सरलता से सीख लेते है | उनकी सारी शक्ति विषयो को सीखने में लगती है | भारत में इसका उल्टा होता है | बच्चो को मार मार कर विदेशी भाषा रटाई जाती है | जितना समय वे अन्य पांच विषयो को सीखने पर लगाते है, उस से ज्यादा उन्हें अकेली अंग्रेजी पर लगाना होता है | फिर भी सबसे ज्यादा बच्चे अगर किसी विषय में फेल होते है तो अंग्रेजी में होते है | यही कारण है की बी ए में पहुंचते पहुंचते 15 करोड़ में से 14 करोड़ 40 लाख बच्चे पढाई से मुंह मोड़ लेते है |
सिर्फ 4-5 प्रतिशत बच्चे ही कॉलेज पहुँच पाते है | हमारे देश के पिछडेपन का एक मूल कारण यह भी है की हमारे यहाँ सुशिक्षित लोगो की संख्या 15 प्रतिशत भी नहीं है | साक्षर लोग यानी अपने हस्ताक्षर कर सकने वाले लोग 70 प्रतिशत हो सकते है, लेकिन क्या साक्षरों को सुशिक्षित कह सकते है? दूसरे शब्दों में अंग्रेजी के कारण बच्चे शिक्षा से ही पिंड छुडा लेते है | इस प्रकार अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा बनती है |
जिन बच्चो को अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढाई जाती है और जिनका माध्यम अंग्रेजी है, उन बच्चो की कितनी दुर्दशा होती है, उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रुरत है | ये बच्चे निरंतर दबाव और तनाव की ज़िन्दगी जीते है | वे अपनी भाषा, अपने संगीत, अपनी कला, अपनी परंपरा और अपने मूल्यों से बेगाने होते चले जाते है | वे कही भी गहरे उतरने के लायक नहीं रहते | उनका मन मस्तिष्क चिमगादड़ की तरह हो जाता है | वे उल्टे हो कर लटकने लगते है | उन्हें बताया जाता है की पश्चिम ही छत है | अमेरिका और ब्रिटेन ही सबसे अच्छे है | उनसे ही जुडो | वे उनसे इतने जुड़ जाते है की वे बड़े हो कर इन्ही पश्चिमी देशो में रहने के लिए उतावले हो जाते है | इसीलिए हमारे अंग्रेजी माध्यम से लोग पश्चिम की गटर में बह जाते है | इसे ही "ब्रेन-ड्रेन" कहा जाता है | इन लाखो छात्रों की पढाई और लालन पालन पर यह गरीब देश करोडो अरबो रूपए खर्च करता है और जब फल पक कर तैयार होता है तो गिरने के लिए वह अमेरिकी झोली तलाशता है | इस से बढ़ कर भारत की लूट क्या हो सकती है ?
जो लोग पढ़ लिख कर विदेशो में बस जाते है, वे भारत के लिए क्या करते है? भारत की बात जाने दे, अपने परिवारों के लिए भी ख़ास कुछ नहीं करते | उनसे ज्यादा पैसा तो वे बेपढे लिखे मज़दूर भेजते है जो खाडी देशो में काम करते है | ये कमाऊ पूत है और वे उडाऊ पूत | अंग्रेजी की पढाई देश में उडाऊ पूत पैदा करती है | यदि अमेरिका जा कर हमारे 10-15 लाख नौजवानों ने नौकरिया हथिया ली तो इसमें फूल कर कुप्पा होने की क्या बात है |
इसमें शक नहीं की अगर वे अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें ये नौकरिया नहीं मिलती, लेकिन ज़रा सोचे की इन 10-15 लाख लोगो के लिए हम अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है? 15 लाख लोगो को विदेशो में नौकरी मिल जाए, इसलिए हम 15 करोड़ बच्चो को अंग्रेजी की चक्की में पीसने को तैयार है? हम कितने बुद्धू और क्रूर राष्ट्र है?
और इतना ही नहीं अंग्रेजी के मोह के कारण हम चीनी, जापानी, रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन और हिस्पानी जैसी भाषायें भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते | यही नहीं हम तो अपने देश के अलग अलग राज्यों की भाषाए भी अपने बच्चो को नहीं सिखाते है | हमने अपना संसार बहुत छोटा कर लिया है | यदि हम हमारे बच्चो को अंग्रेजी के साथ साथ अन्य प्रमुख देसी और विदेशी भाषायें सीखने की छूट दे देते तो भारत अपने व्यापार और कूटनीति में अब तक संसार का अग्रणी देश बन जाता |
ज़रा ध्यान दीजिये! यहाँ मैंने छूट देने की बात कही है, थोपने की नहीं | भारत में अनेक विदेशी भाषाए जम कर पढाई जानी चाहिए, जैसी की आजकल चीन में पढाई जा रही है | चीनी लोग अंग्रेजी की गुलामी नहीं कर रहे है, उसे अपना गुलाम बना कर उस से अपना काम निकाल रहे है | अमेरिका में चीनियों की संख्या भारतीयों से भी ज्यादा है | उनके लिए अंग्रेजी महारानी नहीं नौकरानी है | हमने अंग्रेजी को महारानी बना रखा है |
इसलिए 15 करोड़ बच्चो पर हम उसे थोप देते है और एक करोड़ बच्चो से कहते है की तुम्हे जो सीखना हो, वह अंग्रेजी माध्यम से ही सीखो | किसी भी विदेशी भाषा को पढाई का माध्यम बनाना अक्ल के साथ दुश्मनी है | इस पर संवैधानिक प्रतिबन्ध लगना चाहिए | कौन लगायेगा यह प्रतिबन्ध? हमारे सारे नेतागण तो कुर्सी और पैसे के खेल में पगला रहे है |
उन्हें इन बुनियादी सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है | यह काम देश के प्रबुद्ध जन को ही करना होगा | अगर वे कोई ज़बरदस्त जन अभियान चला दे तो अपने देश के बच्चो का बड़ा कल्याण होगा और नेतागण तो अपने आप उसके पीछे चले आयेंगे |
Sunday, March 1, 2009
एकता की मजबूत कड़ी
परदेस में रहते हुए अपने देश को देखने-समझने की कई बार नई दृष्टि मिलती है। अमेरिका में कई अच्छी चीजें है, जिनमें सबसे प्रमुख है वहां के लोगों की राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय चेतना। उनकी यह भावना हमें अपनी स्थिति पर सोचने के लिए विवश और प्रेरित करती है। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके लिए सजग रूप से प्रयास करना पड़ता है और जिसमें बुद्धिजीवियों और नेतृत्व वर्ग की बड़ी भूमिका होती है। हमारा नेतृत्व और अभिजन वर्ग कभी भी इसके लिए बहुत गंभीर नहीं रहा। उसकी दृष्टि हमेशा संकीर्ण रही। हमारी राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्वों में एक है हमारे देश में अनेक भाषाओं का होना। महात्मा गांधी, तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि स्वाधीनता संग्राम के महानायकों ने समझ लिया था कि देश की एकता तब तक नहींहो सकती है जब तक वाणी या भाषा की एकता न हो जाए। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, स्पेन, जापान, चीन आदि देशों में एक मुख्य भाषा है जिसने पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। यह सुविधा अपने देश में नहीं है। हम बहुरंगी भाषा-संस्कृति वाले देश हैं, जो कई बार हमारी सीमा बन जाती है और राष्ट्रीय एकात्मकता नहीं हो पाती है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण अमेरिका में दिखता है। जब विभिन्न देशों के लोग आपस में मिलते है तो वे अपनी राष्ट्र भाषाओं में बात करते है। हम भारतीय उन विरले लोगों में है जो विदेश में भी परस्पर अपनी राष्ट्रभाषा में न बात कर अंग्रेजी में बात करते है और दूसरों की नजर में हास्यास्पद और नीचे हो जाते है। विदेशी लोग सोचते है कि प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का दावा करने वाले इस देश के पास क्या अपनी कोई भाषा नही है? आजादी के साठ साल के बाद भी हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को वह स्थान क्यों नहीं दिला पाए हैं जिसकी वह हकदार है? ऐसा क्यों है, इसको समझने के लिए हमें अपने देश की अब तक की भाषा नीति को समझना होगा।
जब 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना था, तब इसने भाषा-शिक्षा के लिए संघ सरकार से एक नीति निर्धारित करने के लिए कहा। इसके तहत आल इंडिया एजूकेशन काउंसिल की स्थापना की गई, जिसने सितंबर 1956 में अपनी अनुसंशाएं सौंप दी। इस रपट में त्रि-भाषा का फार्मूला सुझाया गया। इसके अनुसार हर राज्य में सेकेंडरी स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा , गैर-हिंदी भाषी राज्यों में वहां की क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। मुख्यमंत्रियों की एक कांफ्रेंस में इसे स्वीकार भी लिया गया। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस त्रि-भाषा फार्मूला को अपनाने की बात की गई। 1986 की शिक्षा नीति और फिर 1992 में भारतीय संसद की कार्ययोजना में भी इसे शामिल किया गया, पर इसका पूरी तरह से तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में केंद्र सरकार ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकी, दूसरी तरफ राज्यों की उदासीनता की वजह से यह योजना एक तरह से ठंडे बस्ते में रह गई। एक जनवरी, 2000 को नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फार स्कूल एजूकेशन ने इस त्रि-भाषा फार्मूले पर विचार करते हुए यह रेखांकित किया कि कुछ राज्यों ने सिर्फ द्वि-भाषा नीति ही अपनाई तो कुछ ने आधुनिक भारतीय भाषा की जगह क्लासिकल भाषाओं जैसे संस्कृत या अरबी को अपनाया। कुछ बोर्डो और संस्थाओं ने तो हिंदी की जगह फ्रेंच या जर्मन भाषा तक को अनुमति दे दी। इस तरह यह नीति जो एक अच्छी और सुविचारित नीति थी और जो देश को एक सूत्र में बांध सकती थी, केंद्र और राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव में कागजों तक ही सीमित रह गई। इसमें गैर हिंदी भाषी राज्यों की अपेक्षा हिंदी भाषी राज्यों के नेतृत्व और अभिजन वर्ग की ज्यादा जिम्मेदारी थी।
आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के राज्यों में बड़ी संख्या में छात्र हिंदी पढ़ते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमें भी किसी अन्य राज्य की भाषा सीख लेनी चाहिए। अगर हम अपनी प्यारी हिंदी को सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा बनाना चाहते है तो हमें अन्य राज्यों की मानसिकता का भी ख्याल रखना होगा। गैर हिंदी भाषियों के इस तर्क और भय को कि इससे हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, हम उन राज्यों की भाषा सीखकर दूर कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता की चिंता किसको है? कुछ लोगों का यह तर्क कि तीन-तीन भाषाएं सीखना एक मुश्किल कार्य होगा, सही नहीं है, क्योंकि आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के छात्र तीन भाषाएं बिना किसी खास कठिनाई के सीख रहे थे। आज भी केरल जैसे राज्य उदाहरण है, जहां बड़ी संख्या में लोग मलयालम और अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी सीखते और जानते है। हिंदी-इतर राज्य अपने को अलग-थलग महसूस करते है और हमें शंका की दृष्टि से देखते है। अगर हम भी कोई दक्षिण भारतीय या अन्य भाषा सीखते तो वे सहर्ष हिंदी सीखने को तैयार होते और हिंदी सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होती। इसके बल पर हमारी राष्ट्रीय एकता और भी मजबूत होती।
यूरोपीय यूनियन की आधिकारिक भाषा नीति है कि अपने देश की भाषा के अलावा कोई दो अन्य विदेशी भाषा सीखना भी जरूरी है। इससे यूरोप की एकता मजबूत हो रही है। जब एक देश के लोग दूसरे देशों की भाषा सीख सकते है तो अपने देश की एकता के लिए इस नियम को लागू न करना राष्ट्रहित की अनदेखी ही कही जाएगी। अमेरिका जैसे अंग्रेजी वाले देश में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर पर एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। उसके बिना डिग्री नहीं मिल सकती है, लेकिन क्या हिंदी भाषी नेतृत्व और अभिजन वर्ग अपनी हिंदी को उसका हक दिलाने के लिए कोई पहल करने के लिए तैयार है?
[राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करना जरूरी मान रहे हैं निरंजन कुमार]
जब 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना था, तब इसने भाषा-शिक्षा के लिए संघ सरकार से एक नीति निर्धारित करने के लिए कहा। इसके तहत आल इंडिया एजूकेशन काउंसिल की स्थापना की गई, जिसने सितंबर 1956 में अपनी अनुसंशाएं सौंप दी। इस रपट में त्रि-भाषा का फार्मूला सुझाया गया। इसके अनुसार हर राज्य में सेकेंडरी स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा , गैर-हिंदी भाषी राज्यों में वहां की क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। मुख्यमंत्रियों की एक कांफ्रेंस में इसे स्वीकार भी लिया गया। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस त्रि-भाषा फार्मूला को अपनाने की बात की गई। 1986 की शिक्षा नीति और फिर 1992 में भारतीय संसद की कार्ययोजना में भी इसे शामिल किया गया, पर इसका पूरी तरह से तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में केंद्र सरकार ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकी, दूसरी तरफ राज्यों की उदासीनता की वजह से यह योजना एक तरह से ठंडे बस्ते में रह गई। एक जनवरी, 2000 को नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फार स्कूल एजूकेशन ने इस त्रि-भाषा फार्मूले पर विचार करते हुए यह रेखांकित किया कि कुछ राज्यों ने सिर्फ द्वि-भाषा नीति ही अपनाई तो कुछ ने आधुनिक भारतीय भाषा की जगह क्लासिकल भाषाओं जैसे संस्कृत या अरबी को अपनाया। कुछ बोर्डो और संस्थाओं ने तो हिंदी की जगह फ्रेंच या जर्मन भाषा तक को अनुमति दे दी। इस तरह यह नीति जो एक अच्छी और सुविचारित नीति थी और जो देश को एक सूत्र में बांध सकती थी, केंद्र और राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव में कागजों तक ही सीमित रह गई। इसमें गैर हिंदी भाषी राज्यों की अपेक्षा हिंदी भाषी राज्यों के नेतृत्व और अभिजन वर्ग की ज्यादा जिम्मेदारी थी।
आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के राज्यों में बड़ी संख्या में छात्र हिंदी पढ़ते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमें भी किसी अन्य राज्य की भाषा सीख लेनी चाहिए। अगर हम अपनी प्यारी हिंदी को सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा बनाना चाहते है तो हमें अन्य राज्यों की मानसिकता का भी ख्याल रखना होगा। गैर हिंदी भाषियों के इस तर्क और भय को कि इससे हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, हम उन राज्यों की भाषा सीखकर दूर कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता की चिंता किसको है? कुछ लोगों का यह तर्क कि तीन-तीन भाषाएं सीखना एक मुश्किल कार्य होगा, सही नहीं है, क्योंकि आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के छात्र तीन भाषाएं बिना किसी खास कठिनाई के सीख रहे थे। आज भी केरल जैसे राज्य उदाहरण है, जहां बड़ी संख्या में लोग मलयालम और अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी सीखते और जानते है। हिंदी-इतर राज्य अपने को अलग-थलग महसूस करते है और हमें शंका की दृष्टि से देखते है। अगर हम भी कोई दक्षिण भारतीय या अन्य भाषा सीखते तो वे सहर्ष हिंदी सीखने को तैयार होते और हिंदी सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होती। इसके बल पर हमारी राष्ट्रीय एकता और भी मजबूत होती।
यूरोपीय यूनियन की आधिकारिक भाषा नीति है कि अपने देश की भाषा के अलावा कोई दो अन्य विदेशी भाषा सीखना भी जरूरी है। इससे यूरोप की एकता मजबूत हो रही है। जब एक देश के लोग दूसरे देशों की भाषा सीख सकते है तो अपने देश की एकता के लिए इस नियम को लागू न करना राष्ट्रहित की अनदेखी ही कही जाएगी। अमेरिका जैसे अंग्रेजी वाले देश में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर पर एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। उसके बिना डिग्री नहीं मिल सकती है, लेकिन क्या हिंदी भाषी नेतृत्व और अभिजन वर्ग अपनी हिंदी को उसका हक दिलाने के लिए कोई पहल करने के लिए तैयार है?
[राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करना जरूरी मान रहे हैं निरंजन कुमार]
Sunday, February 8, 2009
सत्यम जैसे घोटाले रोकने की जरूरत
सत्यम कांड को प्रकाश में आए कुछ हफ्ते बीत चुके हैं, पर आम निवेशक अब तक यह बात साफ तौर पर समझ पाने में असफल है कि आखिर इसमें घोटाला क्या हुआ है। आम निवेशक ही नहीं, ऐसे मामलों में विशेषज्ञ कोटि की जानकारी रखने वालों को भी इस बारे में अब तक ज्यादा कुछ मालूम नहीं चल पाया है।
सत्यम कांड से पहले हमारा देश ऐसे ही घपले-घोटाले वाला हर्षद मेहता प्रकरण देख चुका है। पर 1992 के हर्षद मेहता घोटाले पर कायदे की केस स्टडी, किताबें या शोध अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। वित्तीय प्रबंधन के छात्रों को यह समझाना मुश्किल है कि उस घोटाले में कौन सी प्रक्रियागत, नीतिगत और प्रशासनिक चूकें हुई थीं। वैसी संस्थागत तैयारियां कहीं भी नहीं दिखाई पड़तीं, जिनसे आम निवेशक ऐसे मसलों को समझ पाए, जबकि इनमें ज्यादातर धन तो उसी का डूबता है।
आज वैसे तो कई टीवी चैनल और वेबसाइटें हैं, जो आम निवेशकों को यह राय देती हैं कि फलाना शेयरों में निवेश से फायदा होगा। नुकसान हो जाए, तो फिर बताते हैं कि अब इन नए शेयरों में निवेश करो। लेकिन इस पर चर्चा आम तौर पर नहीं होती कि शेयर बाजार में निवेश के क्या जोखिम हैं और आखिर कोई शेयर कुछ ही दिनों में पांच सौ से दस रुपये का कैसे हो जाता है। दरअसल, इसमें किसी की दिलचस्पी भी नहीं है।
एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था की नींव में मजबूत वित्तीय साक्षरता की बड़ी भूमिका होती है। इसीलिए आज का सच यह है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बहसें करने और किसी कंपनी में स्वतंत्र निदेशकों के हाथ मजबूत करने की बात करने के बावजूद, जब तक आम निवेशक को अपने हित और अपने दायित्वों का पता नहीं होगा, तब तक सत्यम जैसे घोटालों का सिलसिला रोका नहीं जा सकता।
किसी भी कंपनी में निदेशक मूलत: तीन तरह के होते हैं। सबसे ज्यादा और सबसे महत्वपूर्ण निदेशक प्रवर्तक समूह के होते हैं, यानी वे जिन्होंने कंपनी बनाई है। दूसरे निदेशक वे होते हैं, जो महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों से आते हैं, जैसे एलआईसी, जीआईसी, यूटीआई वगैरह से। तीसरी श्रेणी में स्वतंत्र निदेशक होते हैं, जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे स्वतंत्र रूप से और नि:स्वार्थ भाव से कंपनी के निदेशकों की कारगुजारियों पर नजर रखेंगे।
पर सच यह है कि स्वतंत्र निदेशक किसी भी कंपनी में स्वतंत्र नहीं होते, हो भी नहीं सकते। जो भी इन स्वतंत्र निदेशकों को कंपनी में लेकर आता है, उनके प्रति इनकी यह अलिखित जिम्मेदारी बनती है कि वे उनकी कंपनी के लिए कड़े सवाल खड़े नहीं करेंगे। शर्त यही है कि आप हमें आगे भी निदेशक बनाते रहें। इस आपसी समझदारी के तहत कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक बैठे हुए हैं। इसलिए कह सकते हैं कि देश में अभी कई सत्यम घोटालों का सामने आना बाकी है।
नियमों के तहत सत्यम कंपनी में भी स्वतंत्र निदेशक थे। इनमें से एक शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। दूसरे केंद्र सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे। एक और टॉप इंडियन बिजनेस स्कूल के डीन थे। पर ये न तो सत्यम में कुछ भी गलत होते हुए देख पाए और न ही घोटालों को रोक पाए। क्यों? इस सवाल का जवाब यह है कि गतिविधियां ज्ञान से नहीं, स्वार्थ से संचालित होती हैं। स्वतंत्र निदेशक का किसी कंपनी में क्या स्वार्थ हो सकता है? विदेशी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब को कई करोड़ के प्रोजेक्ट सत्यम से मिले थे।
यहां सवाल यह भी है कि कोई बड़ा जानकार अपना समय और ऊर्जा किसी कंपनी के खातों की जांच में क्यों लगाएगा? ऐसा तीन सूरतों में संभव है। एक, जब ऐसा करने की साफ तौर पर जवाबदेही हो। दूसरे, उसके वित्तीय हित ऐसी जांच से जुड़े हों। तीसरे, जब वह राष्ट्रीय सामाजिक हित चेतना के भावों से ओतप्रोत हो। तीसरी संभावना की बात फिलहाल नहीं की जा सकती।
पहली स्थिति यानी किसी कंपनी के खातों की जांच-पड़ताल की जवाबदेही, स्वतंत्र निदेशकों की नहीं बनती। उनके वित्तीय हित किसी कंपनी से 'उचित सवाल नहीं पूछने पर' ही सध सकते हैं, पूछने पर नहीं। ऐसी सूरत में करोड़ों के निवेश आखिर छोड़े किसके भरोसे जाते हैं? इसका जवाब यह है कि प्रवर्तकों की भलमनसाहत के भरोसे। लेकिन अगर कोई प्रवर्तक राजू जैसा निकल जाए, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में क्या सेबी ऐक्ट और क्या कंपनी ऐक्ट- ये सब के सब धरे रह जाते हैं।
प्रवर्तकों की ऐसी प्रवृत्ति पर रोक सिर्फ वे हजारों निवेशक और शेयरधारक ही लगा सकते हैं, जिन्हें बतौर शेयरधारक अपने अधिकारों का पता हो और जिन्हें शेयरों से जुड़ी जिम्मेदारियों का अहसास हो। जो कंपनी की सभा में खड़े होकर पूछ सकें कि मिस्टर राजू, आपके खिलाफ इनकम टैक्स के घपलों का मामला क्या है? एक कंपनी में लगे पब्लिक के पैसों को आप अपने बेटों की कंपनी में क्यों लिवाए जा रहे हैं? अभी तो स्थिति यह है कि दस से 15 प्रतिशत शेयर रख कर प्रवर्तक समूह मालिक समूह घोषित हो जाता है। तकनीकी तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी का कोई एक मालिक नहीं होता। जिसके पास दस शेयर भी हैं, वह भी उस कंपनी का आंशिक मालिक होता है। उसके अपने अधिकार हैं, वह अपनी शंकाओं के निवारण के लिए सवाल पूछ सकता है। पर मसला यह है कि ज्यादातर निवेशक यही समझते हैं कि कंपनी का मालिक कोई दस-बीस प्रतिशत शेयर रखने वाला राजू है। हमें क्या? बड़े संस्थागत निवेशक तब तक कुछ नहीं करते, जब तक शेयर भाव ठीकठाक चल रहे हों। उनकी चिंता तब शुरू होती है, जब शेयर डूबने लगते हैं।
जरूरी यह है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध और पब्लिक से पैसा उगाहने वाली हर कंपनी के आंकड़ों और गतिविधियों पर सवाल उठाने के लिए निवेशक वैसे ही जागरूक हों, जैसे स्वस्थ लोकतंत्र के वोटर होते हैं। इसके लिए वित्तीय साक्षरता की मुहिम चलाई जानी चाहिए। इस मुहिम की अपेक्षा तो वैसे हर्षद मेहता घोटाले के बाद ही थी, पर अब सत्यम के घोटाले के बाद निश्चय ही चेत जाना चाहिए। रिजर्व बैंक, सेबी और कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को इस काम में अहम भूमिका निभानी चाहिए।
आलोक पुराणिक
सत्यम कांड से पहले हमारा देश ऐसे ही घपले-घोटाले वाला हर्षद मेहता प्रकरण देख चुका है। पर 1992 के हर्षद मेहता घोटाले पर कायदे की केस स्टडी, किताबें या शोध अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। वित्तीय प्रबंधन के छात्रों को यह समझाना मुश्किल है कि उस घोटाले में कौन सी प्रक्रियागत, नीतिगत और प्रशासनिक चूकें हुई थीं। वैसी संस्थागत तैयारियां कहीं भी नहीं दिखाई पड़तीं, जिनसे आम निवेशक ऐसे मसलों को समझ पाए, जबकि इनमें ज्यादातर धन तो उसी का डूबता है।
आज वैसे तो कई टीवी चैनल और वेबसाइटें हैं, जो आम निवेशकों को यह राय देती हैं कि फलाना शेयरों में निवेश से फायदा होगा। नुकसान हो जाए, तो फिर बताते हैं कि अब इन नए शेयरों में निवेश करो। लेकिन इस पर चर्चा आम तौर पर नहीं होती कि शेयर बाजार में निवेश के क्या जोखिम हैं और आखिर कोई शेयर कुछ ही दिनों में पांच सौ से दस रुपये का कैसे हो जाता है। दरअसल, इसमें किसी की दिलचस्पी भी नहीं है।
एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था की नींव में मजबूत वित्तीय साक्षरता की बड़ी भूमिका होती है। इसीलिए आज का सच यह है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बहसें करने और किसी कंपनी में स्वतंत्र निदेशकों के हाथ मजबूत करने की बात करने के बावजूद, जब तक आम निवेशक को अपने हित और अपने दायित्वों का पता नहीं होगा, तब तक सत्यम जैसे घोटालों का सिलसिला रोका नहीं जा सकता।
किसी भी कंपनी में निदेशक मूलत: तीन तरह के होते हैं। सबसे ज्यादा और सबसे महत्वपूर्ण निदेशक प्रवर्तक समूह के होते हैं, यानी वे जिन्होंने कंपनी बनाई है। दूसरे निदेशक वे होते हैं, जो महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों से आते हैं, जैसे एलआईसी, जीआईसी, यूटीआई वगैरह से। तीसरी श्रेणी में स्वतंत्र निदेशक होते हैं, जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे स्वतंत्र रूप से और नि:स्वार्थ भाव से कंपनी के निदेशकों की कारगुजारियों पर नजर रखेंगे।
पर सच यह है कि स्वतंत्र निदेशक किसी भी कंपनी में स्वतंत्र नहीं होते, हो भी नहीं सकते। जो भी इन स्वतंत्र निदेशकों को कंपनी में लेकर आता है, उनके प्रति इनकी यह अलिखित जिम्मेदारी बनती है कि वे उनकी कंपनी के लिए कड़े सवाल खड़े नहीं करेंगे। शर्त यही है कि आप हमें आगे भी निदेशक बनाते रहें। इस आपसी समझदारी के तहत कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक बैठे हुए हैं। इसलिए कह सकते हैं कि देश में अभी कई सत्यम घोटालों का सामने आना बाकी है।
नियमों के तहत सत्यम कंपनी में भी स्वतंत्र निदेशक थे। इनमें से एक शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। दूसरे केंद्र सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे। एक और टॉप इंडियन बिजनेस स्कूल के डीन थे। पर ये न तो सत्यम में कुछ भी गलत होते हुए देख पाए और न ही घोटालों को रोक पाए। क्यों? इस सवाल का जवाब यह है कि गतिविधियां ज्ञान से नहीं, स्वार्थ से संचालित होती हैं। स्वतंत्र निदेशक का किसी कंपनी में क्या स्वार्थ हो सकता है? विदेशी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब को कई करोड़ के प्रोजेक्ट सत्यम से मिले थे।
यहां सवाल यह भी है कि कोई बड़ा जानकार अपना समय और ऊर्जा किसी कंपनी के खातों की जांच में क्यों लगाएगा? ऐसा तीन सूरतों में संभव है। एक, जब ऐसा करने की साफ तौर पर जवाबदेही हो। दूसरे, उसके वित्तीय हित ऐसी जांच से जुड़े हों। तीसरे, जब वह राष्ट्रीय सामाजिक हित चेतना के भावों से ओतप्रोत हो। तीसरी संभावना की बात फिलहाल नहीं की जा सकती।
पहली स्थिति यानी किसी कंपनी के खातों की जांच-पड़ताल की जवाबदेही, स्वतंत्र निदेशकों की नहीं बनती। उनके वित्तीय हित किसी कंपनी से 'उचित सवाल नहीं पूछने पर' ही सध सकते हैं, पूछने पर नहीं। ऐसी सूरत में करोड़ों के निवेश आखिर छोड़े किसके भरोसे जाते हैं? इसका जवाब यह है कि प्रवर्तकों की भलमनसाहत के भरोसे। लेकिन अगर कोई प्रवर्तक राजू जैसा निकल जाए, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में क्या सेबी ऐक्ट और क्या कंपनी ऐक्ट- ये सब के सब धरे रह जाते हैं।
प्रवर्तकों की ऐसी प्रवृत्ति पर रोक सिर्फ वे हजारों निवेशक और शेयरधारक ही लगा सकते हैं, जिन्हें बतौर शेयरधारक अपने अधिकारों का पता हो और जिन्हें शेयरों से जुड़ी जिम्मेदारियों का अहसास हो। जो कंपनी की सभा में खड़े होकर पूछ सकें कि मिस्टर राजू, आपके खिलाफ इनकम टैक्स के घपलों का मामला क्या है? एक कंपनी में लगे पब्लिक के पैसों को आप अपने बेटों की कंपनी में क्यों लिवाए जा रहे हैं? अभी तो स्थिति यह है कि दस से 15 प्रतिशत शेयर रख कर प्रवर्तक समूह मालिक समूह घोषित हो जाता है। तकनीकी तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी का कोई एक मालिक नहीं होता। जिसके पास दस शेयर भी हैं, वह भी उस कंपनी का आंशिक मालिक होता है। उसके अपने अधिकार हैं, वह अपनी शंकाओं के निवारण के लिए सवाल पूछ सकता है। पर मसला यह है कि ज्यादातर निवेशक यही समझते हैं कि कंपनी का मालिक कोई दस-बीस प्रतिशत शेयर रखने वाला राजू है। हमें क्या? बड़े संस्थागत निवेशक तब तक कुछ नहीं करते, जब तक शेयर भाव ठीकठाक चल रहे हों। उनकी चिंता तब शुरू होती है, जब शेयर डूबने लगते हैं।
जरूरी यह है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध और पब्लिक से पैसा उगाहने वाली हर कंपनी के आंकड़ों और गतिविधियों पर सवाल उठाने के लिए निवेशक वैसे ही जागरूक हों, जैसे स्वस्थ लोकतंत्र के वोटर होते हैं। इसके लिए वित्तीय साक्षरता की मुहिम चलाई जानी चाहिए। इस मुहिम की अपेक्षा तो वैसे हर्षद मेहता घोटाले के बाद ही थी, पर अब सत्यम के घोटाले के बाद निश्चय ही चेत जाना चाहिए। रिजर्व बैंक, सेबी और कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को इस काम में अहम भूमिका निभानी चाहिए।
आलोक पुराणिक
Thursday, February 5, 2009
उनका और हमारा प्रजातंत्र
कोई भी समस्या हो, हम अमेरिका की ओर निहारते है। अमेरिकी लोग जिद के पक्के होते हैं और उनका यह स्वभाव वहां के प्रजातंत्र में झलकता है। बराक ओबामा के बच्चों के स्कूल पांच जनवरी से खुल रहे थे। इसलिए उन्होंने बुश प्रशासन से अस्थाई निवास आवंटित कराने का अनुग्रह किया, लेकिन प्रशासन ने वाशिंगटन में कोई भी सरकारी आवास आवंटित करने में असमर्थता जता दी। एक राज्य के गवर्नर टेलीफोन पर एक प्रत्याशी से सीनेट में नामांकित करने के लिए कुछ अनुग्रह कर थे कि तभी एफबीआई ने उनको गिरफ्तार कर लिया। आठ वर्ष राष्ट्रपति रहने के पश्चात जब बिल क्लिंटन अपने निवास लौटे तो सामान बांधने वालों ने भूलवश एक सोफा उनके सामान के साथ बांध दिया। इस कारण उन्हे 3600 डालर भरने पड़े। उपराष्ट्रपति डिक चेनी को विलंब से आने के कारण सीनेट के सदस्यों का कोपभाजन बनना पड़ा। उनके विलंब से आने का कारण यह था कि उन्हें पार्किग शुल्क जमा करने के लिए लाइन में लगना पड़ा था। राष्ट्रपति द्वारा मंत्रियों की नियुक्ति प्रस्तावित करने के बाद सीनेट की कमेटी जब तक उनकी बखिया नहीं उधेड़ लेती तब तक उनकी नियुक्ति नहीं होती।
न्यूजर्सी के गवर्नर को अपने मातहत के साथ समलैगिंक संबंधों और एक सीनेटर को कालगर्ल से मित्रता के कारण अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा। यह तो रहा इन लोगों का प्रजातंत्र। अब एक बानगी विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की देखिए। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री का राजकीय निवास कालिदास मार्ग पर है। इसके अतिरिक्त भूतपूर्व मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा आवास माल एवेन्यू में है, जिसका हमेशा विस्तार होता रहता है। तीसरा निवास दिल्ली में है। इसके अतिरिक्त एक विशाल निजी निवास लखनऊ कैंट में है। राजकीय नियमों के अनुसार किसी भी राजकीय पदाधिकारी को एक से अधिक निवास आवंटित नहीं हो सकता। यही नहीं, नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव-सबको एक सरकारी आवास लखनऊ में भूतपूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते तथा दूसरा दिल्ली में आवंटित है। नौकरशाह और अन्य राजनेता भी पीछे नहीं है, जो सेवानिवृत्ति के पश्चात भी सरकारी बंगलों का मोह नहीं त्याग पाते। यह स्थिति तब है जब एक व्यक्ति को एक से अधिक आवास आवंटित न करने का सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। यदि बुश प्रशासन हमसे कुछ सबक सीख सकता तो बेचारे ओबामा को होटल में रोजाना 1200 डालर खर्च न करने पड़ते। इस मामले में हम अमेरिका से बहुत आगे है। हमारी हर राजनीतिक पार्टी ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विजयी संभावना का आकलन कर टिकटों का मूल्य निर्धारित कर रखा हैं। जो मूल्य चुकाएगा वह टिकट पाएगा। लाखों और करोड़ों रुपये की दरे है। उसके पश्चात भी यह आवश्यक नहीं टिकटधारी चुनाव में विजयी हो जाए। राज्य की राजनीति में सक्रिय नेताओं को भी चिंता की कोई बात नहीं। सरकार भी तो उनके हीपुण्य प्रतापों का फल है। डाक बंगलों की चादरे, तौलिए, क्राकरी तथा सरकारी बंगलों का फर्नीचर, एयर कंडीशनर, स्टेशनरी आदि भी तो नेताओं की निजी संपत्ति ही हैं। गुंडों और माफिया तत्वों के लिए भी राजनीति में भरपूर अवसर हैं। उत्तर प्रदेश में जेल में बंद एक नेता को शायद माफियाओं के प्रतिनिधि के रूप में शपथ लेने सीधे जेल से राजभवन लाया गया था, जबकि वह कोई राजनीतिक अपराधी नहीं, बल्कि हत्या के अपराध में बंदी था। आने वाले चुनाव में नामी-गिरामी माफियाओं के आकाओं को अपनी-अपनी पार्टी से टिकट देने की होड़ लगी है। इन सब पार्टियों का लक्ष्य मात्र संसद में संख्या वृद्धि करना है, न कि स्वच्छ प्रतिनिधित्व या जनसेवा। वैसे भी जीतकर जब शासन की डोर हाथ में आ जाती है तो जनसेवा तो वैसे ही बिना धन सेवा के प्राप्त नहीं होती। फिर आदर्श जनसेवकों को चुनने से क्या लाभ? हमारे मतदाता भी अब दमदार प्रत्याशी को ही अपना मत देते है। जो जितना बड़ा माफिया है उसके विजयी होने के अवसर उतने अधिक है। इसीलिए आम भारतीय को परिणिता से ज्यादा गजनी फिल्म भाती है। पुलिस भी एक साधारण मामले की रपट तभी लिखती है जब किसी माफिया का प्यादा उसके साथ थाने जाए। उनका वर्चस्व इतना है कि वे जेल की चहारदीवारियों के अंदर से चुनाव धड़ल्ले से जीतते है। यदि सिर्फ एक राज्य उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो पिछली विधानसभा में 207 दागी विजयी हुए थे। इस बार कुछ सुधार हुआ है और मात्र 155 दागी ही विधायक बनकर आए। कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल में 19 दागी मंत्री थे। अब यह संख्या 22 हो गई है। जैसे आसार नजर आ रहे है, अगले चुनाव में उतरने वाले आपराधिक छवि और इतिहास वाले लोगों की संख्या बढ़ने की संभावना है।
यह विडंबना ही है कि जार्ज बुश के साथ हमारे राष्ट्र के इतने अच्छे संबंध होने के पश्चात भी हम अमेरिका से यह नहीं सीख सके कि सार्वजनिक पदों पर रहने वाले लोगों को कितना साफ-सुथरा जीवन बिताना चाहिए। यदि रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल करने के भारतीय राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों को अपना लिया होता तो उसकी पराजय नहीं होती। बुश ने सभ्य, भले तथा युद्ध के नामी योद्धा जान मैक्केन को चुनावी जंग में उतारा। यदि किसी माफिया को उतारा गया होता तो शायद उसकी यह फजीहत नहीं होती। चुनाव भी उन्होंने घिसे-पिटे मुद्दों पर लड़ा, जैसे आर्थिक व्यवस्था का ह्रास, प्रदूषण, र्इंधन के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा आदि। उन्होंने न कंबल बांटे, न साइकिल और शराब को छुआ। ऐसे में भला इस युग में कोई चुनाव जीत सकता है? हमारे मतदाताओं को अपने स्वर्णिम वोट का एक सुनहरा अवसर कुछ ही महीनों में फिर मिलने लगा है। इस बार देखते है कि वह किस प्रजातंत्र का वरण करते है? उसका जो अमेरिका वालों ने चुना है या वह जो हमारे यहां बाहुबल से संचालित होता है? प्रतीक्षा कर अनुभव करने की बात है।
[हरीशचंद्र पंत राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी हैं]
न्यूजर्सी के गवर्नर को अपने मातहत के साथ समलैगिंक संबंधों और एक सीनेटर को कालगर्ल से मित्रता के कारण अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा। यह तो रहा इन लोगों का प्रजातंत्र। अब एक बानगी विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की देखिए। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री का राजकीय निवास कालिदास मार्ग पर है। इसके अतिरिक्त भूतपूर्व मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा आवास माल एवेन्यू में है, जिसका हमेशा विस्तार होता रहता है। तीसरा निवास दिल्ली में है। इसके अतिरिक्त एक विशाल निजी निवास लखनऊ कैंट में है। राजकीय नियमों के अनुसार किसी भी राजकीय पदाधिकारी को एक से अधिक निवास आवंटित नहीं हो सकता। यही नहीं, नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव-सबको एक सरकारी आवास लखनऊ में भूतपूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते तथा दूसरा दिल्ली में आवंटित है। नौकरशाह और अन्य राजनेता भी पीछे नहीं है, जो सेवानिवृत्ति के पश्चात भी सरकारी बंगलों का मोह नहीं त्याग पाते। यह स्थिति तब है जब एक व्यक्ति को एक से अधिक आवास आवंटित न करने का सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। यदि बुश प्रशासन हमसे कुछ सबक सीख सकता तो बेचारे ओबामा को होटल में रोजाना 1200 डालर खर्च न करने पड़ते। इस मामले में हम अमेरिका से बहुत आगे है। हमारी हर राजनीतिक पार्टी ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विजयी संभावना का आकलन कर टिकटों का मूल्य निर्धारित कर रखा हैं। जो मूल्य चुकाएगा वह टिकट पाएगा। लाखों और करोड़ों रुपये की दरे है। उसके पश्चात भी यह आवश्यक नहीं टिकटधारी चुनाव में विजयी हो जाए। राज्य की राजनीति में सक्रिय नेताओं को भी चिंता की कोई बात नहीं। सरकार भी तो उनके हीपुण्य प्रतापों का फल है। डाक बंगलों की चादरे, तौलिए, क्राकरी तथा सरकारी बंगलों का फर्नीचर, एयर कंडीशनर, स्टेशनरी आदि भी तो नेताओं की निजी संपत्ति ही हैं। गुंडों और माफिया तत्वों के लिए भी राजनीति में भरपूर अवसर हैं। उत्तर प्रदेश में जेल में बंद एक नेता को शायद माफियाओं के प्रतिनिधि के रूप में शपथ लेने सीधे जेल से राजभवन लाया गया था, जबकि वह कोई राजनीतिक अपराधी नहीं, बल्कि हत्या के अपराध में बंदी था। आने वाले चुनाव में नामी-गिरामी माफियाओं के आकाओं को अपनी-अपनी पार्टी से टिकट देने की होड़ लगी है। इन सब पार्टियों का लक्ष्य मात्र संसद में संख्या वृद्धि करना है, न कि स्वच्छ प्रतिनिधित्व या जनसेवा। वैसे भी जीतकर जब शासन की डोर हाथ में आ जाती है तो जनसेवा तो वैसे ही बिना धन सेवा के प्राप्त नहीं होती। फिर आदर्श जनसेवकों को चुनने से क्या लाभ? हमारे मतदाता भी अब दमदार प्रत्याशी को ही अपना मत देते है। जो जितना बड़ा माफिया है उसके विजयी होने के अवसर उतने अधिक है। इसीलिए आम भारतीय को परिणिता से ज्यादा गजनी फिल्म भाती है। पुलिस भी एक साधारण मामले की रपट तभी लिखती है जब किसी माफिया का प्यादा उसके साथ थाने जाए। उनका वर्चस्व इतना है कि वे जेल की चहारदीवारियों के अंदर से चुनाव धड़ल्ले से जीतते है। यदि सिर्फ एक राज्य उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो पिछली विधानसभा में 207 दागी विजयी हुए थे। इस बार कुछ सुधार हुआ है और मात्र 155 दागी ही विधायक बनकर आए। कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल में 19 दागी मंत्री थे। अब यह संख्या 22 हो गई है। जैसे आसार नजर आ रहे है, अगले चुनाव में उतरने वाले आपराधिक छवि और इतिहास वाले लोगों की संख्या बढ़ने की संभावना है।
यह विडंबना ही है कि जार्ज बुश के साथ हमारे राष्ट्र के इतने अच्छे संबंध होने के पश्चात भी हम अमेरिका से यह नहीं सीख सके कि सार्वजनिक पदों पर रहने वाले लोगों को कितना साफ-सुथरा जीवन बिताना चाहिए। यदि रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल करने के भारतीय राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों को अपना लिया होता तो उसकी पराजय नहीं होती। बुश ने सभ्य, भले तथा युद्ध के नामी योद्धा जान मैक्केन को चुनावी जंग में उतारा। यदि किसी माफिया को उतारा गया होता तो शायद उसकी यह फजीहत नहीं होती। चुनाव भी उन्होंने घिसे-पिटे मुद्दों पर लड़ा, जैसे आर्थिक व्यवस्था का ह्रास, प्रदूषण, र्इंधन के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा आदि। उन्होंने न कंबल बांटे, न साइकिल और शराब को छुआ। ऐसे में भला इस युग में कोई चुनाव जीत सकता है? हमारे मतदाताओं को अपने स्वर्णिम वोट का एक सुनहरा अवसर कुछ ही महीनों में फिर मिलने लगा है। इस बार देखते है कि वह किस प्रजातंत्र का वरण करते है? उसका जो अमेरिका वालों ने चुना है या वह जो हमारे यहां बाहुबल से संचालित होता है? प्रतीक्षा कर अनुभव करने की बात है।
[हरीशचंद्र पंत राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी हैं]
Thursday, January 29, 2009
गरीबी की नुमाइश
ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड उत्तर प्रदेश में अमेठी के एक गांव सेमरा में दलित विधवा के घर ग्रामीण भारत की गरीबी देखने गए थे। गरीबी जैसे नुमाइश की चीज हो या जैसे कि यह कोई भारतीय उद्योग हो। वह अमीरी के प्रतिनिधि हैं। जिस हालत में उस महिला शिवकुमारी की जिंदगी चल रही है उसी हाल में कमोबेश 30 प्रतिशत भारत है। शिवकुमारी ने जैसे-तैसे उन बड़े मेहमानों का स्वागत किया। बहुत से भारतीयों की तरह शिवकुमारी भी नहीं समझ पाई कि उसकी गरीबी और अभाव के जिम्मेदार दरअसल इन्हीं गोरे साहबों के पूर्वज रहे हैं। 1610 में जहांगीर के दरबार में व्यापारियों के रूप में इनका पहला जत्था पहुंचा था। जहांगीर के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी इंग्लैंड के अपराधी प्रवृत्ति के समाज बहिष्कृत दुष्ट नाविकों की संस्था है। 1757 के पहले तक भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में शुमार था। ये दुर्भाग्य की काली छाया लेकर आए। मसाले, दस्तकारी के समान का कारोबार कर उन्होंने अकूत धन कमाया। फिर उनके उद्योगों में पैदा माल को खपाने के लिए स्थानीय उद्योगों का नाश कर भारत को सिर्फ बाजार बना दिया गया। उन्होंने राज्यों को हड़प कर राजस्व की वसूली पर कब्जा किया। भारत से कच्चे माल की आपूर्ति भी उन्होंने अपने हाथ में ले ली। अर्थव्यवस्था का कोई पक्ष ऐसा नहीं था जो उनके शोषण से मुक्त रहा हो। सूदखोरी उन्होंने चलाई। शिवकुमारी के पूर्वज जहांगीर, शाहजहां के जमाने में दस्तकार रहे होंगे या कोई कारोबार करते होंगे। उस जमाने में किसानों, मजदूरों के लिए भी बहुत काम था।
इतिहास गवाह है कि गोरों की कौम ने औद्योगिक क्रांति की सफलता के लिए हिंदुस्तानी दस्तकारों, श्रमिकों का भयंकर शोषण किया था। कपड़ा उद्योग ध्वस्त करने के लिए बताते हैं कि बुनकरों के अंगूठे तक काटे गए। यह सब शिवकुमारी और उसके बच्चों को नहीं मालूम। कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है। वर्तमान शिक्षा में कोई किसान अच्छा किसान, दस्तकार अच्छा दस्तकार, बुनकर अच्छा बुनकर नहीं बनता। हमारी शिक्षा हमें अच्छा ड्राइवर, अच्छा मैकेनिक भी नहीं बनाती। अंग्रेजी पढ़ाई हमें बाबू बनाने के लिए थी। अगर तुम बाबू नहीं बन सके तो किसी काम के न होकर नौकरी तलाश करते हुए बेकार रहोगे। उनके इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने भारत को एक देश बनाया। अंग्रेजी भाषा दी, ज्ञान दिया। ताज्जुब है भारत से तीन गुना बड़ा चीन कैसे बिना अंग्रेजों के एक किए हुए एक देश बना हुआ है? कैसे बिना अंग्रेजी के वे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते जा रहे हैं। भारत से चले जाने के बाद भी वे हममें गुलाम मानसिकता छोड़ गए हैं। अपना इतिहास न जानना इस देश की बड़ी परेशानियों में से एक है। इसीलिए इतिहास से सबक की बात भी नहीं उठती। पता नहीं सेमरा के कितने लोग जानते हैं कि करीब ही स्थित जबरौली और पुरवा में उन्हीं गोरे शोषकों के खिलाफ 1858 में सुल्तानपुर, रायबरेली के लोगों ने अपने राजाओं के नेतृत्व में कितनी जबरदस्त जंग लड़ी थी। सेमरा की गरीबी दिखाने के साथ-साथ मिलिबैंड को वह जंग का मैदान भी दिखाया जाना चाहिए था, जहां नवंबर 1858 में उनके पूर्वजों के खिलाफ राजा बेनी माधव ने शहादत का आखिरी मोर्चा लगाया था। उन्हें वे पीपल और बरगद के वृक्ष भी दिखाए जाने चाहिए थे, विजय के बाद जिन पर लटका कर गर्वाेन्मत्त अंग्रेजों ने सैकड़ों बागियों को सजा-ए-मौत दी थी।
फिर भी उनके अमेठी तक आ जाने का असल मकसद क्या था? व्यक्तिगत रिश्तों के चलते अगर वह निजी यात्रा पर होते तो कोई बात नहीं, लेकिन वह ब्रिटिश मंत्री होकर आए और बाकायदा प्रेस से मुखातिब हुए। अगर कोई विदेशी सरकार का मंत्री यहां आकर दलीय रुझान दिखाता है तो उसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर लिया जाना चाहिए। श्रीमान मिलिबैंड अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह भी कह गए कि मुंबई हमले के आरोपियों पर मुकदमा अगर पाकिस्तान में ही चले कोई हर्ज नहीं है। ब्रिटिश डिप्लोमेसी ने अपना रंग बदल लिया है, यह साफ जाहिर है। उन्हें पाकिस्तान की जरूरत है। पता नहीं हम क्यों इतने मजबूर देश बने हुए हैं? कमजोरियां न सेनाओं में हैं और न हिंदुस्तान के जज्बे में, समस्या तो उस व्यवस्था में है जो इस देश के लायक अपना असल नेता नहीं खोज पा रही है। जब हम नेता खोजते हैं तो राजनीतिक चापलूस हमारे सामने घराने बैठा देते हैं। आज हम गुलाम नहीं हैं, लेकिन इस लंबे दौर में गुलामी का अर्क रिसकर हमारी आत्माओं में जा बसा है। काश! मिलिबैंड शिवकुमारी और सारे भारत से उन अपराधों के लिए क्षमा मांगते जो उनकी कौम ने हम पर किए हैं। उनकी कौम सिराजुद्दौला से लेकर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस तक सबकी गुनाहगार है।
[आर. विक्रम सिंह पूर्व सैन्य अधिकारी हैं]
इतिहास गवाह है कि गोरों की कौम ने औद्योगिक क्रांति की सफलता के लिए हिंदुस्तानी दस्तकारों, श्रमिकों का भयंकर शोषण किया था। कपड़ा उद्योग ध्वस्त करने के लिए बताते हैं कि बुनकरों के अंगूठे तक काटे गए। यह सब शिवकुमारी और उसके बच्चों को नहीं मालूम। कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अंग्रेजों की दी हुई हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है। वर्तमान शिक्षा में कोई किसान अच्छा किसान, दस्तकार अच्छा दस्तकार, बुनकर अच्छा बुनकर नहीं बनता। हमारी शिक्षा हमें अच्छा ड्राइवर, अच्छा मैकेनिक भी नहीं बनाती। अंग्रेजी पढ़ाई हमें बाबू बनाने के लिए थी। अगर तुम बाबू नहीं बन सके तो किसी काम के न होकर नौकरी तलाश करते हुए बेकार रहोगे। उनके इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने भारत को एक देश बनाया। अंग्रेजी भाषा दी, ज्ञान दिया। ताज्जुब है भारत से तीन गुना बड़ा चीन कैसे बिना अंग्रेजों के एक किए हुए एक देश बना हुआ है? कैसे बिना अंग्रेजी के वे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते जा रहे हैं। भारत से चले जाने के बाद भी वे हममें गुलाम मानसिकता छोड़ गए हैं। अपना इतिहास न जानना इस देश की बड़ी परेशानियों में से एक है। इसीलिए इतिहास से सबक की बात भी नहीं उठती। पता नहीं सेमरा के कितने लोग जानते हैं कि करीब ही स्थित जबरौली और पुरवा में उन्हीं गोरे शोषकों के खिलाफ 1858 में सुल्तानपुर, रायबरेली के लोगों ने अपने राजाओं के नेतृत्व में कितनी जबरदस्त जंग लड़ी थी। सेमरा की गरीबी दिखाने के साथ-साथ मिलिबैंड को वह जंग का मैदान भी दिखाया जाना चाहिए था, जहां नवंबर 1858 में उनके पूर्वजों के खिलाफ राजा बेनी माधव ने शहादत का आखिरी मोर्चा लगाया था। उन्हें वे पीपल और बरगद के वृक्ष भी दिखाए जाने चाहिए थे, विजय के बाद जिन पर लटका कर गर्वाेन्मत्त अंग्रेजों ने सैकड़ों बागियों को सजा-ए-मौत दी थी।
फिर भी उनके अमेठी तक आ जाने का असल मकसद क्या था? व्यक्तिगत रिश्तों के चलते अगर वह निजी यात्रा पर होते तो कोई बात नहीं, लेकिन वह ब्रिटिश मंत्री होकर आए और बाकायदा प्रेस से मुखातिब हुए। अगर कोई विदेशी सरकार का मंत्री यहां आकर दलीय रुझान दिखाता है तो उसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर लिया जाना चाहिए। श्रीमान मिलिबैंड अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह भी कह गए कि मुंबई हमले के आरोपियों पर मुकदमा अगर पाकिस्तान में ही चले कोई हर्ज नहीं है। ब्रिटिश डिप्लोमेसी ने अपना रंग बदल लिया है, यह साफ जाहिर है। उन्हें पाकिस्तान की जरूरत है। पता नहीं हम क्यों इतने मजबूर देश बने हुए हैं? कमजोरियां न सेनाओं में हैं और न हिंदुस्तान के जज्बे में, समस्या तो उस व्यवस्था में है जो इस देश के लायक अपना असल नेता नहीं खोज पा रही है। जब हम नेता खोजते हैं तो राजनीतिक चापलूस हमारे सामने घराने बैठा देते हैं। आज हम गुलाम नहीं हैं, लेकिन इस लंबे दौर में गुलामी का अर्क रिसकर हमारी आत्माओं में जा बसा है। काश! मिलिबैंड शिवकुमारी और सारे भारत से उन अपराधों के लिए क्षमा मांगते जो उनकी कौम ने हम पर किए हैं। उनकी कौम सिराजुद्दौला से लेकर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस तक सबकी गुनाहगार है।
[आर. विक्रम सिंह पूर्व सैन्य अधिकारी हैं]
Wednesday, December 31, 2008
कश्मीर में किस भारत का चेहरा दिखा?
लोकतंत्र की विडंबना देखिए कि जिस प्रान्त से पांच लाख हिन्दुओं को प्रताड़ित कर निकाल दिया गया और 1947 में मुजफ्फराबाद से बेघर हुए शरणार्थियों को अभी तक मतदान का अधिकार नहीं दिया गया, वहां सिर्फ इसलिए लोकतंत्र की जीत के नारे बुलंद हो रहे हैं क्योंकि भारत से अलग होने की मांग करने वाले गिलानी और उनकी हुर्रियत की अपील पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। असली सवाल तो यह उठता है कि इन चुनावों में जो जीते वे किन मुद्दों पर सफल हुए और उनका भारत की एकता पर क्या दूरगामी परिणाम होगा। क्या नैशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की जीत से कश्मीर घाटी को शेष देश से समरस बनाने की इच्छा रखने वाले भारतीयों का बढ़ेगा क्योंकि उमर और महबूबा ही पिछली सरकार को गिराने के लिए जिम्मेदार रहे थे जिनकी तात्कालिक राजनीति का एक ही नारा था - ‘ अमरनाथ के हिन्दू यात्रियों हेतु श्राइनबोर्ड को एक इंच जमीन नहीं देंगे ' ।
जम्मू के अभूतपूर्व सत्याग्रह ने उनकी जिद पलटवा दी और वहां से बीजेपी के ग्यारह विधायकों की जीत ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में केसरिया पक्ष को पुन महत्वपूर्ण सिद्ध कर दिया। वास्तव में दिल्ली में शीला दीक्षित की तीसरी बार विजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है जम्मू में बीजेपी का गत चुनावों की तुलना में ग्यारह गुना ज्यादा बलशाली होकर लौटना। हांलाकि जम्मू में इस महत्वपूण जीत को सेकुलर मीडिया हल्का करके बता रहा है और कुछ ने तो इसे चिन्ताजनक भी कहा है। परन्तु रोचक तथ्य यह है कि जो मीडिया विश्लेषक बीजेपी की जीत बहुत चिन्ताजनक बता रहे हैं वे जम्मू क्षेत्र में पहली बार मुफ्ती की अलगाववाद समर्थक पार्टी पीडीपी के दो विधायक चुने जाने पर खामोश हैं। उल्लेखनीय है कि अमरनाथ सत्याग्रह के समय महबूबा मुफ्ती और उमर अबदुल्ला एक दूसरे के खिलाफ होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति एक जैसा रुख अपनाए हुए थे। उमर ने लोकसभा में एक ‘ मुसलमान ’ के नाते भाषण देकर सनसनी फैला दी थी और महबूबा मुफ्ती अलगाववादियों का साथ देने वाली ‘ आग्नेय राजनेता ’ के नाते पहचान बना रही थीं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि इन चुनावों में अलगाववादी पूरी तरह हारे हैं। वास्तव में अलगाववादी दलों के थके हुए नेताओं से समर्थकों को मायूसी मिल रही थी और अब उनकी जगह महबूबा और मुफ्ती सईद जैसे नेताओं ने ले ली है जो बेहतर एवं प्रभावी ढंग से अलगाववादियों को बचा सकते हैं।
सत्ता राजनीति के समीकरणों में हिस्सेदारी से उनका दिल्ली की सरकार पर भी प्रभाव ज्यादा रहता है। जहां तक कश्मीर में आतंकवाद के अंत का प्रश्न है, उसमें इन राजनेताओं की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वे आतंकवाद के परिणामों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए आतुर रहते हैं। वर्ना दहशतगर्दी के खिलाफ कश्मीर के राजनीतिक दल क्यों चुप रहते? सिवाय बीजेपी के, किसी भी राजनीतिक दल ने अपने चुनाव प्रचार या घोषणा पत्र में आतंकवाद खत्म करने का जिक्र तक नहीं किया। विडम्बना यह है कि हर क्षेत्र में जम्मू से घनघोर भेदभाव बनाए रखने वालीं पार्टियों को ही जम्मू क्षेत्र में भी बहुमत मिला है। यहां की 37 सीटों पर सिर्फ 11 ही उस बीजेपी की झोली में आयी हैं जो भेदभाव के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतरी थी। जिसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु (जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा श्री लालकृष्ण आडवाणी ने हत्या कहा था) के पीछे भी जम्मू कश्मीर के शेष भारत के साथ समानता के आधार पर विलय की मांग थी। डॉ. मुखर्जी का बलिदान इस कारण हुआ कि जम्मू कश्मीर में तिरंगे की शान बनी रहे और वहां भिन्न विधान, प्रधान व झंडे की जगह सिर्फ तिरंगा फहरे, दो अलग अलग कानून न रहे तथा जम्मू के साथ कश्मीर के घाटी के बहुसंख्यक मुस्लिम भेदभाव न करें। पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें जम्मू में प्रवेश करते ही गिरफ्तार करवा कर श्रीनगर के निशांतबाग के पास एक बगलानुमा मकान में नजरबंदी करवा दिया। उनके पोते उमर अब्दुल्ला उन लोगों के साथ पांच साल सत्ता में रहे जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं।
वक्त जब बदलता है तो राजनीति का चेहरा भी नया बनता है। आज उमर अब्दुल्ला की अनेक कारणों से मीडिया में प्रशंसा की जा रही है। वे युवा है, तेजतर्रार राजनीति के नए चेहरे हैं, कश्मीरी मुश्लिम हैं और भारतीय एकता के बारे में असंदिग्ध विचार रखते आ रहे हैं। उनका व्यक्तित्व करिश्माई है और हालांकि अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर संसद में अपने भाषण के तीखे मुस्लिम तेवरों के कारण उनकी विवादास्पद चर्चा हुई, फिर भी उन्हें महबूबा की तरह अलगाववादी नहीं कहा जा सकता। उमर टीवी चैनलों पर तर्कपूर्ण जोरदार ढंग से अपनी बात रखते हैं और कांग्रेस की नई उभरती पीढ़ी के साथ हम कदम नए जोश और नए ताजगी भरे भविष्य का संकेत देते हैं। जिस पीढ़ी में सचिन पायलट (उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सचिन पायलट का विवाह उमर की सगी बहन सारा से हुआ है और इस विवाह का उमर तथा उनके पिता फारूख ने विरोध व बहिष्कार किया था), ज्योतिरादित्य सिंधिया , मिलिंद देवड़ा और निस्संदेह इन सबके नेता राहुल गांधी आकृष्ट करते हैं। इनके तेवर और परिपक्वता का आने वाले वक्त में पता चलेगा, क्योंकि सत्ता से बाहर का मामला अलग होता है और सत्ता संभालने के बाद मुद्दे संभालना एकदम अलग।
दुख की बात यह है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव विश्लेषण में कहीं भी लद्दाख के चुनावों का जिक्र नहीं हुआ-जिसका क्षेत्रफल घाटी और जम्मू से भी बड़ा है। यहां से चार विधायक चुने गए और आश्चर्यजनक रूप से लद्दाख के लिए केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा मांगने वाले मोर्चे के नेता थुप्तान छेवांग कांग्रेसी उम्मीदवार नवांग रिग्जिन से मात्र डेढ़ हजार मतों से हार गए। आरोप है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए मस्जिदों से फतवे जारी करवाये गए। इससे यहां बौद्व मुस्लिम दूरियां बढ़ने की आशंका होगी।
क्या उमर का श्रीनगर में सत्ता संभालना घाटी में भारत की प्रभुता और वर्चस्व के साथ-साथ शांति और हिन्दुओं की वापसी सुनिश्चित करेगा? या वे भी वक्त बिताने और सम्पदा कमाने का वही काम करेंगे जो उनसे पहले के मुख्यमंत्री करते आए? क्या उमर अब्दुल्ला को कश्मीर की भारत से पृथकता बनाए रखने में अपनी भारतीयता सार्थक होती दिखती है? क्या वे 22 फरवरी 1994 के दिन भारत की संसद के द्वारा पारित उस प्रस्ताव को अपने कमरे में लगाना उचित मानेंगे जिस प्रस्ताव में पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर को वापस लेने का संकल्प किया गया है? क्या उमर सिर्फ मुस्लिम पृथकतावादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जैसे - उन्होंने अमरनाथ यात्रा के समय हिन्दुओं को एक इंच जमीन न देने के ऐलान के साथ किया था - कश्मीर में हिन्दु विहीन जम्हूरियत का जश्न मनाएंगे या जम्हूरियत के मायने सबको साथ लेकर देशभक्ति का पाठ सिखाना भी मानेंगे ? यदि उमर उब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने तो उनकी गाड़ी, बंगले और विधानसभा पर दो झंडे फहराए जाएंगे - एक भारत का तिरंगा और दूसरा कश्मीर का हल के निशान वाला लाल झंडा। यदि भारत के दूसरे किसी भी राज्य को अपने पृथक झंडे की आवश्यकता नहीं है तो कश्मीर को क्यों है, यह बात कोई भारतीय कश्मीरी नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा?
ऐसी परिस्थिति में यह समय जम्मू कश्मीर में पुनः उनकी कठिन परीक्षा का है जो डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में हर साल दो बार आयोजन करते हैं और जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के पक्षधर हैं। बीजेपी को 11 स्थान मिले, पर ज्यादा भी मिल सकते थे - अमरनाथ संघर्ष का ज्वार बहुत ऊंचाई तक पहुंचा था। उन्हें सोचना होगा कि पहली बार जम्मू क्षेत्र में पीडीपी का पदार्पण कैसे हुआ? बिस्नाह, डोडा जैसे घायल और नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस की नीतियों से लहुलुहान क्षेत्र उनके हाथ से क्यों फिसले? राजनीति में बीजेपी सत्ता के लिए नहीं, सत्ता के राष्ट्रहित में उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। उस पर जनता का भरोसा नेताओं की व्यक्तिगत छवि से बढ़कर विचारधारा और पूर्वकालीन नेताओं की शहादत के कारण है। यही साख व भरोसा बीजेपी की सबसे बड़ी पूंजी रही है। धर्म, वैभव और सत्ता का अहंकारी चरित्र बाकी दलों के कार्यकर्ताओं में शिकायतें या क्रोध पैदा नहीं करता क्योंकि उनसे सादगी और देशहित में सर्वस्व समर्पण की किसी को उम्मीद नहीं होती। इसलिए जम्मू के समर्थन को सरमाथे पर धरकर भाजपा को डॉ. मुखर्जी के लहू का स्मरण करते हुए ‘ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं ’ वाली नीति के साथ श्रीनगर की रणभूमि में उतरना होगा। तभी कश्मीर घाटी में तिरंगे के रंग में रंगी भारतीयता का दर्शन सुलभ होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
तरुण विजय
जम्मू के अभूतपूर्व सत्याग्रह ने उनकी जिद पलटवा दी और वहां से बीजेपी के ग्यारह विधायकों की जीत ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में केसरिया पक्ष को पुन महत्वपूर्ण सिद्ध कर दिया। वास्तव में दिल्ली में शीला दीक्षित की तीसरी बार विजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है जम्मू में बीजेपी का गत चुनावों की तुलना में ग्यारह गुना ज्यादा बलशाली होकर लौटना। हांलाकि जम्मू में इस महत्वपूण जीत को सेकुलर मीडिया हल्का करके बता रहा है और कुछ ने तो इसे चिन्ताजनक भी कहा है। परन्तु रोचक तथ्य यह है कि जो मीडिया विश्लेषक बीजेपी की जीत बहुत चिन्ताजनक बता रहे हैं वे जम्मू क्षेत्र में पहली बार मुफ्ती की अलगाववाद समर्थक पार्टी पीडीपी के दो विधायक चुने जाने पर खामोश हैं। उल्लेखनीय है कि अमरनाथ सत्याग्रह के समय महबूबा मुफ्ती और उमर अबदुल्ला एक दूसरे के खिलाफ होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति एक जैसा रुख अपनाए हुए थे। उमर ने लोकसभा में एक ‘ मुसलमान ’ के नाते भाषण देकर सनसनी फैला दी थी और महबूबा मुफ्ती अलगाववादियों का साथ देने वाली ‘ आग्नेय राजनेता ’ के नाते पहचान बना रही थीं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि इन चुनावों में अलगाववादी पूरी तरह हारे हैं। वास्तव में अलगाववादी दलों के थके हुए नेताओं से समर्थकों को मायूसी मिल रही थी और अब उनकी जगह महबूबा और मुफ्ती सईद जैसे नेताओं ने ले ली है जो बेहतर एवं प्रभावी ढंग से अलगाववादियों को बचा सकते हैं।
सत्ता राजनीति के समीकरणों में हिस्सेदारी से उनका दिल्ली की सरकार पर भी प्रभाव ज्यादा रहता है। जहां तक कश्मीर में आतंकवाद के अंत का प्रश्न है, उसमें इन राजनेताओं की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वे आतंकवाद के परिणामों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए आतुर रहते हैं। वर्ना दहशतगर्दी के खिलाफ कश्मीर के राजनीतिक दल क्यों चुप रहते? सिवाय बीजेपी के, किसी भी राजनीतिक दल ने अपने चुनाव प्रचार या घोषणा पत्र में आतंकवाद खत्म करने का जिक्र तक नहीं किया। विडम्बना यह है कि हर क्षेत्र में जम्मू से घनघोर भेदभाव बनाए रखने वालीं पार्टियों को ही जम्मू क्षेत्र में भी बहुमत मिला है। यहां की 37 सीटों पर सिर्फ 11 ही उस बीजेपी की झोली में आयी हैं जो भेदभाव के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतरी थी। जिसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु (जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा श्री लालकृष्ण आडवाणी ने हत्या कहा था) के पीछे भी जम्मू कश्मीर के शेष भारत के साथ समानता के आधार पर विलय की मांग थी। डॉ. मुखर्जी का बलिदान इस कारण हुआ कि जम्मू कश्मीर में तिरंगे की शान बनी रहे और वहां भिन्न विधान, प्रधान व झंडे की जगह सिर्फ तिरंगा फहरे, दो अलग अलग कानून न रहे तथा जम्मू के साथ कश्मीर के घाटी के बहुसंख्यक मुस्लिम भेदभाव न करें। पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें जम्मू में प्रवेश करते ही गिरफ्तार करवा कर श्रीनगर के निशांतबाग के पास एक बगलानुमा मकान में नजरबंदी करवा दिया। उनके पोते उमर अब्दुल्ला उन लोगों के साथ पांच साल सत्ता में रहे जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं।
वक्त जब बदलता है तो राजनीति का चेहरा भी नया बनता है। आज उमर अब्दुल्ला की अनेक कारणों से मीडिया में प्रशंसा की जा रही है। वे युवा है, तेजतर्रार राजनीति के नए चेहरे हैं, कश्मीरी मुश्लिम हैं और भारतीय एकता के बारे में असंदिग्ध विचार रखते आ रहे हैं। उनका व्यक्तित्व करिश्माई है और हालांकि अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर संसद में अपने भाषण के तीखे मुस्लिम तेवरों के कारण उनकी विवादास्पद चर्चा हुई, फिर भी उन्हें महबूबा की तरह अलगाववादी नहीं कहा जा सकता। उमर टीवी चैनलों पर तर्कपूर्ण जोरदार ढंग से अपनी बात रखते हैं और कांग्रेस की नई उभरती पीढ़ी के साथ हम कदम नए जोश और नए ताजगी भरे भविष्य का संकेत देते हैं। जिस पीढ़ी में सचिन पायलट (उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सचिन पायलट का विवाह उमर की सगी बहन सारा से हुआ है और इस विवाह का उमर तथा उनके पिता फारूख ने विरोध व बहिष्कार किया था), ज्योतिरादित्य सिंधिया , मिलिंद देवड़ा और निस्संदेह इन सबके नेता राहुल गांधी आकृष्ट करते हैं। इनके तेवर और परिपक्वता का आने वाले वक्त में पता चलेगा, क्योंकि सत्ता से बाहर का मामला अलग होता है और सत्ता संभालने के बाद मुद्दे संभालना एकदम अलग।
दुख की बात यह है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव विश्लेषण में कहीं भी लद्दाख के चुनावों का जिक्र नहीं हुआ-जिसका क्षेत्रफल घाटी और जम्मू से भी बड़ा है। यहां से चार विधायक चुने गए और आश्चर्यजनक रूप से लद्दाख के लिए केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा मांगने वाले मोर्चे के नेता थुप्तान छेवांग कांग्रेसी उम्मीदवार नवांग रिग्जिन से मात्र डेढ़ हजार मतों से हार गए। आरोप है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए मस्जिदों से फतवे जारी करवाये गए। इससे यहां बौद्व मुस्लिम दूरियां बढ़ने की आशंका होगी।
क्या उमर का श्रीनगर में सत्ता संभालना घाटी में भारत की प्रभुता और वर्चस्व के साथ-साथ शांति और हिन्दुओं की वापसी सुनिश्चित करेगा? या वे भी वक्त बिताने और सम्पदा कमाने का वही काम करेंगे जो उनसे पहले के मुख्यमंत्री करते आए? क्या उमर अब्दुल्ला को कश्मीर की भारत से पृथकता बनाए रखने में अपनी भारतीयता सार्थक होती दिखती है? क्या वे 22 फरवरी 1994 के दिन भारत की संसद के द्वारा पारित उस प्रस्ताव को अपने कमरे में लगाना उचित मानेंगे जिस प्रस्ताव में पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर को वापस लेने का संकल्प किया गया है? क्या उमर सिर्फ मुस्लिम पृथकतावादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जैसे - उन्होंने अमरनाथ यात्रा के समय हिन्दुओं को एक इंच जमीन न देने के ऐलान के साथ किया था - कश्मीर में हिन्दु विहीन जम्हूरियत का जश्न मनाएंगे या जम्हूरियत के मायने सबको साथ लेकर देशभक्ति का पाठ सिखाना भी मानेंगे ? यदि उमर उब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने तो उनकी गाड़ी, बंगले और विधानसभा पर दो झंडे फहराए जाएंगे - एक भारत का तिरंगा और दूसरा कश्मीर का हल के निशान वाला लाल झंडा। यदि भारत के दूसरे किसी भी राज्य को अपने पृथक झंडे की आवश्यकता नहीं है तो कश्मीर को क्यों है, यह बात कोई भारतीय कश्मीरी नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा?
ऐसी परिस्थिति में यह समय जम्मू कश्मीर में पुनः उनकी कठिन परीक्षा का है जो डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में हर साल दो बार आयोजन करते हैं और जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के पक्षधर हैं। बीजेपी को 11 स्थान मिले, पर ज्यादा भी मिल सकते थे - अमरनाथ संघर्ष का ज्वार बहुत ऊंचाई तक पहुंचा था। उन्हें सोचना होगा कि पहली बार जम्मू क्षेत्र में पीडीपी का पदार्पण कैसे हुआ? बिस्नाह, डोडा जैसे घायल और नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस की नीतियों से लहुलुहान क्षेत्र उनके हाथ से क्यों फिसले? राजनीति में बीजेपी सत्ता के लिए नहीं, सत्ता के राष्ट्रहित में उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। उस पर जनता का भरोसा नेताओं की व्यक्तिगत छवि से बढ़कर विचारधारा और पूर्वकालीन नेताओं की शहादत के कारण है। यही साख व भरोसा बीजेपी की सबसे बड़ी पूंजी रही है। धर्म, वैभव और सत्ता का अहंकारी चरित्र बाकी दलों के कार्यकर्ताओं में शिकायतें या क्रोध पैदा नहीं करता क्योंकि उनसे सादगी और देशहित में सर्वस्व समर्पण की किसी को उम्मीद नहीं होती। इसलिए जम्मू के समर्थन को सरमाथे पर धरकर भाजपा को डॉ. मुखर्जी के लहू का स्मरण करते हुए ‘ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं ’ वाली नीति के साथ श्रीनगर की रणभूमि में उतरना होगा। तभी कश्मीर घाटी में तिरंगे के रंग में रंगी भारतीयता का दर्शन सुलभ होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
तरुण विजय
Sunday, December 28, 2008
राजनीति का असली चेहरा
पिछले दिनों आमिर खान की फिल्म गजनी देखने का मौका मिला। यह एक ऐसे नायक की कथा है जो अल्पस्मृति रोग से ग्रस्त है और खुद पर ही प्रहार करने वाले अपराधी राजनेता के बहकावे में आकर उसकी मदद को तैयार हो जाता है। मुझे इस फिल्म को देखकर लगा कि भारतीय परिदृश्य भी आज कुछ ऐसा ही है। एक ओर वह जनता है जो निरंतर क्रमिक अंतराल के बाद स्मृतिलोप का शिकार होकर उन्हीं राजनेताओं को वोट देकर सत्ता में भेजती है जिनका वास्तविक चेहरा अपराधी का होता है। दूसरी ओर राजनेता हैं जो जनता के इस अल्प स्मृतिदोष का लाभ उठाकर हर बार 'शुभचिंतक' के नाते जनता के सामने आते हैं, वोट लेते हैं और चुनाव को पूंजी निवेश का एक ऐसा संविधान प्रदत्त उपक्रम मानते हैं जिसमें एक रुपये लगाओ तो हजार रुपये मिल जाते हैं। वह भी सिर्फ शब्दों के आडंबर के माध्यम से। ये वे लोग हैं जिन्हें विश्वास नहीं होता कि कोई उनकी मूर्तियां लगाएगा या बगीचों के नाम रखेगा। वे भूल जाते हैं कि उनसे बड़े-बड़े, प्रतापी और प्रभावी राजनेताओं की विराट प्रतिमाएं भी नहीं रह पाईं और उन्हें कई बार उनके जीते जी ही उखाड़ फेंका गया। यह किसी से छिपा नहीं कि लेनिन के नाम का शहर लेनिनग्राद और उनकी मूर्तियां गायब हो गईं और यह भी कि सद्दाम हुसैन की मूर्तियों का क्या हाल हुआ? यह तो अभी हाल की ही बात है। फिर भी हर राजनेता यह सोचकर चलता है कि वह बड़ा लोकप्रिय व प्रजावत्सल है। हजारों करोड़ों की योजनाएं उसने चालू करवा दीं, जनता के लिए स्कूल खुलवा दिए, कारखाने लगवा दिए। अब और क्या चाहिए इनको? जनता उनकी वास्तविकता को हर दिन जानते और पहचानते हुए भी हर बार उन्हें वोट दे तो फिर इसे क्या कहेंगे? नेता खराब और जनता फरिश्ता, क्या यह समीकरण सही बैठता है?
लगभग सभी नेताओं की जीवनशैली एक सी है। कई बार तो लगता है कि उन्होंने कितना पैसा कमाया होगा, इसका अंदाजा उन्हें भी पूरी तरह से नहीं होता होगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि राजनीति में आचरण उल्टे पिरामिड की तरह होता है। जैसा ऊपर देखते हैं वैसा ही मंझले और निचले दर्जे के कार्यकर्ता करते हैं। पैसा हो और थैले में आवश्यक संख्या में सरकटे चूजे तो लोकतंत्र की गाय से मन माना दूध दुहा जा सकता है, ऐसा मानने वालों की संख्या कम नहीं। यह तय है कि कुछ दिनों और उत्तर प्रदेश में अभियंता मनोज गुप्ता की हत्या की खबरें छपेंगी। फिर कुछ और घटनाएं इस पर छा जाएंगी। मनोज गुप्ता के परिवार वाले अंग्रेजी मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखते, इसलिए बात देहाती स्तर तक ही कुछ पोस्टरों और राजनेताओं के स्वार्थ केंद्रित शोर की जुगुप्साजनक राजनीति में उलझकर खत्म हो जाएगी।
जिस व्यवस्था ने मनोज गुप्ता की जान ले ली, न उस पर किसी का ध्यान जाएगा और न उसे कोई बदलने की मांग करेगा। इसलिए नहीं करेगा, क्योंकि यह व्यवस्था हर पार्टी और संगठन का वक्त-बेवक्त स्वार्थ साधती है। प्रशासन, अधिकारी, पुलिस-ये सब लोकतंत्र की गाय के दुहने के लिए राजनेताओं के उपकरण मात्र बना दिए गए हैं। हर बड़े पदों पर बिठाए जाने वाले अधिकारियों को मालूम है कि कौन सा पद 'फायदे' का है और कौन सा 'कायदे' का? जो फायदे के पद हैं उनकी ठीक वैसी ही नीलामी होती है जैसे ज्यादा कमाई वाले थानों में नियुक्ति के लिए बोलियां लगाई जाती हैं। यह उस देश में हो रहा है जहां कहा गया, 'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप अवसि नरक अधिकारी'। यह सब जानते हुए भी मानता कौन है? राजनेता भावनाओं का ज्वार पैदा करते हैं तो जनता जान की बाजी लगा देती है। उस ज्वार में नेताजी को सत्ता मिलती हैं और जनता को जलालत। वह अपनी आंखों से देखती है कि जिन पर हत्या के आरोप लगते हैं वे नेता बन जाते हैं और जेल के रास्ते से ऊंचे पद तक पहुंच जाते हैं। सत्ता में आते ही वे आतंकवादियों की पैरवी करने तक से नहीं चूकते। फिर भी वे सत्ता में बने रहते हैं, क्योंकि जिनके लिए देश केवल एक पूंजीनिवेश और विलासिता का प्लेटफार्म है। वे यह नहीं कह सकते कि सत्ता मिले न मिले, बंगले बनें न बनें, लेकिन मैं प्रजा हित से समझौता नहीं कर सकता। ऐसे लोग राजनीति में हैं, मगर अपवाद स्वरूप। जो मुख्यधारा के शिखर बने हैं उन लोगों से हम आतंकवाद की विभीषिका से लड़ने की उम्मीद कर सकते हैं? आखिर जो सत्ता प्रतिष्ठान एक अकर्मण्य गृहमंत्री को उसके पद से हटाने के लिए 200 लोगों की हत्या की प्रतीक्षा करे वह घरेलू राजनीतिक आतंकवादियों से किसी मनोज गुप्ता की रक्षा कर पाएगा, यह आशा करना ही व्यर्थ है।
बात गजनी से शुरू हुई थी। इसमें राजनीति के प्रभावी अपराधी के दुष्कृत्य से क्रुद्ध नायक राज्यसत्ता की रक्षक भुजा पर भरोसा करने के बजाय स्वयं प्रतिशोध लेता है और जनता के मन को आनंद तथा संतोष रहता है। शायद कोई यह न लिखेगा कि फिल्म भले ही सत्य की विजय के लिए ही क्यों न हो, लेकिन गैर-कानूनी ढंग से समाधान का मार्ग निकालती है। सवाल उठता है कि पिछले 20 वर्षों से हमारे हजारों स्त्री, पुरुषों, बच्चों को पाकिस्तान समर्थित जिहादियों ने मार डाला तो क्या उसका हिसाब चुकाने के लिए हम इसी थकी हुई, भ्रष्ट, आत्मकेंद्रित राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर रहें? दुनिया का सबसे युवा देश अरबपतियों की वैश्विक सूची में यदि एक ओर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रहा है तो दूसरी ओर रीढ़ हीन सत्ता राजनीति का कलुषित चेहरा हमारे वीरत्व और आत्मविश्वास को चुनौती दे रहा है। संक्रमण काल में इस राजनीति के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध असहिष्णु जनाक्रोश का उभरना तय है। प्रकृति कभी क्षुद्रता और अंधा अहंकार क्षमा नहीं करती।
[तरुण विजय: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]
लगभग सभी नेताओं की जीवनशैली एक सी है। कई बार तो लगता है कि उन्होंने कितना पैसा कमाया होगा, इसका अंदाजा उन्हें भी पूरी तरह से नहीं होता होगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि राजनीति में आचरण उल्टे पिरामिड की तरह होता है। जैसा ऊपर देखते हैं वैसा ही मंझले और निचले दर्जे के कार्यकर्ता करते हैं। पैसा हो और थैले में आवश्यक संख्या में सरकटे चूजे तो लोकतंत्र की गाय से मन माना दूध दुहा जा सकता है, ऐसा मानने वालों की संख्या कम नहीं। यह तय है कि कुछ दिनों और उत्तर प्रदेश में अभियंता मनोज गुप्ता की हत्या की खबरें छपेंगी। फिर कुछ और घटनाएं इस पर छा जाएंगी। मनोज गुप्ता के परिवार वाले अंग्रेजी मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखते, इसलिए बात देहाती स्तर तक ही कुछ पोस्टरों और राजनेताओं के स्वार्थ केंद्रित शोर की जुगुप्साजनक राजनीति में उलझकर खत्म हो जाएगी।
जिस व्यवस्था ने मनोज गुप्ता की जान ले ली, न उस पर किसी का ध्यान जाएगा और न उसे कोई बदलने की मांग करेगा। इसलिए नहीं करेगा, क्योंकि यह व्यवस्था हर पार्टी और संगठन का वक्त-बेवक्त स्वार्थ साधती है। प्रशासन, अधिकारी, पुलिस-ये सब लोकतंत्र की गाय के दुहने के लिए राजनेताओं के उपकरण मात्र बना दिए गए हैं। हर बड़े पदों पर बिठाए जाने वाले अधिकारियों को मालूम है कि कौन सा पद 'फायदे' का है और कौन सा 'कायदे' का? जो फायदे के पद हैं उनकी ठीक वैसी ही नीलामी होती है जैसे ज्यादा कमाई वाले थानों में नियुक्ति के लिए बोलियां लगाई जाती हैं। यह उस देश में हो रहा है जहां कहा गया, 'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप अवसि नरक अधिकारी'। यह सब जानते हुए भी मानता कौन है? राजनेता भावनाओं का ज्वार पैदा करते हैं तो जनता जान की बाजी लगा देती है। उस ज्वार में नेताजी को सत्ता मिलती हैं और जनता को जलालत। वह अपनी आंखों से देखती है कि जिन पर हत्या के आरोप लगते हैं वे नेता बन जाते हैं और जेल के रास्ते से ऊंचे पद तक पहुंच जाते हैं। सत्ता में आते ही वे आतंकवादियों की पैरवी करने तक से नहीं चूकते। फिर भी वे सत्ता में बने रहते हैं, क्योंकि जिनके लिए देश केवल एक पूंजीनिवेश और विलासिता का प्लेटफार्म है। वे यह नहीं कह सकते कि सत्ता मिले न मिले, बंगले बनें न बनें, लेकिन मैं प्रजा हित से समझौता नहीं कर सकता। ऐसे लोग राजनीति में हैं, मगर अपवाद स्वरूप। जो मुख्यधारा के शिखर बने हैं उन लोगों से हम आतंकवाद की विभीषिका से लड़ने की उम्मीद कर सकते हैं? आखिर जो सत्ता प्रतिष्ठान एक अकर्मण्य गृहमंत्री को उसके पद से हटाने के लिए 200 लोगों की हत्या की प्रतीक्षा करे वह घरेलू राजनीतिक आतंकवादियों से किसी मनोज गुप्ता की रक्षा कर पाएगा, यह आशा करना ही व्यर्थ है।
बात गजनी से शुरू हुई थी। इसमें राजनीति के प्रभावी अपराधी के दुष्कृत्य से क्रुद्ध नायक राज्यसत्ता की रक्षक भुजा पर भरोसा करने के बजाय स्वयं प्रतिशोध लेता है और जनता के मन को आनंद तथा संतोष रहता है। शायद कोई यह न लिखेगा कि फिल्म भले ही सत्य की विजय के लिए ही क्यों न हो, लेकिन गैर-कानूनी ढंग से समाधान का मार्ग निकालती है। सवाल उठता है कि पिछले 20 वर्षों से हमारे हजारों स्त्री, पुरुषों, बच्चों को पाकिस्तान समर्थित जिहादियों ने मार डाला तो क्या उसका हिसाब चुकाने के लिए हम इसी थकी हुई, भ्रष्ट, आत्मकेंद्रित राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर रहें? दुनिया का सबसे युवा देश अरबपतियों की वैश्विक सूची में यदि एक ओर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रहा है तो दूसरी ओर रीढ़ हीन सत्ता राजनीति का कलुषित चेहरा हमारे वीरत्व और आत्मविश्वास को चुनौती दे रहा है। संक्रमण काल में इस राजनीति के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध असहिष्णु जनाक्रोश का उभरना तय है। प्रकृति कभी क्षुद्रता और अंधा अहंकार क्षमा नहीं करती।
[तरुण विजय: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]
रामसेतु तथा राम के युग की प्रामाणिकता
हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस है तथा हमें अपने गौरवशाली इतिहास तथा उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में खोज करने की तथा उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे। परंतु स्वतंत्र भारत में पले तथा पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तथ्यों तथा जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस भी रखते है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है। वास्तव में श्रीराम भारतीयों के रोम-रोम में बसे है। रामसेतु पर उठ रहे तरह-तरह के सवालों से श्रद्धालु जनों की जहां भावना आहत हो रही है,वहीं लोगों में इन प्रश्नों के समाधान की जिज्ञासा भी है। हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्न करे:- श्रीराम की कहानी प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण श्रीराम के अयोध्या में सिंहासनारूढ़ होने के बाद लिखी गई। महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलविद् थे। उन्होंने राम के जीवन में घटित घटनाओं से संबंधित तत्कालीन ग्रह, नक्षत्र और राशियों की स्थिति का वर्णन किया है। इन खगोलीय स्थितियों की वास्तविक तिथियां 'प्लैनेटेरियम साफ्टवेयर' के माध्यम से जानी जा सकती है। भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' नामक साफ्टवेयर प्राप्त किया, जिससे सूर्य/ चंद्रमा के ग्रहण की तिथियां तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा पृथ्वी से उनकी दूरी वैज्ञानिक तथा खगोलीय पद्धति से जानी जा सकती है। इसके द्वारा उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित खगोलीय स्थितियों के आधार पर आधुनिक अंग्रेजी कैलेण्डर की तारीखें निकाली है। इस प्रकार उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर 14 वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या पहुंचने तक की घटनाओं की तिथियों का पता लगाया है। इन सबका अत्यंत रोचक एवं विश्वसनीय वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक 'डेटिंग द एरा ऑफ लार्ड राम' में किया है। इसमें से कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण यहां भी प्रस्तुत किए जा रहे है।
श्रीराम की जन्म तिथि
महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8 और 9 में वर्णन किया है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। उस समय सूर्य,मंगल,गुरु,शनि व शुक्र ये पांच ग्रह उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। ग्रहों,नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी-सूर्य मेष में,मंगल मकर में,बृहस्पति कर्क में, शनि तुला में और शुक्र मीन में थे। चैत्र माह में शुक्ल पक्ष नवमी की दोपहर 12 बजे का समय था।
जब उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में डाला गया तो 'प्लैनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर' के माध्यम से यह निर्धारित किया गया कि 10 जनवरी, 5114 ई.पू. दोपहर के समय अयोध्या के लेटीच्यूड तथा लांगीच्यूड से ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल वही थी, जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है। इस प्रकार श्रीराम का जन्म 10 जनवरी सन् 5114 ई. पू.(7117 वर्ष पूर्व)को हुआ जो भारतीय कैलेण्डर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12 बजे से 1 बजे के बीच का है।
श्रीराम के वनवास की तिथि
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड (2/4/18) के अनुसार महाराजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका(दशरथ जी) जन्म नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है या वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था ये सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ई.पू.के दिन सूर्य,मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राज्य तिलक वाले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा था। इस प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़ कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114- 5089) की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक यह इंगित करते है कि जब श्रीराम ने 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे।
खर-दूषण के साथ युद्ध के समय सूर्यग्रहण
वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 13 वें साल के मध्य में श्रीराम का खर-दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्यग्रहण लगा था और मंगल ग्रहों के मध्य में था। जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 5 अक्टूबर 5077 ई.पू. ; अमावस्या थी। इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी (20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ) से देखा जा सकता था। उस दिन ग्रहों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की- मंगल ग्रह बीच में था-एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य तथा शनि थे।
अन्य महत्वपूर्ण तिथियां
किसी एक समय पर बारह में से छह राशियों को ही आकाश में देखा जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान के लंका से वापस समुद्र पार आने के समय आठ राशियों, ग्रहों तथा नक्षत्रों के दृश्य को अत्यंत रोचक ढंग से वर्णित किया गया है। ये खगोलीय स्थिति श्री भटनागर द्वारा प्लैनेटेरियम के माध्यम से प्रिन्ट किए हुए 14 सितंबर 5076 ई.पू. की सुबह 6:30 बजे से सुबह 11 बजे तक के आकाश से बिल्कुल मिलती है। इसी प्रकार अन्य अध्यायों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई बार दूसरी घटनाओं की तिथियां भी साफ्टवेयर के माध्यम से निकाली गई जैसे श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5076 ई.पू.को पूर्ण की और ये दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी ही था। इस प्रकार जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे (5114-5075)।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तक समुद्र के ऊपर पुल बनाया। इसी पुल को पार कर श्रीराम ने रावण पर विजय पाई। हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर एक सेतु के वो अवशेष दिखाए है, जो पॉक स्ट्रेट में समुद्र के भीतर रामेश्वरम(धनुषकोटि) से लंका में तलाई मन्नार तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि विश्वकर्मा की तरह नल एक महान शिल्पकार थे जिनके मार्गदर्शन में पुल का निर्माण करवाया गया। यह निर्माण वानर सेना द्वारा यंत्रों के उपयोग से समुद्र तट पर लाई गई शिलाओं, चट्टानों, पेड़ों तथा लकड़ियों के उपयोग से किया गया। महान शिल्पकार नल के निर्देशानुसार महाबलि वानर बड़ी-बड़ी शिलाओं तथा चट्टानों को उखाड़कर यंत्रों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। साथ ही वो बहुत से बड़े-बड़े वृक्षों को, जिनमें ताड़, नारियल,बकुल,आम,अशोक आदि शामिल थे, समुद्र तट पर पहुंचाते थे। नल ने कई वानरों को बहुत लम्बी रस्सियां दे दोनों तरफ खड़ा कर दिया था। इन रस्सियों के बीचोबीच पत्थर,चट्टानें, वृक्ष तथा लताएं डालकर वानर सेतु बांध रहे थे। इसे बांधने में 5 दिन का समय लगा। यह पुल श्रीराम द्वारा तीन दिन की खोजबीन के बाद चुने हुए समुद्र के उस भाग पर बनवाया गया जहां पानी बहुत कम गहरा था तथा जलमग्न भूमार्ग पहले से ही उपलब्ध था। इसलिए यह विवाद व्यर्थ है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं, क्योंकि यह पुल जलमग्न, द्वीपों, पर्वतों तथा बरेतीयों वाले प्राकृतिक मार्गो को जोड़कर उनके ऊपर ही बनवाया गया था।
सरोज बाला
श्रीराम की जन्म तिथि
महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8 और 9 में वर्णन किया है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। उस समय सूर्य,मंगल,गुरु,शनि व शुक्र ये पांच ग्रह उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। ग्रहों,नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी-सूर्य मेष में,मंगल मकर में,बृहस्पति कर्क में, शनि तुला में और शुक्र मीन में थे। चैत्र माह में शुक्ल पक्ष नवमी की दोपहर 12 बजे का समय था।
जब उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में डाला गया तो 'प्लैनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर' के माध्यम से यह निर्धारित किया गया कि 10 जनवरी, 5114 ई.पू. दोपहर के समय अयोध्या के लेटीच्यूड तथा लांगीच्यूड से ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल वही थी, जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है। इस प्रकार श्रीराम का जन्म 10 जनवरी सन् 5114 ई. पू.(7117 वर्ष पूर्व)को हुआ जो भारतीय कैलेण्डर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12 बजे से 1 बजे के बीच का है।
श्रीराम के वनवास की तिथि
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड (2/4/18) के अनुसार महाराजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका(दशरथ जी) जन्म नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है या वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था ये सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ई.पू.के दिन सूर्य,मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राज्य तिलक वाले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा था। इस प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़ कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114- 5089) की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक यह इंगित करते है कि जब श्रीराम ने 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे।
खर-दूषण के साथ युद्ध के समय सूर्यग्रहण
वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 13 वें साल के मध्य में श्रीराम का खर-दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्यग्रहण लगा था और मंगल ग्रहों के मध्य में था। जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 5 अक्टूबर 5077 ई.पू. ; अमावस्या थी। इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी (20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ) से देखा जा सकता था। उस दिन ग्रहों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की- मंगल ग्रह बीच में था-एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य तथा शनि थे।
अन्य महत्वपूर्ण तिथियां
किसी एक समय पर बारह में से छह राशियों को ही आकाश में देखा जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान के लंका से वापस समुद्र पार आने के समय आठ राशियों, ग्रहों तथा नक्षत्रों के दृश्य को अत्यंत रोचक ढंग से वर्णित किया गया है। ये खगोलीय स्थिति श्री भटनागर द्वारा प्लैनेटेरियम के माध्यम से प्रिन्ट किए हुए 14 सितंबर 5076 ई.पू. की सुबह 6:30 बजे से सुबह 11 बजे तक के आकाश से बिल्कुल मिलती है। इसी प्रकार अन्य अध्यायों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई बार दूसरी घटनाओं की तिथियां भी साफ्टवेयर के माध्यम से निकाली गई जैसे श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5076 ई.पू.को पूर्ण की और ये दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी ही था। इस प्रकार जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे (5114-5075)।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तक समुद्र के ऊपर पुल बनाया। इसी पुल को पार कर श्रीराम ने रावण पर विजय पाई। हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर एक सेतु के वो अवशेष दिखाए है, जो पॉक स्ट्रेट में समुद्र के भीतर रामेश्वरम(धनुषकोटि) से लंका में तलाई मन्नार तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि विश्वकर्मा की तरह नल एक महान शिल्पकार थे जिनके मार्गदर्शन में पुल का निर्माण करवाया गया। यह निर्माण वानर सेना द्वारा यंत्रों के उपयोग से समुद्र तट पर लाई गई शिलाओं, चट्टानों, पेड़ों तथा लकड़ियों के उपयोग से किया गया। महान शिल्पकार नल के निर्देशानुसार महाबलि वानर बड़ी-बड़ी शिलाओं तथा चट्टानों को उखाड़कर यंत्रों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। साथ ही वो बहुत से बड़े-बड़े वृक्षों को, जिनमें ताड़, नारियल,बकुल,आम,अशोक आदि शामिल थे, समुद्र तट पर पहुंचाते थे। नल ने कई वानरों को बहुत लम्बी रस्सियां दे दोनों तरफ खड़ा कर दिया था। इन रस्सियों के बीचोबीच पत्थर,चट्टानें, वृक्ष तथा लताएं डालकर वानर सेतु बांध रहे थे। इसे बांधने में 5 दिन का समय लगा। यह पुल श्रीराम द्वारा तीन दिन की खोजबीन के बाद चुने हुए समुद्र के उस भाग पर बनवाया गया जहां पानी बहुत कम गहरा था तथा जलमग्न भूमार्ग पहले से ही उपलब्ध था। इसलिए यह विवाद व्यर्थ है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं, क्योंकि यह पुल जलमग्न, द्वीपों, पर्वतों तथा बरेतीयों वाले प्राकृतिक मार्गो को जोड़कर उनके ऊपर ही बनवाया गया था।
सरोज बाला
Thursday, December 25, 2008
बैर बढ़ाने पर आमादा पाक
भारत-पाक सीमा पर कुपवाड़ा में 22 मई 2002 के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हिम्मत हो तो छिपकर वार करने के बजाय पाकिस्तान सामने आए और दो-दो हाथ कर ले, अब निर्णायक लड़ाई का वक्त आ गया है। फिर शिमला में 26 मई 2002 को कहा कि संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद ही हमें पाकिस्तान को सबक सिखा देना चाहिए था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपील पर हमने पाक को एक मौका दिया। अब हमारा धैर्य टूट रहा है। पाकिस्तान पर इस सबका असर नहीं पड़ा और वह फिर अपने काम पर लग गया। आतंकवादी आते रहे। भारत पर हमलावर रहे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही कोई डेढ़ दर्जन हृदयविदारक आतंकी हमले हुए। फिर मुंबई पर सीधा आक्रमण हुआ। देश में उबाल आ गया। पाकिस्तानी षड्यंत्र के पुख्ता सबूत भी मिल गए। प्रधानमंत्री अब पाकिस्तान से कड़ी कार्रवाई का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तानी जवाब गौरतलब है कि वह जंग के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री ने कहा कि युद्ध कोई नहीं चाहता। युद्ध मुद्दा नहीं, असली मुद्दा है आतंकवाद और पाकिस्तान को इस पर नतीजा देना होगा। हैरत है कि प्रधानमंत्री अब भी आतंकवाद को युद्ध नहीं मानते।
युद्ध का कोई विकल्प नहीं होता। हमलावर शत्रु सदाशयता का अर्थ कायरता ही लेता है। पाकिस्तान अपने जन्मकाल से ही युद्धरत है। वह कबाइली युद्ध , कच्छ युद्ध , पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध (1971) और कारगिल (1999) सहित 4 प्रत्यक्ष युद्धों में भारत से हार चुका है। वह प्रच्छन्न आतंकी युद्ध के जरिये लगातार हमलावर रहता है। वह आतंकवाद के प्रशिक्षण की यूनिवर्सिटी चलाता है। विश्व समुदाय के पास आतंकी ट्रेनिंग सेंटरों के सबूत हैं, सबूत भारत के पास भी हैं। मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल आमिर कसाब के पाकिस्तानी नागरिक होने के सबूत पाक मीडिया ने भी दिए हैं। अमेरिकी एफबीआई ने भी तमाम तथ्य दिए हैं, लेकिन पाकिस्तान तथ्य नहीं मानता और युद्ध के लिए ललकार रहा है। हमले की प्रत्येक वारदात से इनकार और युद्ध की तत्परता पाकिस्तान का स्वभाव है। याद कीजिए जब 26 मई 2002 को वाजपेयी ने शिमला में कहा कि हमारे धैर्य का बांध टूट रहा है तो ठीक दूसरे दिन 27 मई को परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि हम अल्लाह का नाम लेकर जंग में उतरेंगे। हमारी सेना तैयार है। पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे जेएन दीक्षित के अनुसार कंधार विमान अपहरण की साजिश मुंबई और ढाका में मौजूद आईएसआई एजेंटों ने बनाई थी। दीक्षित ने ध्यान दिलाया था कि अपहर्ताओं ने 33 पाकिस्तानी आतंकियों की रिहाई की मांग की थी। रिहा मुख्य आतंकी अजहर मसूद पाकिस्तान में अपने गांव बहावलपुर पहुंचा। उसका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ।
पाकिस्तान वास्तविक राष्ट्र-राज्य नहीं है। वह दरअसल एक सुव्यवस्थित विचारधारा है। इस विचारधारा का जन्म पाकिस्तान से भी पुराना है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के एक छात्र रहमत अली ने 1933 में 'नाऊ आर नेवर' शीर्षक से एक लेख के जरिये दक्षिण एशिया में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की पैरवी की थी। उन्होंने इस काल्पनिक राष्ट्र का नाम पाकिस्तान रखा। 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' लिखने वाले शायर इकबाल ने इस विचार का तर्क सहित समर्थन किया। मुस्लिम लीग के लाहौर सम्मेलन (1940) में जिन्ना ने पाकिस्तान प्रस्ताव रखा और यह पारित हो गया। जिन्ना के मुताबिक मुसलमान अलग राष्ट्र थे। नेहरू, लार्ड माउंटबेटन और जिन्ना ने भारत बांट दिया। उम्मीद थी कि समस्या का स्थायी समाधान हो गया। भारतीय राजनीतिक तंत्र में 'इतिहास बोध' का अभाव है। इतिहास क्रूर होता है। वह भुलक्कड़ों को क्षमा नहीं करता। पाकिस्तान का इतिहास 1947 से ही शुरू होता है, लेकिन विचारधारा की जड़ें मध्यकाल में हैं। बिन कासिम ने 7वीं सदी में भारत पर हमला किया था। गजनी और गोरी के हमले इतिहास की निर्मम सच्चाइयां हैं। नेहरू को उम्मीद थी कि पाकिस्तान कुछ समय बाद स्वत: ही नष्ट हो जाएगा। वह इस्लामी राजनीतिक चिंतन और जिहाद की ताकत पर आंखें मूंदे रहे। पाकिस्तान अलग रहकर मौज उड़ाने के लिए नहीं बना था। पाकिस्तानी विचार के जन्मदाता रहमत अली ने पाकिस्तान निर्माण के वक्त भारतीय मुसलमानों के बारे में कहा था, ''वे हमारा खून हैं। वे वाकिफ हैं कि पाकिस्तान 'मिल्लत' के सर्वोच्च हित में है। यह हमारे लिए किला है और उनके (भारतीय मुसलमानों) लिए लंगर।'' एफके दुर्रानी ने 'मीनिंग आफ पाकिस्तान'में लिखा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए जरूरी था कि उसको शिविर बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जाए। पाकिस्तान के पहले हुक्मरान संस्थापक जिन्ना भारत के शत्रु थे। कबाइली हमला उन्हीं के वक्त हुआ। प्रथम वजीरेआजम लियाकत अली खां ने 'नेहरू लियाकत समझौता' (1950) किया। समझौता व्यर्थ रहा। पहले राष्ट्रपति इस्कंदर अली मिर्जा भी भारत विरोधी थे। पहले सैन्य शासक जनरल अयूब खां का रुख भी भारत के प्रति युद्धक था। याह्या खां के समय भारत से युद्ध (1971) हुआ। जुल्फिकार अली भुट्टो (1971) जिया उल हक (1977), बेनजीर भुट्टो (1988-1990 व 1993-1996) और नवाज शरीफ भी भारत पर आक्रामक थे। कारगिल युद्ध परवेज मुशर्रफ की ही खुराफात था। संप्रति यूसुफ रजा गिलानी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हैं, लेकिन पाकिस्तान में चार ए-अल्लाह, आर्मी, आतंक और अमेरिका- का रुतबा है। प्रधानमंत्री सेना के दबाव में हैं। आतंकवाद पाकिस्तानी विचारधारा में जिहाद है, अमेरिका अपने ऊपर हुए हमले के विरुद्ध सीधा आक्रमण करता है, लेकिन पाकिस्तान से जुड़ी हर वारदात में अमेरिकी राजनयिकों की 'संतुलन सेवाएं' नि:शुल्क उपलब्ध हैं।
पाकिस्तान आतंकी विचारधारा पर भारी खर्च करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल आफ गवर्नमेंट की अमेरिकी विद्वान जेसिका स्टर्न ने 'फारेन अफेयर्स' (नवंबर- दिसंबर 2000) में लिखा था कि पाकिस्तान में 45 हजार मदरसे हैं। इनमें केवल 4000 ही सरकार में पंजीकृत हैं। आंकडे़ 8 बरस पुराने हैं। भुट्टो के सहायक और पाकिस्तानी इतिहासकार केके अजीज ने अपने शोध में पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों का विष-विश्लेषण किया है। कक्षा 2 की इतिहास की किताब के अनुसार नेहरू ने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुओं की सरकार होगी, जिन्ना ने कहा-यहां मुसलमान भी रहते हैं। कक्षा 3 की किताब के अनुसार राजा जयपाल ने महमूद गजनवी के मुल्क में घुसने की कोशिश की। महमूद ने राजा को हरा दिया, लाहौर हथिया लिया। पाकिस्तानी तरुणाई का विकास इसी विष-विचार से किया जाता है, फिर आतंकी शिविर सेवाएं देते हैं। फिर आईएसआई मदद करती है। सीमा पर भले ही युद्धविराम हो, लेकिन आईएसआई के आतंकी बिना अल्पविराम आक्रामक हैं। भारत सोचे कि क्या करना है? भारत की विदेश नीति मित्रतापूर्ण है, पाकिस्तान की नीति युद्धक है। नेहरू से लेकर वाजपेयी और मनमोहन तक प्रेम की मनुहार है, लेकिन जवाब में युद्ध और परमाणु बम की धमकियां हैं। भारत पाकिस्तान विषयक विदेश नीति का आद्योपांत पुनरीक्षण करे। युद्ध ठीक नहीं होता, लेकिन थोपे गए युद्ध को टालने का कोई उपाय तो करना ही होगा।
[हृदयनारायण दीक्षित: लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं]
युद्ध का कोई विकल्प नहीं होता। हमलावर शत्रु सदाशयता का अर्थ कायरता ही लेता है। पाकिस्तान अपने जन्मकाल से ही युद्धरत है। वह कबाइली युद्ध , कच्छ युद्ध , पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध (1971) और कारगिल (1999) सहित 4 प्रत्यक्ष युद्धों में भारत से हार चुका है। वह प्रच्छन्न आतंकी युद्ध के जरिये लगातार हमलावर रहता है। वह आतंकवाद के प्रशिक्षण की यूनिवर्सिटी चलाता है। विश्व समुदाय के पास आतंकी ट्रेनिंग सेंटरों के सबूत हैं, सबूत भारत के पास भी हैं। मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल आमिर कसाब के पाकिस्तानी नागरिक होने के सबूत पाक मीडिया ने भी दिए हैं। अमेरिकी एफबीआई ने भी तमाम तथ्य दिए हैं, लेकिन पाकिस्तान तथ्य नहीं मानता और युद्ध के लिए ललकार रहा है। हमले की प्रत्येक वारदात से इनकार और युद्ध की तत्परता पाकिस्तान का स्वभाव है। याद कीजिए जब 26 मई 2002 को वाजपेयी ने शिमला में कहा कि हमारे धैर्य का बांध टूट रहा है तो ठीक दूसरे दिन 27 मई को परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि हम अल्लाह का नाम लेकर जंग में उतरेंगे। हमारी सेना तैयार है। पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे जेएन दीक्षित के अनुसार कंधार विमान अपहरण की साजिश मुंबई और ढाका में मौजूद आईएसआई एजेंटों ने बनाई थी। दीक्षित ने ध्यान दिलाया था कि अपहर्ताओं ने 33 पाकिस्तानी आतंकियों की रिहाई की मांग की थी। रिहा मुख्य आतंकी अजहर मसूद पाकिस्तान में अपने गांव बहावलपुर पहुंचा। उसका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ।
पाकिस्तान वास्तविक राष्ट्र-राज्य नहीं है। वह दरअसल एक सुव्यवस्थित विचारधारा है। इस विचारधारा का जन्म पाकिस्तान से भी पुराना है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के एक छात्र रहमत अली ने 1933 में 'नाऊ आर नेवर' शीर्षक से एक लेख के जरिये दक्षिण एशिया में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की पैरवी की थी। उन्होंने इस काल्पनिक राष्ट्र का नाम पाकिस्तान रखा। 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' लिखने वाले शायर इकबाल ने इस विचार का तर्क सहित समर्थन किया। मुस्लिम लीग के लाहौर सम्मेलन (1940) में जिन्ना ने पाकिस्तान प्रस्ताव रखा और यह पारित हो गया। जिन्ना के मुताबिक मुसलमान अलग राष्ट्र थे। नेहरू, लार्ड माउंटबेटन और जिन्ना ने भारत बांट दिया। उम्मीद थी कि समस्या का स्थायी समाधान हो गया। भारतीय राजनीतिक तंत्र में 'इतिहास बोध' का अभाव है। इतिहास क्रूर होता है। वह भुलक्कड़ों को क्षमा नहीं करता। पाकिस्तान का इतिहास 1947 से ही शुरू होता है, लेकिन विचारधारा की जड़ें मध्यकाल में हैं। बिन कासिम ने 7वीं सदी में भारत पर हमला किया था। गजनी और गोरी के हमले इतिहास की निर्मम सच्चाइयां हैं। नेहरू को उम्मीद थी कि पाकिस्तान कुछ समय बाद स्वत: ही नष्ट हो जाएगा। वह इस्लामी राजनीतिक चिंतन और जिहाद की ताकत पर आंखें मूंदे रहे। पाकिस्तान अलग रहकर मौज उड़ाने के लिए नहीं बना था। पाकिस्तानी विचार के जन्मदाता रहमत अली ने पाकिस्तान निर्माण के वक्त भारतीय मुसलमानों के बारे में कहा था, ''वे हमारा खून हैं। वे वाकिफ हैं कि पाकिस्तान 'मिल्लत' के सर्वोच्च हित में है। यह हमारे लिए किला है और उनके (भारतीय मुसलमानों) लिए लंगर।'' एफके दुर्रानी ने 'मीनिंग आफ पाकिस्तान'में लिखा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए जरूरी था कि उसको शिविर बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जाए। पाकिस्तान के पहले हुक्मरान संस्थापक जिन्ना भारत के शत्रु थे। कबाइली हमला उन्हीं के वक्त हुआ। प्रथम वजीरेआजम लियाकत अली खां ने 'नेहरू लियाकत समझौता' (1950) किया। समझौता व्यर्थ रहा। पहले राष्ट्रपति इस्कंदर अली मिर्जा भी भारत विरोधी थे। पहले सैन्य शासक जनरल अयूब खां का रुख भी भारत के प्रति युद्धक था। याह्या खां के समय भारत से युद्ध (1971) हुआ। जुल्फिकार अली भुट्टो (1971) जिया उल हक (1977), बेनजीर भुट्टो (1988-1990 व 1993-1996) और नवाज शरीफ भी भारत पर आक्रामक थे। कारगिल युद्ध परवेज मुशर्रफ की ही खुराफात था। संप्रति यूसुफ रजा गिलानी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हैं, लेकिन पाकिस्तान में चार ए-अल्लाह, आर्मी, आतंक और अमेरिका- का रुतबा है। प्रधानमंत्री सेना के दबाव में हैं। आतंकवाद पाकिस्तानी विचारधारा में जिहाद है, अमेरिका अपने ऊपर हुए हमले के विरुद्ध सीधा आक्रमण करता है, लेकिन पाकिस्तान से जुड़ी हर वारदात में अमेरिकी राजनयिकों की 'संतुलन सेवाएं' नि:शुल्क उपलब्ध हैं।
पाकिस्तान आतंकी विचारधारा पर भारी खर्च करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल आफ गवर्नमेंट की अमेरिकी विद्वान जेसिका स्टर्न ने 'फारेन अफेयर्स' (नवंबर- दिसंबर 2000) में लिखा था कि पाकिस्तान में 45 हजार मदरसे हैं। इनमें केवल 4000 ही सरकार में पंजीकृत हैं। आंकडे़ 8 बरस पुराने हैं। भुट्टो के सहायक और पाकिस्तानी इतिहासकार केके अजीज ने अपने शोध में पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों का विष-विश्लेषण किया है। कक्षा 2 की इतिहास की किताब के अनुसार नेहरू ने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुओं की सरकार होगी, जिन्ना ने कहा-यहां मुसलमान भी रहते हैं। कक्षा 3 की किताब के अनुसार राजा जयपाल ने महमूद गजनवी के मुल्क में घुसने की कोशिश की। महमूद ने राजा को हरा दिया, लाहौर हथिया लिया। पाकिस्तानी तरुणाई का विकास इसी विष-विचार से किया जाता है, फिर आतंकी शिविर सेवाएं देते हैं। फिर आईएसआई मदद करती है। सीमा पर भले ही युद्धविराम हो, लेकिन आईएसआई के आतंकी बिना अल्पविराम आक्रामक हैं। भारत सोचे कि क्या करना है? भारत की विदेश नीति मित्रतापूर्ण है, पाकिस्तान की नीति युद्धक है। नेहरू से लेकर वाजपेयी और मनमोहन तक प्रेम की मनुहार है, लेकिन जवाब में युद्ध और परमाणु बम की धमकियां हैं। भारत पाकिस्तान विषयक विदेश नीति का आद्योपांत पुनरीक्षण करे। युद्ध ठीक नहीं होता, लेकिन थोपे गए युद्ध को टालने का कोई उपाय तो करना ही होगा।
[हृदयनारायण दीक्षित: लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं]
Take the war to the enemy
New Delhi continues to fumble while India burns.
Pakistan's superior psychological warfare machinery further tied down the already overstretched Indian security forces in knots. Airports and railway stations are the new fortresses that are heavily guarded. Next will be Metro stations or shopping malls. The list is endless. This is what the enemy wants -- tire and dull the edges of the security forces of India by making them run hither and thither.
This remains the single important reason why intelligence and police machinery of the Union and the states have collapsed. Perpetual red alerts, 24x7 for the past three decades have reduced them to dysfunctional entities with no declared objectives to achieve. The ease with which Parliament or Mumbai were attacked stands witness to the fact. Worse, our leadership's response to the threat posed was too shameful to comment upon.
New Delhi is walking into the trap by superficially trying to guard every inch. Neither feasible nor a method recommended. The Indian leadership that inducted them in a marshy land of insurgency and terrorism for more than two decades without any clarity in political or military objectives is adding to the confusion of the security forces.
Forces that are inducted into battles always need clarity of purpose, military objectives spelled out and swiftness in conduct of operations to avoid demoralisation. Otherwise, battles cannot be won and there is the likelihood of the forces landing in disarray. It appears to be now happening to the Indian security apparatus on the ground.
Imagine if ten trained terrorists from Karachi can hold the financial capital of India to ransom for days, what will happen if 500 pour in from different points in to the country? They can literally bring the entire nation to its knees.
To say that the threat from radical Islam was not known despite the collapse of the intelligence machinery is not true. The very fact that the prime minister and his colleagues for many years are forced to move under heavy security blanket within their own capital city with roads lined up with policemen is a shameful declaration of the existing threat to the Union. Couple this fact with the increasing frequency of attacks by the Islamic terrorists in recent times and the entire threat perception becomes crystal clear.
To tie up security forces in knots internally to deal with the externally sponsored, trained, and petro-dollar financed terrorism exported by the Pakistan army and the Inter Services Intelligence will deaden their morale and will to fight. While there is definitely an internal dimension to security, to put the forces within on a self-destructive directionless path is exactly what the enemy wants!
Either the political set up in New Delhi has not understood this raw truth in war fighting or is too scared to take the war back to enemy territory. This war must be fought decisively in Pakistan before it engulfs the Union of India in its entirety.
Pakistan is in cahoots with other dictatorial regimes on our borders. China wants to tie down India to retain its top dog status in Asia. Maoist Nepal favours China. Bangladesh, another laboratory of radical Islam, is in connivance with these dictatorial regimes. The subtle alliance of China, Pakistan, Bangladesh and Nepal Maoists pose a combined threat to the territorial integrity of India. Of course, overtly these regimes pretend to work in isolation of each other so as not to alarm New Delhi.
To avoid destruction of our forces by deployment in unending internal circuses and before war fatigue sets in, we need to take the war imposed by radical Islam to the enemy territory. Unless the source of supply is disabled, this war cannot be won. The core group orchestrating this drama is the Pakistan army and the ISI. These external links are required to be put in disarray. This can only happen if the war is re-exported to Pakistan.
If the poisonous flow from the external links is not stopped, Indian Muslims will be radicalised, which is the primary aim of Pakistan. Similarly, a backlash from the majority that is responsible for the liberal philosophy of India can wreck the democratic set-up. Non-governance is not really an option available to the prime minister. Mumbai and other attacks mounted by terrorists on Indian cities, could not have taken place without local support. For the police or intelligence agencies to profess otherwise is untruthful.
Another falsehood perpetuated by the eternally helpless breed of Indians is that a stable Pakistan is in India's interest. It is not, stable or otherwise. Pakistan is a failed State. It is on the brink of disintegration. It simply needs to be helped to remove itself and the map redrawn. Otherwise, the cost to India will keep increasing disproportionately.
To take this war to the enemy, New Delhi needs a deliberate, graded and escalating response with a clear political and military objective to help Islamabad disintegrate:
Snap diplomatic relations immediately.
Declare Pakistan a terrorist State.
Discontinue all trains and bus services as well as trade and business transactions.
Announce renegotiations of the Indus Water Treaty as the terms unduly favour Pakistan.
Begin a process to regulate the water supplies and build new mechanisms to activate water flow controls.
Cancel permissions for over flights.
Seal the Nepal and Bangladesh borders on a priority basis.
Build a grand alliance of democracies by increasing their stakes in the burgeoning economic pie of India, to leverage their support against authoritarian regimes on our border including Pakistan.
Increase immediately FDI in the defence sector from 26 percent to 49 percent. This will help India to emerge as the most modern technology driven defence industry hub in Asia while making it profitable for Western companies to invest.
Instead of fighting at cross-purposes with Asia's largest media, harness its resources to conduct unprecedented psychological warfare. In times of war, the media is a weapon, a platform to be used intelligently to secure the national interests without attempting to hinder its freedom.
Equip the intelligence agencies with clear directives and resources to conduct deniable acts in enemy land similar to Islamabad's terrorist acts. Thus raise the cost to the enemy and make it prohibitive for Pakistan. This will also fuel the disintegration of this tottering State. The game can be played by equal finesse by us.
To defend the taxpayer's millions of dollars invested in Afghanistan's reconstruction programme, move two integrated divisions with substantial air element in the area, in consultation with Kabul. Let Indian pressures build up from the east and west on Pakistan so that our embassy or similar establishments are not targeted in the future.
The Bush administration's strategy that Western forces without India's support will win in the Afghanistan-Pakistan region is misguided and counter-productive. They cannot win without New Delhi's direct involvement. The incoming Obama administration urgently needs to change this policy in Washington's interest. Similarly, New Delhi should learn to fight its own war instead of expecting others do its dirty work.
Simultaneously equip and marshal the military forces on a war footing, removing all deficiencies including the human resources as war at an appropriate time of our choosing remains an open option.
We should stop tying up our forces internally in an endless mind-boggling game. This will result in disintegration and ineffective security instruments available to the State. The helplessness of the under-trained and under-equipped police was on display during the attack in Mumbai. Therefore, instead of permitting our forces to disintegrate in the long term, it is sensible to take this war to Pakistan and make them pay the price.
It is time, India woke from its slumber.
Bharat Verma is editor, Indian Defence Review
Pakistan's superior psychological warfare machinery further tied down the already overstretched Indian security forces in knots. Airports and railway stations are the new fortresses that are heavily guarded. Next will be Metro stations or shopping malls. The list is endless. This is what the enemy wants -- tire and dull the edges of the security forces of India by making them run hither and thither.
This remains the single important reason why intelligence and police machinery of the Union and the states have collapsed. Perpetual red alerts, 24x7 for the past three decades have reduced them to dysfunctional entities with no declared objectives to achieve. The ease with which Parliament or Mumbai were attacked stands witness to the fact. Worse, our leadership's response to the threat posed was too shameful to comment upon.
New Delhi is walking into the trap by superficially trying to guard every inch. Neither feasible nor a method recommended. The Indian leadership that inducted them in a marshy land of insurgency and terrorism for more than two decades without any clarity in political or military objectives is adding to the confusion of the security forces.
Forces that are inducted into battles always need clarity of purpose, military objectives spelled out and swiftness in conduct of operations to avoid demoralisation. Otherwise, battles cannot be won and there is the likelihood of the forces landing in disarray. It appears to be now happening to the Indian security apparatus on the ground.
Imagine if ten trained terrorists from Karachi can hold the financial capital of India to ransom for days, what will happen if 500 pour in from different points in to the country? They can literally bring the entire nation to its knees.
To say that the threat from radical Islam was not known despite the collapse of the intelligence machinery is not true. The very fact that the prime minister and his colleagues for many years are forced to move under heavy security blanket within their own capital city with roads lined up with policemen is a shameful declaration of the existing threat to the Union. Couple this fact with the increasing frequency of attacks by the Islamic terrorists in recent times and the entire threat perception becomes crystal clear.
To tie up security forces in knots internally to deal with the externally sponsored, trained, and petro-dollar financed terrorism exported by the Pakistan army and the Inter Services Intelligence will deaden their morale and will to fight. While there is definitely an internal dimension to security, to put the forces within on a self-destructive directionless path is exactly what the enemy wants!
Either the political set up in New Delhi has not understood this raw truth in war fighting or is too scared to take the war back to enemy territory. This war must be fought decisively in Pakistan before it engulfs the Union of India in its entirety.
Pakistan is in cahoots with other dictatorial regimes on our borders. China wants to tie down India to retain its top dog status in Asia. Maoist Nepal favours China. Bangladesh, another laboratory of radical Islam, is in connivance with these dictatorial regimes. The subtle alliance of China, Pakistan, Bangladesh and Nepal Maoists pose a combined threat to the territorial integrity of India. Of course, overtly these regimes pretend to work in isolation of each other so as not to alarm New Delhi.
To avoid destruction of our forces by deployment in unending internal circuses and before war fatigue sets in, we need to take the war imposed by radical Islam to the enemy territory. Unless the source of supply is disabled, this war cannot be won. The core group orchestrating this drama is the Pakistan army and the ISI. These external links are required to be put in disarray. This can only happen if the war is re-exported to Pakistan.
If the poisonous flow from the external links is not stopped, Indian Muslims will be radicalised, which is the primary aim of Pakistan. Similarly, a backlash from the majority that is responsible for the liberal philosophy of India can wreck the democratic set-up. Non-governance is not really an option available to the prime minister. Mumbai and other attacks mounted by terrorists on Indian cities, could not have taken place without local support. For the police or intelligence agencies to profess otherwise is untruthful.
Another falsehood perpetuated by the eternally helpless breed of Indians is that a stable Pakistan is in India's interest. It is not, stable or otherwise. Pakistan is a failed State. It is on the brink of disintegration. It simply needs to be helped to remove itself and the map redrawn. Otherwise, the cost to India will keep increasing disproportionately.
To take this war to the enemy, New Delhi needs a deliberate, graded and escalating response with a clear political and military objective to help Islamabad disintegrate:
Snap diplomatic relations immediately.
Declare Pakistan a terrorist State.
Discontinue all trains and bus services as well as trade and business transactions.
Announce renegotiations of the Indus Water Treaty as the terms unduly favour Pakistan.
Begin a process to regulate the water supplies and build new mechanisms to activate water flow controls.
Cancel permissions for over flights.
Seal the Nepal and Bangladesh borders on a priority basis.
Build a grand alliance of democracies by increasing their stakes in the burgeoning economic pie of India, to leverage their support against authoritarian regimes on our border including Pakistan.
Increase immediately FDI in the defence sector from 26 percent to 49 percent. This will help India to emerge as the most modern technology driven defence industry hub in Asia while making it profitable for Western companies to invest.
Instead of fighting at cross-purposes with Asia's largest media, harness its resources to conduct unprecedented psychological warfare. In times of war, the media is a weapon, a platform to be used intelligently to secure the national interests without attempting to hinder its freedom.
Equip the intelligence agencies with clear directives and resources to conduct deniable acts in enemy land similar to Islamabad's terrorist acts. Thus raise the cost to the enemy and make it prohibitive for Pakistan. This will also fuel the disintegration of this tottering State. The game can be played by equal finesse by us.
To defend the taxpayer's millions of dollars invested in Afghanistan's reconstruction programme, move two integrated divisions with substantial air element in the area, in consultation with Kabul. Let Indian pressures build up from the east and west on Pakistan so that our embassy or similar establishments are not targeted in the future.
The Bush administration's strategy that Western forces without India's support will win in the Afghanistan-Pakistan region is misguided and counter-productive. They cannot win without New Delhi's direct involvement. The incoming Obama administration urgently needs to change this policy in Washington's interest. Similarly, New Delhi should learn to fight its own war instead of expecting others do its dirty work.
Simultaneously equip and marshal the military forces on a war footing, removing all deficiencies including the human resources as war at an appropriate time of our choosing remains an open option.
We should stop tying up our forces internally in an endless mind-boggling game. This will result in disintegration and ineffective security instruments available to the State. The helplessness of the under-trained and under-equipped police was on display during the attack in Mumbai. Therefore, instead of permitting our forces to disintegrate in the long term, it is sensible to take this war to Pakistan and make them pay the price.
It is time, India woke from its slumber.
Bharat Verma is editor, Indian Defence Review
लक्ष्य से भटकी हुई लड़ाई
भारत जल रहा है और नई दिल्ली यह तय नहीं कर पा रही कि उसे किस राह जाना है? मनोवैज्ञानिक दबाव में माहिर पाकिस्तान के युद्धक तंत्र ने भारतीय सुरक्षा बलों की पहले से ही तनी रस्सियों में और बल डाल दिए हैं। हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात करने पड़े हैं। मेट्रो स्टेशन, शापिंग माल, प्रमुख स्थल-सभी कुछ सुरक्षा के घेरे में हैं। यही शत्रु चाहता भी है-भारतीय सुरक्षा बलों को इधर-उधर दौड़ाकर थकाना और उनकी धार कुंद करना। यह स्थिति सामरिक क्षेत्र के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के रणनीतिक स्तर पर दूरदर्शी दृष्टिकोण के स्थान पर कंपनी कमांडर जैसे नजरिये का ही दुष्परिणाम है। इसके साथ ही यह केंद्र तथा राज्यों के पुलिस और खुफिया तंत्र की विफलता का महत्वपूर्ण कारण भी है। पिछले तीन दशकों से हमेशा जारी रेड अलर्ट से यह तंत्र ऐसी निष्क्रिय इकाइयों में तब्दील हो गया है जिसके पास हासिल करने के लिए कोई घोषित लक्ष्य नहीं है। जिस आसानी से भारत की संसद और मुंबई पर हमला किया गया वह इस तथ्य की पुष्टि करता है। बदतर स्थिति यह है कि इस खतरे पर हमारे नेतृत्व का नजरिया बेहद निराशाजनक है। चप्पे-चप्पे की सुरक्षा के सतही प्रयास करके भारत जाल में फंस रहा है। यह तरीका बिल्कुल अव्यावहारिक है। राजनीतिक और सामरिक उद्देश्यों में स्पष्टता के अभाव में भारतीय नेतृत्व पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से सुरक्षा बलों को उपद्रव और आतंकवाद के कीचड़ में धकेल रहा है। इससे हमारे सुरक्षा बल विभ्रम का शिकार हो रहे हैं। सुरक्षा बलों को लड़ाइयों में भेजते समय हमेशा स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए। उनका मनोबल बनाए रखने के लिए त्वरित सैन्य कार्रवाई और इसके सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित होने चाहिए, अन्यथा लड़ाई जीती नहीं जा सकती।
कल्पना कीजिए कि अगर कराची के दस प्रशिक्षित आतंकी भारत की वित्तीय राजधानी को कई दिनों तक बंधक बना सकते हैं तो देश के विभिन्न शहरों में ऐसे पांच सौ आतंकी घुस आने पर क्या हाल होगा? क्या वे पूरे देश को घुटनों के बल नहीं ला देंगे? यह कहना कि खुफिया एजेंसियों की विफलता के कारण कट्टरपंथ के खतरों का आभास नहीं हो पाया, सरासर गलत है। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई द्वारा निर्यातित, प्रशिक्षित तथा पेट्रो डालर से वित्तपोषित आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को देश में ही फंसा देने से उनका मनोबल कमजोर हो जाता है। या तो नई दिल्ली में राजनीतिक तंत्र युद्ध के इस सच को नहीं समझ पा रहा है या फिर लड़ाई को शत्रु के पाले में ले जाने में अत्यधिक सशंकित है। यह युद्ध समग्र भारतीय संघ में फैलने से पहले ही रणक्षेत्र पाकिस्तानी भूभाग को बनाना पड़ेगा। कट्टर इस्लाम की प्रयोगशाला पाकिस्तान के तार अन्य तानाशाहियों के साथ जुड़े हुए हैं। चीन एशिया की महाशक्ति बने रहने के लिए भारत का उदय देखना नहीं चाहता। माओवादी नेपाल चीन का पक्षधर है। कट्टरवादी इस्लाम की दूसरी प्रयोगशाला बांग्लादेश का इन तानाशाही शासनों के साथ गुप्त सहयोग है। चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की साठगांठ भारतीय भूभाग की अखंडता के लिए खतरा है। सुरक्षा बलों को घरेलू मोर्चे पर क्षति उठाने से बचाने के लिए हमें मजहबी कट्टरता द्वारा थोपे गए युद्ध को उसी की भूमि पर ले जाना होगा। जब तक आपूर्ति का स्त्रोत नहीं मिटेगा, इस युद्ध को जीता नहीं जा सकता। इस ड्रामे की निर्देशक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई हैं। इन वाह्यं सूत्रों को नाकाम करना जरूरी है। यह तभी संभव है जब पाकिस्तान की युद्ध की चुनौती को पलट दिया जाए। अगर वाह्यं कड़ियों से जहरीला प्रवाह नहीं रोका जाता तो भारतीय मुसलमान भी कट्टरपंथी हो जाएंगे, जो पाकिस्तान का प्रमुख ध्येय है। इसी प्रकार बहुसंख्यकों की ढिलाई, जो भारत की उदारवादी विचारधारा की परिचायक है, भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त कर देगी। हमारे सामने सुशासन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।
इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि मुंबई और भारत के अन्य शहरों पर किए गए हमले स्थानीय समर्थन के बगैर संभव नहीं हैं। 'शाश्वत असहाय' प्रजाति के भारतीयों का एक अन्य भ्रम यह है कि स्थिर पाकिस्तान भारत के हित में है। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है। यह विखंडन की कगार पर है। इसे खुद के खात्मे के लिए मदद की जरूरत है ताकि नक्शों का पुनर्निर्धारण किया जा सके। यह मदद जल्द देनी चाहिए, अन्यथा भारत के लिए इसकी कीमत बराबर बढ़ती चली जाएगी। इस युद्ध को दुश्मनों की हदों में ले जाने के लिए भारत को स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों के साथ निर्णायक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले तो कूटनीतिक संबंध समाप्त करने में देर नहींकरनी चाहिए। पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित करना, व्यावसायिक संबंध समाप्त करना, बस और रेल सेवा रद्द करना, सिंधु जल संधि के संबंध में फिर से वार्ता की घोषणा करना ऐसे अन्य उपाय हैं। इसके अलावा नेपाल और बांग्लादेश सीमा को प्राथमिकता के साथ सील कर दिया जाना चाहिए। भारत को सहयोगी लोकतांत्रिक देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ कर पाकिस्तान के खिलाफ उनका समर्थन हासिल करना चाहिए। अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ने के लिए मीडिया का भी इस्तेमाल करना चाहिए। युद्धकाल में मीडिया का बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल एक हथियार की तरह काम आता है। खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट दिशा-निर्देशों और संसाधनों से लैस कर शत्रु देश की अधिकाधिक जानकारी हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। बुश प्रशासन की यह रणनीति दिशाहीन और बेअसर है कि वह भारत के समर्थन के बिना अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर जीत हासिल कर सकता है। भारत के सीधे दखल के बिना यह संभव नहीं है। निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस नीति में बदलाव करने की जरूरत है। भारत को अन्य देशों से अपेक्षा रखने के बजाय अपनी लड़ाई खुद लड़ना सीखना होगा।
[भरत वर्मा: लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं]
कल्पना कीजिए कि अगर कराची के दस प्रशिक्षित आतंकी भारत की वित्तीय राजधानी को कई दिनों तक बंधक बना सकते हैं तो देश के विभिन्न शहरों में ऐसे पांच सौ आतंकी घुस आने पर क्या हाल होगा? क्या वे पूरे देश को घुटनों के बल नहीं ला देंगे? यह कहना कि खुफिया एजेंसियों की विफलता के कारण कट्टरपंथ के खतरों का आभास नहीं हो पाया, सरासर गलत है। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई द्वारा निर्यातित, प्रशिक्षित तथा पेट्रो डालर से वित्तपोषित आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को देश में ही फंसा देने से उनका मनोबल कमजोर हो जाता है। या तो नई दिल्ली में राजनीतिक तंत्र युद्ध के इस सच को नहीं समझ पा रहा है या फिर लड़ाई को शत्रु के पाले में ले जाने में अत्यधिक सशंकित है। यह युद्ध समग्र भारतीय संघ में फैलने से पहले ही रणक्षेत्र पाकिस्तानी भूभाग को बनाना पड़ेगा। कट्टर इस्लाम की प्रयोगशाला पाकिस्तान के तार अन्य तानाशाहियों के साथ जुड़े हुए हैं। चीन एशिया की महाशक्ति बने रहने के लिए भारत का उदय देखना नहीं चाहता। माओवादी नेपाल चीन का पक्षधर है। कट्टरवादी इस्लाम की दूसरी प्रयोगशाला बांग्लादेश का इन तानाशाही शासनों के साथ गुप्त सहयोग है। चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की साठगांठ भारतीय भूभाग की अखंडता के लिए खतरा है। सुरक्षा बलों को घरेलू मोर्चे पर क्षति उठाने से बचाने के लिए हमें मजहबी कट्टरता द्वारा थोपे गए युद्ध को उसी की भूमि पर ले जाना होगा। जब तक आपूर्ति का स्त्रोत नहीं मिटेगा, इस युद्ध को जीता नहीं जा सकता। इस ड्रामे की निर्देशक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई हैं। इन वाह्यं सूत्रों को नाकाम करना जरूरी है। यह तभी संभव है जब पाकिस्तान की युद्ध की चुनौती को पलट दिया जाए। अगर वाह्यं कड़ियों से जहरीला प्रवाह नहीं रोका जाता तो भारतीय मुसलमान भी कट्टरपंथी हो जाएंगे, जो पाकिस्तान का प्रमुख ध्येय है। इसी प्रकार बहुसंख्यकों की ढिलाई, जो भारत की उदारवादी विचारधारा की परिचायक है, भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त कर देगी। हमारे सामने सुशासन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।
इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि मुंबई और भारत के अन्य शहरों पर किए गए हमले स्थानीय समर्थन के बगैर संभव नहीं हैं। 'शाश्वत असहाय' प्रजाति के भारतीयों का एक अन्य भ्रम यह है कि स्थिर पाकिस्तान भारत के हित में है। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है। यह विखंडन की कगार पर है। इसे खुद के खात्मे के लिए मदद की जरूरत है ताकि नक्शों का पुनर्निर्धारण किया जा सके। यह मदद जल्द देनी चाहिए, अन्यथा भारत के लिए इसकी कीमत बराबर बढ़ती चली जाएगी। इस युद्ध को दुश्मनों की हदों में ले जाने के लिए भारत को स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों के साथ निर्णायक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले तो कूटनीतिक संबंध समाप्त करने में देर नहींकरनी चाहिए। पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित करना, व्यावसायिक संबंध समाप्त करना, बस और रेल सेवा रद्द करना, सिंधु जल संधि के संबंध में फिर से वार्ता की घोषणा करना ऐसे अन्य उपाय हैं। इसके अलावा नेपाल और बांग्लादेश सीमा को प्राथमिकता के साथ सील कर दिया जाना चाहिए। भारत को सहयोगी लोकतांत्रिक देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ कर पाकिस्तान के खिलाफ उनका समर्थन हासिल करना चाहिए। अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ने के लिए मीडिया का भी इस्तेमाल करना चाहिए। युद्धकाल में मीडिया का बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल एक हथियार की तरह काम आता है। खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट दिशा-निर्देशों और संसाधनों से लैस कर शत्रु देश की अधिकाधिक जानकारी हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। बुश प्रशासन की यह रणनीति दिशाहीन और बेअसर है कि वह भारत के समर्थन के बिना अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर जीत हासिल कर सकता है। भारत के सीधे दखल के बिना यह संभव नहीं है। निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस नीति में बदलाव करने की जरूरत है। भारत को अन्य देशों से अपेक्षा रखने के बजाय अपनी लड़ाई खुद लड़ना सीखना होगा।
[भरत वर्मा: लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं]
Monday, December 22, 2008
आतंकवाद का यथार्थ
पिछले दो दशकों में आतंकवाद तथा अलगाववाद का यथार्थ भारतीय राष्ट्र-राज्य के चेहरे पर घाव पर घाव लगा रहा है, लेकिन हर बार भारत इन पर लगे खून को पोंछकर कुछ खोखली घोषणाएं कर देता है और अपने आसपास की कड़वी सच्चाई से मुंह मोड़ लेता है। सवाल यह है कि क्या मुंबई में हुआ आतंकी हमला भारतीय राष्ट्र-राज्य को सच्चाई तक पहुंचने के लिए प्रेरित करेगा? सच्चाई यह है कि हाल के समय में भारत और उससे बाहर इस्लामिक कट्टरता में एक नए प्रकार का पागलपन शामिल हो गया है। सच्चाई यह है कि देश का राजनीतिक वर्ग समाज के विभिन्न स्तरों पर मौजूद नकारात्मक तथा स्वार्थी शक्तियों के एकीकृत तथा प्रतिबद्ध हमले से निपट पाने में असमर्थ साबित हो रहा है। सच्चाई यह भी है कि हमारा लोकतंत्र उन कंधों पर है जो कमजोर मिट्टी के बने हैं। इन सबसे ऊपर की सच्चाई यह है कि हर चीज को हल्के-फुल्के तरीके से लेने की हमारी संस्कृति हमें अपनी कमजोरियों की पहचान करने तथा उनका निदान करने से रोक देती है। जब तक इन सच्चाइयों का सामना नहीं किया जाता तब तक आतंकवाद तथा अलगाववाद किसी न किसी रूप में हमें लहूलुहान करता रहेगा।
जब मुझे दूसरी बार 19 जनवरी 1990 को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तब मुझसे कहा गया था कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक मशीनरी पूरी तरह ढह गई है। मुझसे यह अपेक्षा की गई कि मैंने 1984 के शुरुआती दौर से 1989 तक अपने पहले कार्यकाल में लोगों और नौकरशाही के साथ जो तारतम्यता स्थापित कर ली थी उसका फायदा उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ के हाथों से फिसलने से रोकने के कुछ उपाय करूं। परिदृश्य में आने के बाद मैंने पाया कि आईएसआई तथा उसके एजेंटों द्वारा कश्मीर घाटी में आतंकवाद तथा घुसपैठ का व्यापक नेटवर्क कायम कर लिया गया है। वे वही तकनीक अपना रहे थे जो सीआईए के रणनीतिकारों ने अफगान युद्ध में अपनाई थी। अफगान युद्ध में सीआईए ने खासतौर पर इस्लाम के कतिपय कंट्टर पहलुओं का इस्तेमाल करते हुए स्थानीय लोगों को रूस के सैन्य बलों के विरुद्ध खड़ा किया। यही काम मिलते-जुलते रूप में घाटी में हो रहा था। बगावत के लिए उकसाने वाला साहित्य बड़े पैमाने पर घाटी के लोगों में बांटा गया था। लोगों के दिलोदिमाग को किस तरह झकझोरा जा रहा था उसका एक खास उदाहरण व्यापक रूप से वितरित किए गए उस कैसेट का है, जिसमें एक ऐसा गीत था जिसे कश्मीर का स्वाधीनता गीत कहा जा रहा था।
कश्मीरी मुस्लिम मष्तिष्क को भावनात्मक रूप से बरगलाने के इन प्रयासों के खिलाफ न तो केंद्र सरकार ने कुछ किया और न ही राज्य सरकार ने। राष्ट्रीय अथवा स्थानीय स्तर पर किसी नेता ने लोगों को यह समझाने की कोशिश नहींकी कि जो कुछ उनके दिमाग में भरा जा रहा है उसकी असलियत क्या है और एक ऐसे देश में जिहाद का कोई स्थान नहीं जो संवैधानिक रूप से लोगों को मजहब की आजादी प्रदान करता है। दूसरी ओर जमाते इस्लामी तथा दूसरे कट्टरपंथी संगठनों ने आईएसआई के वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग की मदद से अपनी गतिविधियां कई गुना बढ़ा दीं और मीडिया, शिक्षा पद्धति तथा शासन के अन्य अनेक संस्थानों के ढांचे में घुसपैठ कर ली। सीआईए ने अफगान युद्ध में आईएसआई को जो भारी-भरकम धनराशि उपलब्ध कराई थी उसका लगभग 60 प्रतिशत भाग इस पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा घाटी में आतंकवाद के तानेबाने में झोंक दिया गया।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की इतनी गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए मैंने कई नए और कठोर कदम उठाए। राष्ट्र विरोधी सामग्री को जब्त करना, उन स्थानों से लाउडस्पीकर हटवाना जहां से मजहब के नाम पर हिंसा भड़काने का काम किया जा रहा था और गुरिल्ला शैली में गुरिल्ला युद्ध से निपटने के सिद्धांत पर विशेष दस्तों का गठन ऐसे ही कुछ कदम थे। आतंकवाद के खिलाफ कई स्तर पर कदम उठाने का परिणाम ठोस सुधार के रूप में सामने आया, जिसे लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने महसूस किया। लेफ्टिनेंट जनरल एनसी रावले ने जो कुछ मुझे लिखा था वह और भी अधिक प्रासंगिक है-''मुझे गुरिल्ला अभियानों का अच्छा-खासा अनुभव है। दो महीने पहले तक मेरा विचार था कि हम कश्मीर खो चुके हैं। जब से आपने मौजूदा नीति अपनाई है, पूरी स्थिति ही बदल गई है। अब मुझे लगता है कि हम कश्मीर नहीं हारेंगे।'' जमीनी स्तर पर तेजी से सुधरती स्थितियों ने आईएसआई तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की साजिश गड़बड़ा दी। वे यह सोचने लगे थे कि कुछ ही हफ्तों के भीतर कश्मीर घाटी उनकी झोली में गिर जाएगी।
बुरी तरह हतोत्साहित होकर उन्होंने मेरे खिलाफ खास तरह का दुष्प्रचार आरंभ कर दिया। मुझे याद है कि बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर आकर कैसे-कैसे भाषण दिए थे। एक मौके पर उन्होंने कहा-''जग-जग-मोहन को भाग-भाग मोहन कर देंगे।'' मुझे आश्चर्य होता है कि व्यक्ति के रूप में वह मुझे क्यों निशाना बनाना चाहती थीं? शायद वह यह समझती थीं कि मेरे लक्ष्य की ओर केंद्रित व्यापक दृष्टिकोण के कारण पाकिस्तान की योजनाएं धरी रह जाएंगी। दुर्भाग्य से लगभग उसी समय कई तरह के तत्वों द्वारा मेरे खिलाफ मिथ्या सूचनाओं पर आधारित एक अभियान आरंभ कर दिया गया, जो बेनजीर भुट्टो के इरादों की पूर्ति करने वाला था। इनमें से कुछ लोग ऐसे थे जिनके राजनीतिक स्वार्थ थे। कुछ अन्य लोगों ने मानवाधिकारों की आड़ में इस अभियान में हाथ बंटाया और जमकर दुष्प्रचार किया। यह कहा गया कि राज्यपाल ने इसलिए कश्मीरी पंडितों को हटाया है ताकि वह घाटी में बमबारी कर सकें। इस सबका असर यह हुआ कि आतंक विरोधी अभियान की दिशा बाधित हो गई। सुरक्षा बलों तथा दूसरी एजेंसियों में एक प्रकार की हताशा फैल गई। खुद मुझे परिदृश्य से हटना पड़ा। तब अनंतनाग के एक शीर्ष आतंकवादी मंजूर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जगमोहन के हटाए जाने से हमारी उम्मीदें फिर बढ़ गई हैं।
इसके बाद क्या हुआ, यह हर कोई देख सकता है। जम्मू-कश्मीर में लगभग साठ हजार लोग मारे जा चुके हैं। जिस बुराई को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से मिटाया जा सकता था उसे हमने देश के बड़े हिस्से में फैल जाने दिया। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में हमने कभी वह स्पष्टता तथा दृढ़ता विकसित करने की कोशिश नहीं की जो आतंकवाद सरीखी बुराई से लड़ने के लिए आवश्यक है। आज भी हम अपने आप से यह सवाल नहीं कर रहे हैं कि जब जम्मू-कश्मीर के प्रानकोट में 28 नागरिकों को लाइन में खड़ा कर गोली से उड़ा दिया गया था तब कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली थी, क्यों गुस्से का एक भी नारा सुनाई नहीं दिया, क्यों कोई जुलूस नहीं निकला? यदि राजनीति, व्यवसाय, बौद्धिक समुदाय और मीडिया के विशिष्ट वर्ग ने जम्मू-कश्मीर में बसों में जलाए जा रहे निर्दोष लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की होती तो आतंकवाद का दैत्य ताज और ट्राइडेंट होटलों के डाइनिंग हाल तक नहीं पहुंचता। यह वर्ग सही समय पर सच्चाई का सामना करने के बजाय अपराधों की तार्किकता सिद्ध करने में जुट जाता है। यदि आज के भारत की सच्चाइयों को भी इसी तरह दफनाया जाता रहेगा तो मुंबई का नरसंहार अंतिम नहीं होगा।
[जगमोहन : लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं]
जब मुझे दूसरी बार 19 जनवरी 1990 को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तब मुझसे कहा गया था कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक मशीनरी पूरी तरह ढह गई है। मुझसे यह अपेक्षा की गई कि मैंने 1984 के शुरुआती दौर से 1989 तक अपने पहले कार्यकाल में लोगों और नौकरशाही के साथ जो तारतम्यता स्थापित कर ली थी उसका फायदा उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ के हाथों से फिसलने से रोकने के कुछ उपाय करूं। परिदृश्य में आने के बाद मैंने पाया कि आईएसआई तथा उसके एजेंटों द्वारा कश्मीर घाटी में आतंकवाद तथा घुसपैठ का व्यापक नेटवर्क कायम कर लिया गया है। वे वही तकनीक अपना रहे थे जो सीआईए के रणनीतिकारों ने अफगान युद्ध में अपनाई थी। अफगान युद्ध में सीआईए ने खासतौर पर इस्लाम के कतिपय कंट्टर पहलुओं का इस्तेमाल करते हुए स्थानीय लोगों को रूस के सैन्य बलों के विरुद्ध खड़ा किया। यही काम मिलते-जुलते रूप में घाटी में हो रहा था। बगावत के लिए उकसाने वाला साहित्य बड़े पैमाने पर घाटी के लोगों में बांटा गया था। लोगों के दिलोदिमाग को किस तरह झकझोरा जा रहा था उसका एक खास उदाहरण व्यापक रूप से वितरित किए गए उस कैसेट का है, जिसमें एक ऐसा गीत था जिसे कश्मीर का स्वाधीनता गीत कहा जा रहा था।
कश्मीरी मुस्लिम मष्तिष्क को भावनात्मक रूप से बरगलाने के इन प्रयासों के खिलाफ न तो केंद्र सरकार ने कुछ किया और न ही राज्य सरकार ने। राष्ट्रीय अथवा स्थानीय स्तर पर किसी नेता ने लोगों को यह समझाने की कोशिश नहींकी कि जो कुछ उनके दिमाग में भरा जा रहा है उसकी असलियत क्या है और एक ऐसे देश में जिहाद का कोई स्थान नहीं जो संवैधानिक रूप से लोगों को मजहब की आजादी प्रदान करता है। दूसरी ओर जमाते इस्लामी तथा दूसरे कट्टरपंथी संगठनों ने आईएसआई के वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग की मदद से अपनी गतिविधियां कई गुना बढ़ा दीं और मीडिया, शिक्षा पद्धति तथा शासन के अन्य अनेक संस्थानों के ढांचे में घुसपैठ कर ली। सीआईए ने अफगान युद्ध में आईएसआई को जो भारी-भरकम धनराशि उपलब्ध कराई थी उसका लगभग 60 प्रतिशत भाग इस पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा घाटी में आतंकवाद के तानेबाने में झोंक दिया गया।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की इतनी गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए मैंने कई नए और कठोर कदम उठाए। राष्ट्र विरोधी सामग्री को जब्त करना, उन स्थानों से लाउडस्पीकर हटवाना जहां से मजहब के नाम पर हिंसा भड़काने का काम किया जा रहा था और गुरिल्ला शैली में गुरिल्ला युद्ध से निपटने के सिद्धांत पर विशेष दस्तों का गठन ऐसे ही कुछ कदम थे। आतंकवाद के खिलाफ कई स्तर पर कदम उठाने का परिणाम ठोस सुधार के रूप में सामने आया, जिसे लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने महसूस किया। लेफ्टिनेंट जनरल एनसी रावले ने जो कुछ मुझे लिखा था वह और भी अधिक प्रासंगिक है-''मुझे गुरिल्ला अभियानों का अच्छा-खासा अनुभव है। दो महीने पहले तक मेरा विचार था कि हम कश्मीर खो चुके हैं। जब से आपने मौजूदा नीति अपनाई है, पूरी स्थिति ही बदल गई है। अब मुझे लगता है कि हम कश्मीर नहीं हारेंगे।'' जमीनी स्तर पर तेजी से सुधरती स्थितियों ने आईएसआई तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की साजिश गड़बड़ा दी। वे यह सोचने लगे थे कि कुछ ही हफ्तों के भीतर कश्मीर घाटी उनकी झोली में गिर जाएगी।
बुरी तरह हतोत्साहित होकर उन्होंने मेरे खिलाफ खास तरह का दुष्प्रचार आरंभ कर दिया। मुझे याद है कि बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर आकर कैसे-कैसे भाषण दिए थे। एक मौके पर उन्होंने कहा-''जग-जग-मोहन को भाग-भाग मोहन कर देंगे।'' मुझे आश्चर्य होता है कि व्यक्ति के रूप में वह मुझे क्यों निशाना बनाना चाहती थीं? शायद वह यह समझती थीं कि मेरे लक्ष्य की ओर केंद्रित व्यापक दृष्टिकोण के कारण पाकिस्तान की योजनाएं धरी रह जाएंगी। दुर्भाग्य से लगभग उसी समय कई तरह के तत्वों द्वारा मेरे खिलाफ मिथ्या सूचनाओं पर आधारित एक अभियान आरंभ कर दिया गया, जो बेनजीर भुट्टो के इरादों की पूर्ति करने वाला था। इनमें से कुछ लोग ऐसे थे जिनके राजनीतिक स्वार्थ थे। कुछ अन्य लोगों ने मानवाधिकारों की आड़ में इस अभियान में हाथ बंटाया और जमकर दुष्प्रचार किया। यह कहा गया कि राज्यपाल ने इसलिए कश्मीरी पंडितों को हटाया है ताकि वह घाटी में बमबारी कर सकें। इस सबका असर यह हुआ कि आतंक विरोधी अभियान की दिशा बाधित हो गई। सुरक्षा बलों तथा दूसरी एजेंसियों में एक प्रकार की हताशा फैल गई। खुद मुझे परिदृश्य से हटना पड़ा। तब अनंतनाग के एक शीर्ष आतंकवादी मंजूर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जगमोहन के हटाए जाने से हमारी उम्मीदें फिर बढ़ गई हैं।
इसके बाद क्या हुआ, यह हर कोई देख सकता है। जम्मू-कश्मीर में लगभग साठ हजार लोग मारे जा चुके हैं। जिस बुराई को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से मिटाया जा सकता था उसे हमने देश के बड़े हिस्से में फैल जाने दिया। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में हमने कभी वह स्पष्टता तथा दृढ़ता विकसित करने की कोशिश नहीं की जो आतंकवाद सरीखी बुराई से लड़ने के लिए आवश्यक है। आज भी हम अपने आप से यह सवाल नहीं कर रहे हैं कि जब जम्मू-कश्मीर के प्रानकोट में 28 नागरिकों को लाइन में खड़ा कर गोली से उड़ा दिया गया था तब कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली थी, क्यों गुस्से का एक भी नारा सुनाई नहीं दिया, क्यों कोई जुलूस नहीं निकला? यदि राजनीति, व्यवसाय, बौद्धिक समुदाय और मीडिया के विशिष्ट वर्ग ने जम्मू-कश्मीर में बसों में जलाए जा रहे निर्दोष लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की होती तो आतंकवाद का दैत्य ताज और ट्राइडेंट होटलों के डाइनिंग हाल तक नहीं पहुंचता। यह वर्ग सही समय पर सच्चाई का सामना करने के बजाय अपराधों की तार्किकता सिद्ध करने में जुट जाता है। यदि आज के भारत की सच्चाइयों को भी इसी तरह दफनाया जाता रहेगा तो मुंबई का नरसंहार अंतिम नहीं होगा।
[जगमोहन : लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं]
खतरे से खेलता पाकिस्तान
पाकिस्तान भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाने की भरसक कोशिश कर रहा है। मुंबई पर आतंकी हमले और इसके पश्चात पाकिस्तानी राजनेताओं और मीडिया की भड़काऊ बयानबाजी से दोनों देशों में तनाव बढ़ना स्वाभाविक था। परिणामस्वरूप अमेरिका अपनी नीति और खासतौर से अफगानिस्तान में अपनी रणनीति को नए सिरे से तय करने में जुट गया है। पाकिस्तानी सरकार और सेना इस बात से पूरी तरह अवगत हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन ने लश्करे-तैयबा और मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों के बीच हुई वायरलेस पर बातचीत को बीच में ही पकड़ लिया था। अमेरिका और ब्रिटेन पूरी तरह आश्वस्त हैं कि मुंबई हमले में लश्करे-तैयबा का हाथ है और पाकिस्तानी भूमि से आतंकवाद फैलाया जा रहा है। इसके अलावा पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और वहां के मीडिया की भारत से सुबूत मांगने की रट से यह बात रेखांकित होती है कि पाकिस्तानी सेना और उसकी पिट्ठू सरकार आतंकवाद जारी रखने पर आमादा हैं। उनका उद्देश्य अमेरिका को ब्लैकमेल करना है। आतंकवाद के जरिए उकसाने के पाकिस्तानी जाल में न फंसकर भारत ने वहां की सेना के इरादों को धूमिल कर दिया है। अब भारत को पाकिस्तान के अगले कदम पर सावधानी से निगाह रखनी होगी। पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत पर और आतंकी हमले करवाने की पूरी आशंका है ताकि भारत को बदले की कार्रवाई के लिए उकसाया जा सके। भारत की कार्रवाई को पाकिस्तान तालिबान के खिलाफ युद्धरत अमेरिका के साथ पूर्ण सहयोग न करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। पाकिस्तान से होकर अफगानिस्तान ले जाई जा रही अमेरिकी रसद पर हमलों में भी तेजी आई है।
पाकिस्तानी जनरलों का ख्याल है कि इस रणनीति से वे अमेरिकी सहायता प्राप्त करने, अमेरिकी सुरक्षा बलों को थकाने और उन्हें अफगानिस्तान से वापस जाने के लिए बाध्य कर सकते हैं। इसके बाद वे अफगानिस्तान पर कब्जा जमा सकते हैं और भारत पर हमले तेज कर सकते हैं। पाकिस्तानी जनरलों को अपनी सामरिक क्षमताओं के बारे में गलतफहमी है। 1947 में जनरल अकबर खान ने भारतीय सेना के कश्मीर पहुंचने से पहले ही कश्मीर पर कब्जा जमाने का प्रयास किया था। परिणाम यह हुआ कि कश्मीर के महाराजा भारत में विलय को तैयार हो गए और कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा भारत के पास आ गया। 1965 में पाकिस्तान के जनरलों ने आपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया। इसके तहत उन्होंने कश्मीर में घुसने और पंजाब पर हमले करने की योजना बनाई। उन्हें फिर मुंह की खानी पड़ी। 1971 में उन्होंने भारत में एक करोड़ बांग्लादेशी शरणार्थियों की घुसपैठ करा दी। उनका मानना था कि अमेरिका और चीन के सहयोग से वे अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे। यह कदम बांग्लादेश के उदय का कारण बना। 1999 में मुशर्रफ ने सोचा कि कारगिल क्षेत्र में अचानक घुसकर वे भारत को पछाड़ देंगे, किंतु उन्हें भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। इस बार पाकिस्तानी जनरलों ने भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाने और आतंकवाद के माध्यम से छद्म युद्ध छेड़ने की साजिश रची है ताकि अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर किया जा सके। इसके गंभीर दुष्परिणाम स्वयं पाकिस्तान को भोगने पड़ सकते हैं। अगर अफगान और पाकिस्तानी तालिबान मिलकर अमेरिका को हराने में सफल रहे तो वे डूरंड रेखा के दोनों ओर के इलाकों को मिलाकर पश्तूनिस्तान बनाने में कामयाब हो जाएंगे। यह पाकिस्तान के पठान कबाइलियों का बहुत पुराना सपना रहा है। पाकिस्तानी सेना के सामने जितना बड़ा खतरा भारत सीमा पर है उससे बड़ी चुनौती अफगानिस्तानी और पाकिस्तानी तालिबान से निपटने की है।
एक व्यक्ति जो पाकिस्तान के इस खतरे को पूरी तरह समझता है वह हैं अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा। इसलिए अगर पाकिस्तान के जनरल अमेरिका को ब्लैकमेल करने की कोशिश करते हैं तो अमेरिका इस्लामाबाद को साफ तौर पर चेतावनी दे सकता है कि कबीलाई इलाकों से सेना हटाने पर पाकिस्तान की अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने पर पश्तूनिस्तान बनने के अलावा ईरानी मदद से दारी भाषी लोग ताजिक और उजबेक क्षेत्रों के साथ मिलकर एक अलग देश बना सकते हैं। आजकल पाकिस्तान के लोग अमेरिकी कर्नल राल्फ पीटर्स के अध्ययन का बड़ा हवाला देते हैं, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के बिखरने का निष्कर्ष व्यक्त किया है। रूस और चीन को भी अफगानिस्तान के टूटने और वहाबी पश्तूनिस्तान के उदय के असर की चिंता करनी चाहिए। सबसे अधिक तो पाकिस्तान को चिंतित होना चाहिए। दीवालिया होने से बचने के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक सहायता की जरूरत है। तेल के दाम गिर जाने के कारण यह संभावना कम ही है कि सऊदी अरब पाकिस्तान को बचाने के लिए आगे आएगा। इसलिए पाकिस्तान एक हद तक ही अमेरिका का साथ न देने और उससे मोलभाव करने की स्थिति में रह गया है।
पाकिस्तानी जनरलों को ज्यादा होशियार बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वास्तव में वे आग से खेल रहे हैं और उनका देश टूटने की कगार पर पहुंच गया है। दुर्भाग्य से पिछले आठ वर्र्षो से अमेरिका की गलत नीतियों के कारण पाकिस्तान ने गलतफहमी पाल ली है कि वह फिर से अमेरिका के साथ छल-कपट करके बेदाग बच सकता है। भारत और अमेरिका के रणनीतिकारों के लिए यह बेहद जरूरी हो जाता है कि वे मिलकर काम करें और अफगानिस्तान में अमेरिकी प्रयासों को विफल करने के पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब न होने दें। अब तक अफगानिस्तान में अमेरिका पूरी तरह अपनी नीति पर चल रहा था। अब समय आ गया है कि उसे 'एकला चलो' की नीति का परित्याग करके अफगानिस्तान के मामले में भारत से भी सलाह-मशविरा करना चाहिए।
[के. सुब्रहमण्यम : लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
पाकिस्तानी जनरलों का ख्याल है कि इस रणनीति से वे अमेरिकी सहायता प्राप्त करने, अमेरिकी सुरक्षा बलों को थकाने और उन्हें अफगानिस्तान से वापस जाने के लिए बाध्य कर सकते हैं। इसके बाद वे अफगानिस्तान पर कब्जा जमा सकते हैं और भारत पर हमले तेज कर सकते हैं। पाकिस्तानी जनरलों को अपनी सामरिक क्षमताओं के बारे में गलतफहमी है। 1947 में जनरल अकबर खान ने भारतीय सेना के कश्मीर पहुंचने से पहले ही कश्मीर पर कब्जा जमाने का प्रयास किया था। परिणाम यह हुआ कि कश्मीर के महाराजा भारत में विलय को तैयार हो गए और कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा भारत के पास आ गया। 1965 में पाकिस्तान के जनरलों ने आपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया। इसके तहत उन्होंने कश्मीर में घुसने और पंजाब पर हमले करने की योजना बनाई। उन्हें फिर मुंह की खानी पड़ी। 1971 में उन्होंने भारत में एक करोड़ बांग्लादेशी शरणार्थियों की घुसपैठ करा दी। उनका मानना था कि अमेरिका और चीन के सहयोग से वे अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे। यह कदम बांग्लादेश के उदय का कारण बना। 1999 में मुशर्रफ ने सोचा कि कारगिल क्षेत्र में अचानक घुसकर वे भारत को पछाड़ देंगे, किंतु उन्हें भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। इस बार पाकिस्तानी जनरलों ने भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाने और आतंकवाद के माध्यम से छद्म युद्ध छेड़ने की साजिश रची है ताकि अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर किया जा सके। इसके गंभीर दुष्परिणाम स्वयं पाकिस्तान को भोगने पड़ सकते हैं। अगर अफगान और पाकिस्तानी तालिबान मिलकर अमेरिका को हराने में सफल रहे तो वे डूरंड रेखा के दोनों ओर के इलाकों को मिलाकर पश्तूनिस्तान बनाने में कामयाब हो जाएंगे। यह पाकिस्तान के पठान कबाइलियों का बहुत पुराना सपना रहा है। पाकिस्तानी सेना के सामने जितना बड़ा खतरा भारत सीमा पर है उससे बड़ी चुनौती अफगानिस्तानी और पाकिस्तानी तालिबान से निपटने की है।
एक व्यक्ति जो पाकिस्तान के इस खतरे को पूरी तरह समझता है वह हैं अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा। इसलिए अगर पाकिस्तान के जनरल अमेरिका को ब्लैकमेल करने की कोशिश करते हैं तो अमेरिका इस्लामाबाद को साफ तौर पर चेतावनी दे सकता है कि कबीलाई इलाकों से सेना हटाने पर पाकिस्तान की अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने पर पश्तूनिस्तान बनने के अलावा ईरानी मदद से दारी भाषी लोग ताजिक और उजबेक क्षेत्रों के साथ मिलकर एक अलग देश बना सकते हैं। आजकल पाकिस्तान के लोग अमेरिकी कर्नल राल्फ पीटर्स के अध्ययन का बड़ा हवाला देते हैं, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के बिखरने का निष्कर्ष व्यक्त किया है। रूस और चीन को भी अफगानिस्तान के टूटने और वहाबी पश्तूनिस्तान के उदय के असर की चिंता करनी चाहिए। सबसे अधिक तो पाकिस्तान को चिंतित होना चाहिए। दीवालिया होने से बचने के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक सहायता की जरूरत है। तेल के दाम गिर जाने के कारण यह संभावना कम ही है कि सऊदी अरब पाकिस्तान को बचाने के लिए आगे आएगा। इसलिए पाकिस्तान एक हद तक ही अमेरिका का साथ न देने और उससे मोलभाव करने की स्थिति में रह गया है।
पाकिस्तानी जनरलों को ज्यादा होशियार बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वास्तव में वे आग से खेल रहे हैं और उनका देश टूटने की कगार पर पहुंच गया है। दुर्भाग्य से पिछले आठ वर्र्षो से अमेरिका की गलत नीतियों के कारण पाकिस्तान ने गलतफहमी पाल ली है कि वह फिर से अमेरिका के साथ छल-कपट करके बेदाग बच सकता है। भारत और अमेरिका के रणनीतिकारों के लिए यह बेहद जरूरी हो जाता है कि वे मिलकर काम करें और अफगानिस्तान में अमेरिकी प्रयासों को विफल करने के पाकिस्तानी मंसूबों को कामयाब न होने दें। अब तक अफगानिस्तान में अमेरिका पूरी तरह अपनी नीति पर चल रहा था। अब समय आ गया है कि उसे 'एकला चलो' की नीति का परित्याग करके अफगानिस्तान के मामले में भारत से भी सलाह-मशविरा करना चाहिए।
[के. सुब्रहमण्यम : लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
Sunday, December 21, 2008
आतंक की असलियत
इस्लामी आतंकवाद की तुलना उस राक्षस से की जा सकती है जिसके प्राण उसके शरीर में न होकर एक तोते में बसते थे। आतंकवाद के प्राण इसकी विचारधारा में बसते है, उन सरदारों और संगठनों में नहीं जिन पर प्रहार कर इसे खत्म करने की कोशिशें हो रही है। यदि ओसामा बिन लादेन या मोहम्मद अफजल को काबू भी कर लिया जाए तो भी आतंक का सिलसिला खत्म होने वाला नहीं है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अरब, यूरोप और भारत में अनेकानेक आतंकवादी मारे गए है। सैकड़ों जेलों में बंद है। तब यह आतंकवाद खत्म क्यों नहीं हो रहा है? इसलिए कि उसकी प्रेरणा, एक विशिष्ट विचारधारा से लड़ने में संकोच किया जा रहा है। बल्कि उलटे उस विचारधारा को बचाया जाता है। जब भी कोई बड़ा आतंकवादी हमला होता है तब जरूर कहा जाता है कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता। अजीब है कि अन्य अपराधियों के संबंध में बयान नहीं आता कि उनका कोई मजहब नहीं होता। इसलिए यह बयान स्वयं सच्चाई की चुगली करता है। अभी मुंबई हमले के बाद भी मौलाना मदनी, अभिनेता आमिर खान और कुछेक मुस्लिम हस्तियों ने वही बयान दोहराया। राजनीतिक दल भी ऐसी ही रट लगा रहे हैं।
यदि सच है कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता तो पिछले आठ वर्ष में दुनिया में हुए लगभग सभी आतंकवादी कारनामों के तार केवल एक देश पाकिस्तान से ही जुड़े क्यों पाए गए? दुनिया भर के आतंकवादी प्रशिक्षण या तैयारी करने वहीं क्यों जाते है, जापान या श्रीलंका क्यों नहीं जाते? यदि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता तो उनमें तरह-तरह के मजहबी विश्वासों को मानने वाले रंगरूट तैयार हो रहे होते। अफगानिस्तान में तालिबान फिर सत्ता पर काबिज होने की तैयारी कर रहे हैं। तालिबान ने ही बिन लादेन को अपना अंतरराष्ट्रीय हेडक्वार्टर बनाने के लिए जमीन दी, जहां से अलकायदा ने दुनिया भर में अनेक आतंकी हमले किए। क्या आमिर खान बताएंगे कि क्यों दुनिया की किसी ईसाई मिशनरी या बौद्ध विद्यालय से एक भी आतंकवादी क्यों नहीं निकला? पाकिस्तान में छह वर्ष पहले मजहबी मामलों के मंत्री महमूद अहमद गाजी ने कहा था कि वहां दस हजार ऐसे मदरसों की पहचान की जा रही है जहां से आतंकवाद के प्रसार का संदेह है। इस एकमात्र तथ्य से स्पष्ट है कि इस्लामी इल्म से आतंकवाद का कितना सीधा संबंध है। तब बार-बार दोहराना कि आतंकवाद को किसी मजहब से नहीं जोड़ना चाहिए, एक आत्मघाती प्रवंचना है। इस्लामी आतंकवादी संगठन, उनके ट्रेनिंग केंद्र और विचारों को उन्हे पनपाने वाली जमीन से काट कर नहीं समझा जा सकता। आज सबसे बड़ी बाधा यह है कि आतंकवाद को वैचारिक, नैतिक, भौतिक समर्थन देने वाले सभी तत्वों से आंख चुराकर लड़ने की बात की जाती है। यह छिपाने के उलटे परिणाम निकले हैं कि इस्लामी आतंकवादी अपने मजहबी विश्वासों के तहत ही सब कुछ कर रहे है। चाहे आतंकवादी कैंपों की पाठ्य-सामग्री हो या आतंकी संगठनों के दस्तावेज या ओसामा जैसे सरदारों के उकसावे, सब में समान सूत्र जिहादी विश्वास ही है। नहीं तो तालिबान या अलकायदा के वीभत्स से वीभत्स कारनामों पर मुस्लिम देशों में मौन समर्थन क्यों छाया रहता है? यदि आतंकवादी इस्लाम का दुरुपयोग कर रहे है तो बात-बात में फतवे जारी करने वाले उलेमा ने किसी आतंकी संगठन या सरदार के खिलाफ कभी कोई फतवा क्यों जारी नहीं किया? सजा क्यों नहीं सुनाई?
आतंकियों की असली ताकत मजहबी विचारधारा पर उनका आंख मूंदकर विश्वास करना है। वे जैसा सोचते है वैसा कहते भी है। सेकुलरवादियों की तरह सोचने और कहने में दोहरापन नहीं दिखाते। दोहरापन तो उनमें है जो आतंकी घोषणाओं की अनदेखी करते है। जिहादी मानसिकता तब तक समाप्त नहीं होगी जब तक अपने विचारों पर उसका भरोसा अडिग रहेगा। यह विश्वास तभी हिलेगा जब उसके बुनियादी मजहबी अंधविश्वासों को खुलकर चुनौती दी जाएगी। भावनाओं के नाम पर सकुचाने से उलटे विध्वंस का पैमाना बढ़ता जाएगा। मुंबई का हमला इसका उदाहरण है। इस असुविधाजनक सच्चाई का सामना करने से बचकर हम अगले और बड़े हमलों को निमंत्रण दे रहे है। अत: जरूरी है कि आतंकवादियों के वैचारिक सूत्रधारों के बयानों को गंभीरता से लिया जाए। यदि कोई उन्मादी कहता है कि कश्मीर तो जिहाद का दरवाजा भर है, हमारे निशाने पर तो पूरा हिंदुस्तान है, अथवा हम एक और महमूद गजनवी का इंतजार कर रहे है तो ऐसी स्पष्ट घोषणाओं की उपेक्षा कर, इसके प्रेरक विचारों पर चुप्पी रखना आत्मप्रवंचना है। बार-बार एक नकली बात कहकर असली लड़ाई से बचने की कोशिश बुद्धिमानी नहीं है।
यदि सच है कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता तो पिछले आठ वर्ष में दुनिया में हुए लगभग सभी आतंकवादी कारनामों के तार केवल एक देश पाकिस्तान से ही जुड़े क्यों पाए गए? दुनिया भर के आतंकवादी प्रशिक्षण या तैयारी करने वहीं क्यों जाते है, जापान या श्रीलंका क्यों नहीं जाते? यदि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता तो उनमें तरह-तरह के मजहबी विश्वासों को मानने वाले रंगरूट तैयार हो रहे होते। अफगानिस्तान में तालिबान फिर सत्ता पर काबिज होने की तैयारी कर रहे हैं। तालिबान ने ही बिन लादेन को अपना अंतरराष्ट्रीय हेडक्वार्टर बनाने के लिए जमीन दी, जहां से अलकायदा ने दुनिया भर में अनेक आतंकी हमले किए। क्या आमिर खान बताएंगे कि क्यों दुनिया की किसी ईसाई मिशनरी या बौद्ध विद्यालय से एक भी आतंकवादी क्यों नहीं निकला? पाकिस्तान में छह वर्ष पहले मजहबी मामलों के मंत्री महमूद अहमद गाजी ने कहा था कि वहां दस हजार ऐसे मदरसों की पहचान की जा रही है जहां से आतंकवाद के प्रसार का संदेह है। इस एकमात्र तथ्य से स्पष्ट है कि इस्लामी इल्म से आतंकवाद का कितना सीधा संबंध है। तब बार-बार दोहराना कि आतंकवाद को किसी मजहब से नहीं जोड़ना चाहिए, एक आत्मघाती प्रवंचना है। इस्लामी आतंकवादी संगठन, उनके ट्रेनिंग केंद्र और विचारों को उन्हे पनपाने वाली जमीन से काट कर नहीं समझा जा सकता। आज सबसे बड़ी बाधा यह है कि आतंकवाद को वैचारिक, नैतिक, भौतिक समर्थन देने वाले सभी तत्वों से आंख चुराकर लड़ने की बात की जाती है। यह छिपाने के उलटे परिणाम निकले हैं कि इस्लामी आतंकवादी अपने मजहबी विश्वासों के तहत ही सब कुछ कर रहे है। चाहे आतंकवादी कैंपों की पाठ्य-सामग्री हो या आतंकी संगठनों के दस्तावेज या ओसामा जैसे सरदारों के उकसावे, सब में समान सूत्र जिहादी विश्वास ही है। नहीं तो तालिबान या अलकायदा के वीभत्स से वीभत्स कारनामों पर मुस्लिम देशों में मौन समर्थन क्यों छाया रहता है? यदि आतंकवादी इस्लाम का दुरुपयोग कर रहे है तो बात-बात में फतवे जारी करने वाले उलेमा ने किसी आतंकी संगठन या सरदार के खिलाफ कभी कोई फतवा क्यों जारी नहीं किया? सजा क्यों नहीं सुनाई?
आतंकियों की असली ताकत मजहबी विचारधारा पर उनका आंख मूंदकर विश्वास करना है। वे जैसा सोचते है वैसा कहते भी है। सेकुलरवादियों की तरह सोचने और कहने में दोहरापन नहीं दिखाते। दोहरापन तो उनमें है जो आतंकी घोषणाओं की अनदेखी करते है। जिहादी मानसिकता तब तक समाप्त नहीं होगी जब तक अपने विचारों पर उसका भरोसा अडिग रहेगा। यह विश्वास तभी हिलेगा जब उसके बुनियादी मजहबी अंधविश्वासों को खुलकर चुनौती दी जाएगी। भावनाओं के नाम पर सकुचाने से उलटे विध्वंस का पैमाना बढ़ता जाएगा। मुंबई का हमला इसका उदाहरण है। इस असुविधाजनक सच्चाई का सामना करने से बचकर हम अगले और बड़े हमलों को निमंत्रण दे रहे है। अत: जरूरी है कि आतंकवादियों के वैचारिक सूत्रधारों के बयानों को गंभीरता से लिया जाए। यदि कोई उन्मादी कहता है कि कश्मीर तो जिहाद का दरवाजा भर है, हमारे निशाने पर तो पूरा हिंदुस्तान है, अथवा हम एक और महमूद गजनवी का इंतजार कर रहे है तो ऐसी स्पष्ट घोषणाओं की उपेक्षा कर, इसके प्रेरक विचारों पर चुप्पी रखना आत्मप्रवंचना है। बार-बार एक नकली बात कहकर असली लड़ाई से बचने की कोशिश बुद्धिमानी नहीं है।
Saturday, December 13, 2008
The Blunder of The Pandit
Forty years ago, India's first prime minister passed into the ages. On his death anniversary, May 27, Lieutenant General Eric A Vas (retd) commenced rediff.com's series to evaluate Jawaharlal Nehru's legacy with a perspective of the premier's relationship with the military.
Today, Claude Arpi, the well-known Tibet and Kashmir expert, analyses how Nehru's obsession with the politics of his ancestral state eventually bequeathed a festering problem for the whole of India.
India's first prime minister passed away 40 years ago; it should be time to assess his 17 years in office. Unfortunately, historians and researchers have never been allowed access to original materials to write about Nehru's leadership during the troubled years after Independence. It is tragic that the famous 'Nehru Papers' are jealously locked away in the Nehru Memorial Library. They are, in fact, the property of his family!
I find it even more regrettable that during its six years in power, the NDA government, often accused of trying to rewrite history, did not take any action to rectify this anomaly. Possibly they were not interested in recent history!
Apart from Nehru's official correspondence and notes, government reports such as the Henderson-Brookes Report (see earlier article, The Confiscation of History) are still classified more than 40 years after they were written. Some pretend that if published it would be too damaging for India's security. It is just laughable!
As a result, today history lovers and serious researchers have only the 31 volumes published so far of the Selected Works of Jawaharlal Nehru (covering the period 1946 to 1955) to fall back on. This could be considered a partial declassification of the Nehru Papers, except for the fact that the editing has always been undertaken by Nehruvian historians, making at times the selection tainted. The other problem is that these volumes cover only the writings (or sayings) of Nehru; notes or letters of other officials or dignitaries which triggered Nehru's answers are only briefly and unsatisfactorily resumed in footnotes.
With these limitations in mind, it is interesting to try to assess Nehru's role in the Kashmir question. Fifty-seven years after Independence, it has remained an unsolved (if not a 'core') issue for the subcontinent.
Everything started in early 1946 when the Indian National Congress had to elect a new president. It was an accepted fact that the leader chosen as Congress president would become the first prime minister of independent India. Three candidates were in the race: Acharya Kripalani, Jawaharlal Nehru, and Sardar Patel. The working committee of the INC and the pradesh committees had to send their nomination for one of the three candidates.
Sardar Patel was easily the most popular. Everyone knew his efficiency and his toughness for tackling difficult problems. Twelve out of 19 Pradesh committees nominated him. None nominated Nehru.
From the start Gandhi had indicated that he favoured Nehru. His reasoning was that his British education was an asset: 'Jawaharlal cannot be replaced today whilst the charge is being taken from the British. He, a Harrow boy, a Cambridge graduate, and a barrister, is wanted to carry on the negotiations with the Englishmen.'
Another point Gandhi made was that while Sardar Patel would agree to work as Nehru's deputy, the reverse might not happen. He also felt that Nehru was better known abroad and could help India play a role in international affairs.
Eventually, in deference to Gandhi, Kripalani nominated Nehru and withdrew from the race. Patel had no choice but to follow his colleague 'so that Nehru could be elected unopposed.' Dr Rajendra Prasad later stated: 'Gandhi has once again sacrificed his trusted lieutenant for the sake of the glamorous Nehru.'
It is how India got a Kashmiri Pandit as its first prime minister.
I have always found it strange that a man professing to be above caste or religion agreed to be called 'Panditji.' Nonetheless, the fact that a Pandit was the prime minister made Kashmir a state different from the 500 other princely states.
Soon, the conflicting aspects in Nehru's persona came to the fore. On one hand, he was a democrat and revolutionary; on the other, he was often carried away by his 'Socialist' ideals to the point of blundering with India's destiny.
After his election as Congress president, he gave his support to his friend Sheikh Abdullah (he called him his 'blood brother') who had been jailed by Maharaja Hari Singh of Kashmir. In June 1946, he decided to go to the valley to free Abdullah. The situation was certainly not shining in Kashmir (as in the rest of India), but to take on the maharaja at this point in time was a serious mistake.
However, for Nehru, 'Anything that happens in Kashmir has a certain importance for the rest of India, but recent events there have had an even greater importance, [they] became symbols of a larger struggle for emancipation. Thus Kashmir became symbolic of the [princely] States in India.' He wanted to take on 'the autocratic and often feudal rule that prevails there.' He did not realise that the princes' support and collaboration would be indispensable during this all-important transition period for the nation.
Though prohibited to enter the maharaja's state, in July 1946 Nehru decided to defy the ban. Patel and other members of the working committee tried to dissuade him: there were more important matters to tackle in Delhi after the Cabinet Mission had come to discuss the transfer of power.
In a letter to D P Mishra, Patel explained: 'He [Nehru] has done many things recently which have caused us great embarrassment. His actions in Kashmir ... are acts of emotional insanity and it puts tremendous strain on us to set the matters right.' However, Patel, always fair, added: 'but in spite of all these innocent indiscretions he has unparalleled enthusiasm and a burning passion for freedom.' Patel, thus, pointed out the two powerful (and opposing) aspects of Nehru's personality.
A year later, hardly two weeks before Independence, Nehru still wanted to go to Srinagar. He wrote to Gandhi: 'I shall go ahead with my plans. As between visiting Kashmir when my people need me there and being prime minister, I prefer the former.' Once again he had to be dissuaded.
At the stroke of the midnight hour on August 14, India awakened to life and freedom. Unfortunately, Maharaja Hari Singh remembered the events of the previous year and while most princes signed the Instrument of Accession of their state to the Dominion of India, Hari Singh prevaricated. What would happen to him and his state under Nehru's rule? He also knew that the future of his state could not lie with Jinnah and his government.
In September, he decided to offer Kashmir's accession to India. This was refused by Nehru, who first wanted Sheikh Abdullah to be freed and installed as prime minister of the state. This was not acceptable to the maharaja.
Things came to a head at the end of October 1947 when raiders from the North West Frontier Province entered the state, killing, looting, and raping along. On October 26, they had reached the outskirts of Srinagar. Hari Singh agreed to sign the Instrument of Accession.
On the same day a historic meeting was held in Delhi with Mountbatten, the governor general, as chairman. A young army colonel named Sam Manekshaw, who attended the meeting, recalled: 'As usual Nehru talked about the United Nations, Russia, Africa, God Almighty, everybody, until Sardar Patel lost his temper. He said, 'Jawaharlal, do you want Kashmir, or do you want to give it away?' He [Nehru] said, 'Of course, I want Kashmir.' Then he [Patel] said: 'Please give your orders.'
This anecdote perfectly exemplifies Nehru, who could make the greatest speeches, but was unable to take a decision at a crucial moment. Thanks to Patel's decisiveness, troops were flown to Srinagar the next morning and the airport, the only link with India, was saved. Military operations to expel the raiders started.
Nehru's colleagues soon discovered they had made another serious blunder, a collective one. They had chosen Mountbatten to be the first governor general of independent India while Jinnah had kept the post for himself in Pakistan. At that time, it was probably easier for the Congress to have a foreigner as the head of the Dominion; it conveniently avoided having to choose among themselves. However, Mountbatten manipulated matters so well that he became chairman of a newly created defence council. Nehru did not see a problem in this: Mountbatten (and his wife) were his best friends.
But this was to have grave repercussions on Kashmir policy. Mountbatten, a British officer, was now at the helm of the executive defence machinery. British generals still serving in India reported to him. Mountbatten was not working for India's interests, but the British crown's.
Nehru's sentimental attachment to the Mountbattens deeply vitiated the Kashmir issue. It was certainly the most important factor for the failure to find a solution in the first years of the conflict.
Events took a turn for the worse at the end of December 1947 when the governor general managed to convince Nehru that India had to refer the Kashmir issue to the UN instead of conducting a military counterattack in West Punjab. Patel did not agree. But at this precise point in time the Sardar, who had so far looked after the relations with the princely states, was sidetracked. On December 23, he wrote his resignation, but was prevented (by Gandhi) from pressing for it. From that day, with Patel out of Kashmir affairs, things went from bad to worse.
In the first months of 1948, during the UN hearings, the British showed where their interests lay. The original Indian complaint was completely left aside and the Security Council began adopting anti-India resolutions.
Abdullah had already started his crusade (particularly with the US administration) for Kashmir's independence. He remained Nehru's friend till his scheming became too dangerous for India. In August 1953, he was finally dismissed by Karan Singh, the sadar-i-riyasat. Two months earlier, Shyama Prasad Mookerjee, who had been arrested by Abdullah and left without medical care in Srinagar, died in mysterious circumstances. Nehru had visited the capital of Kashmir a few days earlier, but did not find the time to call on his former Cabinet colleague. He later wrote to Mookerjee's mother: 'Indeed, I hoped that the healthy climate of Kashmir might lead to an improvement in Shyama Babu's health.'
Though in the following years Nehru hardened his position when different UN commissions (Dixon, Graham, Jarring) visited Delhi, it was too late. Pakistan was certainly not interested in vacating the so-called 'Azad Kashmir', rendering the plans for a plebiscite mentioned in the UN resolutions of August 1948 and January 1949 irrelevant.
A few days before his death Nehru sent a freshly released Abdullah to meet Ayub Khan with a proposal to have a confederation of India, Pakistan and Kashmir. The proposal was contemptuously rejected as 'absurd' by the Pakistani military ruler. It was Nehru's last attempt to solve the issue and it failed.
In retrospect, despite Nehru's love for great principles, his incapacity to take decisions in time, his inability to work with colleagues like Patel, and his friendship with individuals such as the Mounbattens or Abdullah, who had their own interests, blinded him so much that he did not further India's national interests. The consequences have been tragic and the muddle created 57 years ago remains far from being sorted out.
Today, Claude Arpi, the well-known Tibet and Kashmir expert, analyses how Nehru's obsession with the politics of his ancestral state eventually bequeathed a festering problem for the whole of India.
India's first prime minister passed away 40 years ago; it should be time to assess his 17 years in office. Unfortunately, historians and researchers have never been allowed access to original materials to write about Nehru's leadership during the troubled years after Independence. It is tragic that the famous 'Nehru Papers' are jealously locked away in the Nehru Memorial Library. They are, in fact, the property of his family!
I find it even more regrettable that during its six years in power, the NDA government, often accused of trying to rewrite history, did not take any action to rectify this anomaly. Possibly they were not interested in recent history!
Apart from Nehru's official correspondence and notes, government reports such as the Henderson-Brookes Report (see earlier article, The Confiscation of History) are still classified more than 40 years after they were written. Some pretend that if published it would be too damaging for India's security. It is just laughable!
As a result, today history lovers and serious researchers have only the 31 volumes published so far of the Selected Works of Jawaharlal Nehru (covering the period 1946 to 1955) to fall back on. This could be considered a partial declassification of the Nehru Papers, except for the fact that the editing has always been undertaken by Nehruvian historians, making at times the selection tainted. The other problem is that these volumes cover only the writings (or sayings) of Nehru; notes or letters of other officials or dignitaries which triggered Nehru's answers are only briefly and unsatisfactorily resumed in footnotes.
With these limitations in mind, it is interesting to try to assess Nehru's role in the Kashmir question. Fifty-seven years after Independence, it has remained an unsolved (if not a 'core') issue for the subcontinent.
Everything started in early 1946 when the Indian National Congress had to elect a new president. It was an accepted fact that the leader chosen as Congress president would become the first prime minister of independent India. Three candidates were in the race: Acharya Kripalani, Jawaharlal Nehru, and Sardar Patel. The working committee of the INC and the pradesh committees had to send their nomination for one of the three candidates.
Sardar Patel was easily the most popular. Everyone knew his efficiency and his toughness for tackling difficult problems. Twelve out of 19 Pradesh committees nominated him. None nominated Nehru.
From the start Gandhi had indicated that he favoured Nehru. His reasoning was that his British education was an asset: 'Jawaharlal cannot be replaced today whilst the charge is being taken from the British. He, a Harrow boy, a Cambridge graduate, and a barrister, is wanted to carry on the negotiations with the Englishmen.'
Another point Gandhi made was that while Sardar Patel would agree to work as Nehru's deputy, the reverse might not happen. He also felt that Nehru was better known abroad and could help India play a role in international affairs.
Eventually, in deference to Gandhi, Kripalani nominated Nehru and withdrew from the race. Patel had no choice but to follow his colleague 'so that Nehru could be elected unopposed.' Dr Rajendra Prasad later stated: 'Gandhi has once again sacrificed his trusted lieutenant for the sake of the glamorous Nehru.'
It is how India got a Kashmiri Pandit as its first prime minister.
I have always found it strange that a man professing to be above caste or religion agreed to be called 'Panditji.' Nonetheless, the fact that a Pandit was the prime minister made Kashmir a state different from the 500 other princely states.
Soon, the conflicting aspects in Nehru's persona came to the fore. On one hand, he was a democrat and revolutionary; on the other, he was often carried away by his 'Socialist' ideals to the point of blundering with India's destiny.
After his election as Congress president, he gave his support to his friend Sheikh Abdullah (he called him his 'blood brother') who had been jailed by Maharaja Hari Singh of Kashmir. In June 1946, he decided to go to the valley to free Abdullah. The situation was certainly not shining in Kashmir (as in the rest of India), but to take on the maharaja at this point in time was a serious mistake.
However, for Nehru, 'Anything that happens in Kashmir has a certain importance for the rest of India, but recent events there have had an even greater importance, [they] became symbols of a larger struggle for emancipation. Thus Kashmir became symbolic of the [princely] States in India.' He wanted to take on 'the autocratic and often feudal rule that prevails there.' He did not realise that the princes' support and collaboration would be indispensable during this all-important transition period for the nation.
Though prohibited to enter the maharaja's state, in July 1946 Nehru decided to defy the ban. Patel and other members of the working committee tried to dissuade him: there were more important matters to tackle in Delhi after the Cabinet Mission had come to discuss the transfer of power.
In a letter to D P Mishra, Patel explained: 'He [Nehru] has done many things recently which have caused us great embarrassment. His actions in Kashmir ... are acts of emotional insanity and it puts tremendous strain on us to set the matters right.' However, Patel, always fair, added: 'but in spite of all these innocent indiscretions he has unparalleled enthusiasm and a burning passion for freedom.' Patel, thus, pointed out the two powerful (and opposing) aspects of Nehru's personality.
A year later, hardly two weeks before Independence, Nehru still wanted to go to Srinagar. He wrote to Gandhi: 'I shall go ahead with my plans. As between visiting Kashmir when my people need me there and being prime minister, I prefer the former.' Once again he had to be dissuaded.
At the stroke of the midnight hour on August 14, India awakened to life and freedom. Unfortunately, Maharaja Hari Singh remembered the events of the previous year and while most princes signed the Instrument of Accession of their state to the Dominion of India, Hari Singh prevaricated. What would happen to him and his state under Nehru's rule? He also knew that the future of his state could not lie with Jinnah and his government.
In September, he decided to offer Kashmir's accession to India. This was refused by Nehru, who first wanted Sheikh Abdullah to be freed and installed as prime minister of the state. This was not acceptable to the maharaja.
Things came to a head at the end of October 1947 when raiders from the North West Frontier Province entered the state, killing, looting, and raping along. On October 26, they had reached the outskirts of Srinagar. Hari Singh agreed to sign the Instrument of Accession.
On the same day a historic meeting was held in Delhi with Mountbatten, the governor general, as chairman. A young army colonel named Sam Manekshaw, who attended the meeting, recalled: 'As usual Nehru talked about the United Nations, Russia, Africa, God Almighty, everybody, until Sardar Patel lost his temper. He said, 'Jawaharlal, do you want Kashmir, or do you want to give it away?' He [Nehru] said, 'Of course, I want Kashmir.' Then he [Patel] said: 'Please give your orders.'
This anecdote perfectly exemplifies Nehru, who could make the greatest speeches, but was unable to take a decision at a crucial moment. Thanks to Patel's decisiveness, troops were flown to Srinagar the next morning and the airport, the only link with India, was saved. Military operations to expel the raiders started.
Nehru's colleagues soon discovered they had made another serious blunder, a collective one. They had chosen Mountbatten to be the first governor general of independent India while Jinnah had kept the post for himself in Pakistan. At that time, it was probably easier for the Congress to have a foreigner as the head of the Dominion; it conveniently avoided having to choose among themselves. However, Mountbatten manipulated matters so well that he became chairman of a newly created defence council. Nehru did not see a problem in this: Mountbatten (and his wife) were his best friends.
But this was to have grave repercussions on Kashmir policy. Mountbatten, a British officer, was now at the helm of the executive defence machinery. British generals still serving in India reported to him. Mountbatten was not working for India's interests, but the British crown's.
Nehru's sentimental attachment to the Mountbattens deeply vitiated the Kashmir issue. It was certainly the most important factor for the failure to find a solution in the first years of the conflict.
Events took a turn for the worse at the end of December 1947 when the governor general managed to convince Nehru that India had to refer the Kashmir issue to the UN instead of conducting a military counterattack in West Punjab. Patel did not agree. But at this precise point in time the Sardar, who had so far looked after the relations with the princely states, was sidetracked. On December 23, he wrote his resignation, but was prevented (by Gandhi) from pressing for it. From that day, with Patel out of Kashmir affairs, things went from bad to worse.
In the first months of 1948, during the UN hearings, the British showed where their interests lay. The original Indian complaint was completely left aside and the Security Council began adopting anti-India resolutions.
Abdullah had already started his crusade (particularly with the US administration) for Kashmir's independence. He remained Nehru's friend till his scheming became too dangerous for India. In August 1953, he was finally dismissed by Karan Singh, the sadar-i-riyasat. Two months earlier, Shyama Prasad Mookerjee, who had been arrested by Abdullah and left without medical care in Srinagar, died in mysterious circumstances. Nehru had visited the capital of Kashmir a few days earlier, but did not find the time to call on his former Cabinet colleague. He later wrote to Mookerjee's mother: 'Indeed, I hoped that the healthy climate of Kashmir might lead to an improvement in Shyama Babu's health.'
Though in the following years Nehru hardened his position when different UN commissions (Dixon, Graham, Jarring) visited Delhi, it was too late. Pakistan was certainly not interested in vacating the so-called 'Azad Kashmir', rendering the plans for a plebiscite mentioned in the UN resolutions of August 1948 and January 1949 irrelevant.
A few days before his death Nehru sent a freshly released Abdullah to meet Ayub Khan with a proposal to have a confederation of India, Pakistan and Kashmir. The proposal was contemptuously rejected as 'absurd' by the Pakistani military ruler. It was Nehru's last attempt to solve the issue and it failed.
In retrospect, despite Nehru's love for great principles, his incapacity to take decisions in time, his inability to work with colleagues like Patel, and his friendship with individuals such as the Mounbattens or Abdullah, who had their own interests, blinded him so much that he did not further India's national interests. The consequences have been tragic and the muddle created 57 years ago remains far from being sorted out.
Remebering a War (1962 India-China Conflict)
The confiscation of History
Claude Arpi
If someone asked me what is the greatest scam since Independence, I would have some difficulty answering. I might initially consider the 'Jeep case' involving Krishna Menon, or the smoking guns of Bofors.
But in the end, the one that I find the most stupid, and perhaps the most harmful to India's interests in the long run, is the confiscation of history by government babus under the Public Records Act.
These rules vaguely state that "unclassified public records more than 30 years old should be made available to any bona fide research scholar, but subject to such exceptions and restrictions as may be prescribed".
Because of the last part of the sentence, the people of India are today not able to know about their recent history. One of the main casualties is the 1962 war with China. As a sad result of this policy, the Chinese version of history is often prevalent, even in India.
A few weeks after the debacle of October-November 1962, Lieutenant General J N Chaudhuri constituted a committee to study the causes of the 'Himalayan blunder'. An Anglo-Indian general called Henderson Brooks was requested to go through the official records and prepare a report on the war. Sometime in 1963, the general presented his study to Nehru and a couple of his ministers. The report was immediately classified 'Top Secret'.
One can understand that at that time the prime minister did not want the report made to be public, as he may have had to take responsibility for the unpreparedness of the army and, most probably, resign.
The tragedy is not that the report was 'classified' in 1963, but that it continues to remain classified today. Forty years later, nobody has still seen the report. That is, except for one person: a British foreign correspondent named Neville Maxwell. The rumour is that a senior minister passed on the report to him.
Nine years after the war, when Henry Kissinger made a secret trip to Beijing to prepare President Nixon's visit to China in February 1972, he stayed five days in China and had a series of 10 crucial meetings with Zhou Enlai, the Chinese premier.
The transcripts of these talks, which were recently 'declassified' by the US administration, are mind-opening, particularly in the above context. Here are some of Kissinger's remarks to Zhou Enlai: "I read the book by Maxwell that the prime minister recommended to me last time, and it is our view, certainly at the White House, that the Indians are applying the same tactics to that situation as they did to you."
Kissinger refers to Maxwell's book India's China War, which shows India as an aggressive nation that bullied China during the 1962 war. Later in the discussion, the Chinese premier comes back to Maxwell's book: "We [the Chinese] understand best the traditions of India. After having read the book of Maxwell you also believe it [that bullying others] is the traditional policy of India."
It is amazing that Maxwell, thanks to the Government of India's propensity for secrecy, is the only person who has managed to see the Henderson Brooks report. Maxwell stated himself in the Economic & Political Weekly in 2001: "The report includes no surprises and its publication would be of little significance, but for the fact that so many in India still cling to the soothing fantasy of a 1962 Chinese 'aggression'."
Yes, the theory put forward by the Chinese and Maxwell is that the war was only due to Nehru's aggressive policy and China had no other choice but to launch a 'pre-emptive attack' on October 20 on the slopes of Tagla ridge.
Not only did India lose the Aksai Chin and other territories in Kashmir in the 1950s, but India became the bully, the 'expansionist' nation.
One can only be sad that 40 years after the event, the Government of India is still adding water to the Chinese half-baked history mill by continuing to hide what is most probably a quite insignificant report.
The burial of the Henderson Brooks report, however, raises several other questions. When one reads Indian newspapers, one gets the impression that the people of India (or at least the journalists of India) are greatly interested in history. For the past few years, not a day has passed without one comment or another on the history textbooks that have been revised by the NCERT; or the HRD minister who is supposedly spending his time 'rewriting' Indian history, or adding colour to historical facts.
But tell me, what is wrong in 'rewriting' history books when it is necessary? The great son of India, Gautama Buddha, once told his disciples: 'As the wise test gold by burning, cutting and rubbing it on a piece of touchstone, so are you to accept my words only after examining them and not merely out of regard for me."
As long as there is new information, new inputs or documents, history needs to be researched and researched again, in the Buddha's fashion. Is it not in the interest of a nation to know her past?
The great misfortune in the case of the 1962 war is that there is no will from the government's side to give the means to those inclined to do this research to obtain a truer picture of the past.
Personally, I faced a similar problem when I tried to research my two pet subjects: Tibet and Kashmir. Going through the painful exercise of trying to access some documents at the time of the Chinese invasion of Tibet (1950) was a nightmare.
At the National Archives of India, I was told that all documents for the NEFA area (which included Tibet and Bhutan) were 'classified' after 1913 and nobody could access them. For 'Gilgit area' [read Kashmir], the date is 1923. This colonial terminology gives an indication of the backwardness of the historical studies in India. Have not the British left India 55 years ago?
What about the famous 'Nehru's Papers'? They are kept in the Nehru Library by a private trust, chaired by the leader of the opposition, and you have to obtain her consent to see them. In any case, you cannot see them, as they are 'restricted'.
Only 'official' historians are able to study them. The very helpful staff can only tell you: "Sorry, sir, this is the rule." India must be the only nation where the prime minister's official papers belong to his family and not the state!
In my case it was even more stupid because most of the political files regarding Tibet from 1914 till as late as 1952-53 were freely available for researchers in the India Office Library and Records in London. The moral of the story: go to London to study Indian history.
Different reasons are given as to why historical documents should not be 'declassified'. The most current and irrelevant argument is that these old documents are of a 'sensitive' nature and their circulation may jeopardize India's security.
I believe that some years ago, a 'group of secretaries', the most dreaded order of the babu species, stopped the publication of the report of the 1965 war because: "it gave information about certain aspects of command and control." Luckily, a Good Samaritan managed to get hold of a copy and post it on an Internet site.
But something is even more incongruous. While the Government of India is holding the Henderson Brooks report close to its chest, a very historic international conference was held in Cuba recently.
Many will remember that the week the Chinese troops entered in the Northeast and in Ladakh, humanity was coming very close to its first nuclear war. This was the Cold War's climax: the confrontation between the United States and the Soviet Union in Cuba over the installation of ballistic missiles targeting American cities threatened to degenerate into World War III.
To commemorate the stupendous events of the Bay of Pigs, the Cuban government, with the National Security Archive of George Washington University, organized a conference titled "The October Crisis: Political Perspectives 40 Years Later".
Some of the veterans who participated in those historic days were invited to discuss the conflict between Khrushchev and Kennedy.
During the last session of the conference, the participants, including Cuban president Fidel Castro and former US secretary of defence Robert McNamara discussed some newly declassified documents.
The documents show that the Soviet nuclear-armed tactical weapons in Cuba stayed there after the missiles were withdrawn, and may even have been intended for Cuban custody.
"Documents released today included verbatim Soviet records of the contentious meetings between top Soviet leader Anastas Mikoyan and top Cuban leaders, including Fidel Castro and Che Guevara, during Mikoyan's trip to Cuba in early November; Soviet orders first preparing the tactical weapons for training the Cubans and then, on November 20, ordering their withdrawal; and a prophetic summary of the crisis written by the British ambassador to Cuba, who predicted that the crisis could ultimately rebound to the benefit of the Castro regime and the long-term survival of Communism in Cuba," said a press release.
Some may think that Cuba is a totalitarian banana republic, but Fidel Castro did organise the conference and participate in it.
We cannot dream of such a debate in India today. Why? I have no answer.
We have in Delhi many universities, policy centres, think-tanks, a host of retired 'thinking' generals (as if the serving generals are not able to think). Why can't any of them take up the challenge and open a debate on what really happened in 1962? Many fields of research have remained untouched. To give a few examples:
When was Aksai Chin really occupied? Why did the government react so late?
The relation between the 1959 uprising in Lhasa and the 1962 war (one very symptomatic fact is that the Chinese followed the same route as the Dalai Lama took when he escaped to India in 1959) as well as the Panchen Lama's petition against the party in 1962;
The importance of the split between Moscow and Beijing, which came into the open in October 1962; and Moscow's sudden change of stance vis-à-vis India in the midst of the conflict;
The relation between the Cuban crisis and the 1962 Indo-China war;
When did China prepare the 1962 operations and what were her real motivations;
The internal political factors in China and Mao Zedong's own motivations (he was facing strong opposition from within the Communist Party after his disastrous Great Leap Forward and was sidelined);
The reasons for the sudden unilateral withdrawal by the Chinese;
The role of the Indian Communists during the war;
The non-intervention of President Ayub Khan.
The recently 'declassified' documents available in the Russian, Cuban, and East European archives, as well as the already available materials collected by organizations such as the National Security Archives or the Cold War International History Project of the Woodrow Wilson International Centre for Scholars in Washington, DC, could certainly be of great help.
But is India interested? This seems to be the main problem. If the media and the public had made the same amount of noise for the Henderson Brooks report and other archival materials to be released as they have done for the so-called 'rewritten' textbooks, we would have had a truer picture of 1962 war history today. No harm in hoping!
(Claude Arpi, author of The Fate Of Tibet (HarAnand), which has also been translated into French, writes regularly for rediff.com)
Claude Arpi
If someone asked me what is the greatest scam since Independence, I would have some difficulty answering. I might initially consider the 'Jeep case' involving Krishna Menon, or the smoking guns of Bofors.
But in the end, the one that I find the most stupid, and perhaps the most harmful to India's interests in the long run, is the confiscation of history by government babus under the Public Records Act.
These rules vaguely state that "unclassified public records more than 30 years old should be made available to any bona fide research scholar, but subject to such exceptions and restrictions as may be prescribed".
Because of the last part of the sentence, the people of India are today not able to know about their recent history. One of the main casualties is the 1962 war with China. As a sad result of this policy, the Chinese version of history is often prevalent, even in India.
A few weeks after the debacle of October-November 1962, Lieutenant General J N Chaudhuri constituted a committee to study the causes of the 'Himalayan blunder'. An Anglo-Indian general called Henderson Brooks was requested to go through the official records and prepare a report on the war. Sometime in 1963, the general presented his study to Nehru and a couple of his ministers. The report was immediately classified 'Top Secret'.
One can understand that at that time the prime minister did not want the report made to be public, as he may have had to take responsibility for the unpreparedness of the army and, most probably, resign.
The tragedy is not that the report was 'classified' in 1963, but that it continues to remain classified today. Forty years later, nobody has still seen the report. That is, except for one person: a British foreign correspondent named Neville Maxwell. The rumour is that a senior minister passed on the report to him.
Nine years after the war, when Henry Kissinger made a secret trip to Beijing to prepare President Nixon's visit to China in February 1972, he stayed five days in China and had a series of 10 crucial meetings with Zhou Enlai, the Chinese premier.
The transcripts of these talks, which were recently 'declassified' by the US administration, are mind-opening, particularly in the above context. Here are some of Kissinger's remarks to Zhou Enlai: "I read the book by Maxwell that the prime minister recommended to me last time, and it is our view, certainly at the White House, that the Indians are applying the same tactics to that situation as they did to you."
Kissinger refers to Maxwell's book India's China War, which shows India as an aggressive nation that bullied China during the 1962 war. Later in the discussion, the Chinese premier comes back to Maxwell's book: "We [the Chinese] understand best the traditions of India. After having read the book of Maxwell you also believe it [that bullying others] is the traditional policy of India."
It is amazing that Maxwell, thanks to the Government of India's propensity for secrecy, is the only person who has managed to see the Henderson Brooks report. Maxwell stated himself in the Economic & Political Weekly in 2001: "The report includes no surprises and its publication would be of little significance, but for the fact that so many in India still cling to the soothing fantasy of a 1962 Chinese 'aggression'."
Yes, the theory put forward by the Chinese and Maxwell is that the war was only due to Nehru's aggressive policy and China had no other choice but to launch a 'pre-emptive attack' on October 20 on the slopes of Tagla ridge.
Not only did India lose the Aksai Chin and other territories in Kashmir in the 1950s, but India became the bully, the 'expansionist' nation.
One can only be sad that 40 years after the event, the Government of India is still adding water to the Chinese half-baked history mill by continuing to hide what is most probably a quite insignificant report.
The burial of the Henderson Brooks report, however, raises several other questions. When one reads Indian newspapers, one gets the impression that the people of India (or at least the journalists of India) are greatly interested in history. For the past few years, not a day has passed without one comment or another on the history textbooks that have been revised by the NCERT; or the HRD minister who is supposedly spending his time 'rewriting' Indian history, or adding colour to historical facts.
But tell me, what is wrong in 'rewriting' history books when it is necessary? The great son of India, Gautama Buddha, once told his disciples: 'As the wise test gold by burning, cutting and rubbing it on a piece of touchstone, so are you to accept my words only after examining them and not merely out of regard for me."
As long as there is new information, new inputs or documents, history needs to be researched and researched again, in the Buddha's fashion. Is it not in the interest of a nation to know her past?
The great misfortune in the case of the 1962 war is that there is no will from the government's side to give the means to those inclined to do this research to obtain a truer picture of the past.
Personally, I faced a similar problem when I tried to research my two pet subjects: Tibet and Kashmir. Going through the painful exercise of trying to access some documents at the time of the Chinese invasion of Tibet (1950) was a nightmare.
At the National Archives of India, I was told that all documents for the NEFA area (which included Tibet and Bhutan) were 'classified' after 1913 and nobody could access them. For 'Gilgit area' [read Kashmir], the date is 1923. This colonial terminology gives an indication of the backwardness of the historical studies in India. Have not the British left India 55 years ago?
What about the famous 'Nehru's Papers'? They are kept in the Nehru Library by a private trust, chaired by the leader of the opposition, and you have to obtain her consent to see them. In any case, you cannot see them, as they are 'restricted'.
Only 'official' historians are able to study them. The very helpful staff can only tell you: "Sorry, sir, this is the rule." India must be the only nation where the prime minister's official papers belong to his family and not the state!
In my case it was even more stupid because most of the political files regarding Tibet from 1914 till as late as 1952-53 were freely available for researchers in the India Office Library and Records in London. The moral of the story: go to London to study Indian history.
Different reasons are given as to why historical documents should not be 'declassified'. The most current and irrelevant argument is that these old documents are of a 'sensitive' nature and their circulation may jeopardize India's security.
I believe that some years ago, a 'group of secretaries', the most dreaded order of the babu species, stopped the publication of the report of the 1965 war because: "it gave information about certain aspects of command and control." Luckily, a Good Samaritan managed to get hold of a copy and post it on an Internet site.
But something is even more incongruous. While the Government of India is holding the Henderson Brooks report close to its chest, a very historic international conference was held in Cuba recently.
Many will remember that the week the Chinese troops entered in the Northeast and in Ladakh, humanity was coming very close to its first nuclear war. This was the Cold War's climax: the confrontation between the United States and the Soviet Union in Cuba over the installation of ballistic missiles targeting American cities threatened to degenerate into World War III.
To commemorate the stupendous events of the Bay of Pigs, the Cuban government, with the National Security Archive of George Washington University, organized a conference titled "The October Crisis: Political Perspectives 40 Years Later".
Some of the veterans who participated in those historic days were invited to discuss the conflict between Khrushchev and Kennedy.
During the last session of the conference, the participants, including Cuban president Fidel Castro and former US secretary of defence Robert McNamara discussed some newly declassified documents.
The documents show that the Soviet nuclear-armed tactical weapons in Cuba stayed there after the missiles were withdrawn, and may even have been intended for Cuban custody.
"Documents released today included verbatim Soviet records of the contentious meetings between top Soviet leader Anastas Mikoyan and top Cuban leaders, including Fidel Castro and Che Guevara, during Mikoyan's trip to Cuba in early November; Soviet orders first preparing the tactical weapons for training the Cubans and then, on November 20, ordering their withdrawal; and a prophetic summary of the crisis written by the British ambassador to Cuba, who predicted that the crisis could ultimately rebound to the benefit of the Castro regime and the long-term survival of Communism in Cuba," said a press release.
Some may think that Cuba is a totalitarian banana republic, but Fidel Castro did organise the conference and participate in it.
We cannot dream of such a debate in India today. Why? I have no answer.
We have in Delhi many universities, policy centres, think-tanks, a host of retired 'thinking' generals (as if the serving generals are not able to think). Why can't any of them take up the challenge and open a debate on what really happened in 1962? Many fields of research have remained untouched. To give a few examples:
When was Aksai Chin really occupied? Why did the government react so late?
The relation between the 1959 uprising in Lhasa and the 1962 war (one very symptomatic fact is that the Chinese followed the same route as the Dalai Lama took when he escaped to India in 1959) as well as the Panchen Lama's petition against the party in 1962;
The importance of the split between Moscow and Beijing, which came into the open in October 1962; and Moscow's sudden change of stance vis-à-vis India in the midst of the conflict;
The relation between the Cuban crisis and the 1962 Indo-China war;
When did China prepare the 1962 operations and what were her real motivations;
The internal political factors in China and Mao Zedong's own motivations (he was facing strong opposition from within the Communist Party after his disastrous Great Leap Forward and was sidelined);
The reasons for the sudden unilateral withdrawal by the Chinese;
The role of the Indian Communists during the war;
The non-intervention of President Ayub Khan.
The recently 'declassified' documents available in the Russian, Cuban, and East European archives, as well as the already available materials collected by organizations such as the National Security Archives or the Cold War International History Project of the Woodrow Wilson International Centre for Scholars in Washington, DC, could certainly be of great help.
But is India interested? This seems to be the main problem. If the media and the public had made the same amount of noise for the Henderson Brooks report and other archival materials to be released as they have done for the so-called 'rewritten' textbooks, we would have had a truer picture of 1962 war history today. No harm in hoping!
(Claude Arpi, author of The Fate Of Tibet (HarAnand), which has also been translated into French, writes regularly for rediff.com)
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