Wednesday, December 31, 2008

कश्मीर में किस भारत का चेहरा दिखा?

लोकतंत्र की विडंबना देखिए कि जिस प्रान्त से पांच लाख हिन्दुओं को प्रताड़ित कर निकाल दिया गया और 1947 में मुजफ्फराबाद से बेघर हुए शरणार्थियों को अभी तक मतदान का अधिकार नहीं दिया गया, वहां सिर्फ इसलिए लोकतंत्र की जीत के नारे बुलंद हो रहे हैं क्योंकि भारत से अलग होने की मांग करने वाले गिलानी और उनकी हुर्रियत की अपील पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। असली सवाल तो यह उठता है कि इन चुनावों में जो जीते वे किन मुद्दों पर सफल हुए और उनका भारत की एकता पर क्या दूरगामी परिणाम होगा। क्या नैशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की जीत से कश्मीर घाटी को शेष देश से समरस बनाने की इच्छा रखने वाले भारतीयों का बढ़ेगा क्योंकि उमर और महबूबा ही पिछली सरकार को गिराने के लिए जिम्मेदार रहे थे जिनकी तात्कालिक राजनीति का एक ही नारा था - ‘ अमरनाथ के हिन्दू यात्रियों हेतु श्राइनबोर्ड को एक इंच जमीन नहीं देंगे ' ।

जम्मू के अभूतपूर्व सत्याग्रह ने उनकी जिद पलटवा दी और वहां से बीजेपी के ग्यारह विधायकों की जीत ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में केसरिया पक्ष को पुन महत्वपूर्ण सिद्ध कर दिया। वास्तव में दिल्ली में शीला दीक्षित की तीसरी बार विजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है जम्मू में बीजेपी का गत चुनावों की तुलना में ग्यारह गुना ज्यादा बलशाली होकर लौटना। हांलाकि जम्मू में इस महत्वपूण जीत को सेकुलर मीडिया हल्का करके बता रहा है और कुछ ने तो इसे चिन्ताजनक भी कहा है। परन्तु रोचक तथ्य यह है कि जो मीडिया विश्लेषक बीजेपी की जीत बहुत चिन्ताजनक बता रहे हैं वे जम्मू क्षेत्र में पहली बार मुफ्ती की अलगाववाद समर्थक पार्टी पीडीपी के दो विधायक चुने जाने पर खामोश हैं। उल्लेखनीय है कि अमरनाथ सत्याग्रह के समय महबूबा मुफ्ती और उमर अबदुल्ला एक दूसरे के खिलाफ होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति एक जैसा रुख अपनाए हुए थे। उमर ने लोकसभा में एक ‘ मुसलमान ’ के नाते भाषण देकर सनसनी फैला दी थी और महबूबा मुफ्ती अलगाववादियों का साथ देने वाली ‘ आग्नेय राजनेता ’ के नाते पहचान बना रही थीं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि इन चुनावों में अलगाववादी पूरी तरह हारे हैं। वास्तव में अलगाववादी दलों के थके हुए नेताओं से समर्थकों को मायूसी मिल रही थी और अब उनकी जगह महबूबा और मुफ्ती सईद जैसे नेताओं ने ले ली है जो बेहतर एवं प्रभावी ढंग से अलगाववादियों को बचा सकते हैं।

सत्ता राजनीति के समीकरणों में हिस्सेदारी से उनका दिल्ली की सरकार पर भी प्रभाव ज्यादा रहता है। जहां तक कश्मीर में आतंकवाद के अंत का प्रश्न है, उसमें इन राजनेताओं की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वे आतंकवाद के परिणामों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए आतुर रहते हैं। वर्ना दहशतगर्दी के खिलाफ कश्मीर के राजनीतिक दल क्यों चुप रहते? सिवाय बीजेपी के, किसी भी राजनीतिक दल ने अपने चुनाव प्रचार या घोषणा पत्र में आतंकवाद खत्म करने का जिक्र तक नहीं किया। विडम्बना यह है कि हर क्षेत्र में जम्मू से घनघोर भेदभाव बनाए रखने वालीं पार्टियों को ही जम्मू क्षेत्र में भी बहुमत मिला है। यहां की 37 सीटों पर सिर्फ 11 ही उस बीजेपी की झोली में आयी हैं जो भेदभाव के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतरी थी। जिसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु (जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा श्री लालकृष्ण आडवाणी ने हत्या कहा था) के पीछे भी जम्मू कश्मीर के शेष भारत के साथ समानता के आधार पर विलय की मांग थी। डॉ. मुखर्जी का बलिदान इस कारण हुआ कि जम्मू कश्मीर में तिरंगे की शान बनी रहे और वहां भिन्न विधान, प्रधान व झंडे की जगह सिर्फ तिरंगा फहरे, दो अलग अलग कानून न रहे तथा जम्मू के साथ कश्मीर के घाटी के बहुसंख्यक मुस्लिम भेदभाव न करें। पर शेख अब्दुल्ला ने उन्हें जम्मू में प्रवेश करते ही गिरफ्तार करवा कर श्रीनगर के निशांतबाग के पास एक बगलानुमा मकान में नजरबंदी करवा दिया। उनके पोते उमर अब्दुल्ला उन लोगों के साथ पांच साल सत्ता में रहे जो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं।

वक्त जब बदलता है तो राजनीति का चेहरा भी नया बनता है। आज उमर अब्दुल्ला की अनेक कारणों से मीडिया में प्रशंसा की जा रही है। वे युवा है, तेजतर्रार राजनीति के नए चेहरे हैं, कश्मीरी मुश्लिम हैं और भारतीय एकता के बारे में असंदिग्ध विचार रखते आ रहे हैं। उनका व्यक्तित्व करिश्माई है और हालांकि अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर संसद में अपने भाषण के तीखे मुस्लिम तेवरों के कारण उनकी विवादास्पद चर्चा हुई, फिर भी उन्हें महबूबा की तरह अलगाववादी नहीं कहा जा सकता। उमर टीवी चैनलों पर तर्कपूर्ण जोरदार ढंग से अपनी बात रखते हैं और कांग्रेस की नई उभरती पीढ़ी के साथ हम कदम नए जोश और नए ताजगी भरे भविष्य का संकेत देते हैं। जिस पीढ़ी में सचिन पायलट (उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सचिन पायलट का विवाह उमर की सगी बहन सारा से हुआ है और इस विवाह का उमर तथा उनके पिता फारूख ने विरोध व बहिष्कार किया था), ज्योतिरादित्य सिंधिया , मिलिंद देवड़ा और निस्संदेह इन सबके नेता राहुल गांधी आकृष्ट करते हैं। इनके तेवर और परिपक्वता का आने वाले वक्त में पता चलेगा, क्योंकि सत्ता से बाहर का मामला अलग होता है और सत्ता संभालने के बाद मुद्दे संभालना एकदम अलग।

दुख की बात यह है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव विश्लेषण में कहीं भी लद्दाख के चुनावों का जिक्र नहीं हुआ-जिसका क्षेत्रफल घाटी और जम्मू से भी बड़ा है। यहां से चार विधायक चुने गए और आश्चर्यजनक रूप से लद्दाख के लिए केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा मांगने वाले मोर्चे के नेता थुप्तान छेवांग कांग्रेसी उम्मीदवार नवांग रिग्जिन से मात्र डेढ़ हजार मतों से हार गए। आरोप है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए मस्जिदों से फतवे जारी करवाये गए। इससे यहां बौद्व मुस्लिम दूरियां बढ़ने की आशंका होगी।

क्या उमर का श्रीनगर में सत्ता संभालना घाटी में भारत की प्रभुता और वर्चस्व के साथ-साथ शांति और हिन्दुओं की वापसी सुनिश्चित करेगा? या वे भी वक्त बिताने और सम्पदा कमाने का वही काम करेंगे जो उनसे पहले के मुख्यमंत्री करते आए? क्या उमर अब्दुल्ला को कश्मीर की भारत से पृथकता बनाए रखने में अपनी भारतीयता सार्थक होती दिखती है? क्या वे 22 फरवरी 1994 के दिन भारत की संसद के द्वारा पारित उस प्रस्ताव को अपने कमरे में लगाना उचित मानेंगे जिस प्रस्ताव में पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर को वापस लेने का संकल्प किया गया है? क्या उमर सिर्फ मुस्लिम पृथकतावादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जैसे - उन्होंने अमरनाथ यात्रा के समय हिन्दुओं को एक इंच जमीन न देने के ऐलान के साथ किया था - कश्मीर में हिन्दु विहीन जम्हूरियत का जश्न मनाएंगे या जम्हूरियत के मायने सबको साथ लेकर देशभक्ति का पाठ सिखाना भी मानेंगे ? यदि उमर उब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने तो उनकी गाड़ी, बंगले और विधानसभा पर दो झंडे फहराए जाएंगे - एक भारत का तिरंगा और दूसरा कश्मीर का हल के निशान वाला लाल झंडा। यदि भारत के दूसरे किसी भी राज्य को अपने पृथक झंडे की आवश्यकता नहीं है तो कश्मीर को क्यों है, यह बात कोई भारतीय कश्मीरी नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा?

ऐसी परिस्थिति में यह समय जम्मू कश्मीर में पुनः उनकी कठिन परीक्षा का है जो डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में हर साल दो बार आयोजन करते हैं और जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के पक्षधर हैं। बीजेपी को 11 स्थान मिले, पर ज्यादा भी मिल सकते थे - अमरनाथ संघर्ष का ज्वार बहुत ऊंचाई तक पहुंचा था। उन्हें सोचना होगा कि पहली बार जम्मू क्षेत्र में पीडीपी का पदार्पण कैसे हुआ? बिस्नाह, डोडा जैसे घायल और नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस की नीतियों से लहुलुहान क्षेत्र उनके हाथ से क्यों फिसले? राजनीति में बीजेपी सत्ता के लिए नहीं, सत्ता के राष्ट्रहित में उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए है। उस पर जनता का भरोसा नेताओं की व्यक्तिगत छवि से बढ़कर विचारधारा और पूर्वकालीन नेताओं की शहादत के कारण है। यही साख व भरोसा बीजेपी की सबसे बड़ी पूंजी रही है। धर्म, वैभव और सत्ता का अहंकारी चरित्र बाकी दलों के कार्यकर्ताओं में शिकायतें या क्रोध पैदा नहीं करता क्योंकि उनसे सादगी और देशहित में सर्वस्व समर्पण की किसी को उम्मीद नहीं होती। इसलिए जम्मू के समर्थन को सरमाथे पर धरकर भाजपा को डॉ. मुखर्जी के लहू का स्मरण करते हुए ‘ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं ’ वाली नीति के साथ श्रीनगर की रणभूमि में उतरना होगा। तभी कश्मीर घाटी में तिरंगे के रंग में रंगी भारतीयता का दर्शन सुलभ होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।

तरुण विजय

Sunday, December 28, 2008

राजनीति का असली चेहरा

पिछले दिनों आमिर खान की फिल्म गजनी देखने का मौका मिला। यह एक ऐसे नायक की कथा है जो अल्पस्मृति रोग से ग्रस्त है और खुद पर ही प्रहार करने वाले अपराधी राजनेता के बहकावे में आकर उसकी मदद को तैयार हो जाता है। मुझे इस फिल्म को देखकर लगा कि भारतीय परिदृश्य भी आज कुछ ऐसा ही है। एक ओर वह जनता है जो निरंतर क्रमिक अंतराल के बाद स्मृतिलोप का शिकार होकर उन्हीं राजनेताओं को वोट देकर सत्ता में भेजती है जिनका वास्तविक चेहरा अपराधी का होता है। दूसरी ओर राजनेता हैं जो जनता के इस अल्प स्मृतिदोष का लाभ उठाकर हर बार 'शुभचिंतक' के नाते जनता के सामने आते हैं, वोट लेते हैं और चुनाव को पूंजी निवेश का एक ऐसा संविधान प्रदत्त उपक्रम मानते हैं जिसमें एक रुपये लगाओ तो हजार रुपये मिल जाते हैं। वह भी सिर्फ शब्दों के आडंबर के माध्यम से। ये वे लोग हैं जिन्हें विश्वास नहीं होता कि कोई उनकी मूर्तियां लगाएगा या बगीचों के नाम रखेगा। वे भूल जाते हैं कि उनसे बड़े-बड़े, प्रतापी और प्रभावी राजनेताओं की विराट प्रतिमाएं भी नहीं रह पाईं और उन्हें कई बार उनके जीते जी ही उखाड़ फेंका गया। यह किसी से छिपा नहीं कि लेनिन के नाम का शहर लेनिनग्राद और उनकी मूर्तियां गायब हो गईं और यह भी कि सद्दाम हुसैन की मूर्तियों का क्या हाल हुआ? यह तो अभी हाल की ही बात है। फिर भी हर राजनेता यह सोचकर चलता है कि वह बड़ा लोकप्रिय व प्रजावत्सल है। हजारों करोड़ों की योजनाएं उसने चालू करवा दीं, जनता के लिए स्कूल खुलवा दिए, कारखाने लगवा दिए। अब और क्या चाहिए इनको? जनता उनकी वास्तविकता को हर दिन जानते और पहचानते हुए भी हर बार उन्हें वोट दे तो फिर इसे क्या कहेंगे? नेता खराब और जनता फरिश्ता, क्या यह समीकरण सही बैठता है?

लगभग सभी नेताओं की जीवनशैली एक सी है। कई बार तो लगता है कि उन्होंने कितना पैसा कमाया होगा, इसका अंदाजा उन्हें भी पूरी तरह से नहीं होता होगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि राजनीति में आचरण उल्टे पिरामिड की तरह होता है। जैसा ऊपर देखते हैं वैसा ही मंझले और निचले दर्जे के कार्यकर्ता करते हैं। पैसा हो और थैले में आवश्यक संख्या में सरकटे चूजे तो लोकतंत्र की गाय से मन माना दूध दुहा जा सकता है, ऐसा मानने वालों की संख्या कम नहीं। यह तय है कि कुछ दिनों और उत्तर प्रदेश में अभियंता मनोज गुप्ता की हत्या की खबरें छपेंगी। फिर कुछ और घटनाएं इस पर छा जाएंगी। मनोज गुप्ता के परिवार वाले अंग्रेजी मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखते, इसलिए बात देहाती स्तर तक ही कुछ पोस्टरों और राजनेताओं के स्वार्थ केंद्रित शोर की जुगुप्साजनक राजनीति में उलझकर खत्म हो जाएगी।

जिस व्यवस्था ने मनोज गुप्ता की जान ले ली, न उस पर किसी का ध्यान जाएगा और न उसे कोई बदलने की मांग करेगा। इसलिए नहीं करेगा, क्योंकि यह व्यवस्था हर पार्टी और संगठन का वक्त-बेवक्त स्वार्थ साधती है। प्रशासन, अधिकारी, पुलिस-ये सब लोकतंत्र की गाय के दुहने के लिए राजनेताओं के उपकरण मात्र बना दिए गए हैं। हर बड़े पदों पर बिठाए जाने वाले अधिकारियों को मालूम है कि कौन सा पद 'फायदे' का है और कौन सा 'कायदे' का? जो फायदे के पद हैं उनकी ठीक वैसी ही नीलामी होती है जैसे ज्यादा कमाई वाले थानों में नियुक्ति के लिए बोलियां लगाई जाती हैं। यह उस देश में हो रहा है जहां कहा गया, 'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप अवसि नरक अधिकारी'। यह सब जानते हुए भी मानता कौन है? राजनेता भावनाओं का ज्वार पैदा करते हैं तो जनता जान की बाजी लगा देती है। उस ज्वार में नेताजी को सत्ता मिलती हैं और जनता को जलालत। वह अपनी आंखों से देखती है कि जिन पर हत्या के आरोप लगते हैं वे नेता बन जाते हैं और जेल के रास्ते से ऊंचे पद तक पहुंच जाते हैं। सत्ता में आते ही वे आतंकवादियों की पैरवी करने तक से नहीं चूकते। फिर भी वे सत्ता में बने रहते हैं, क्योंकि जिनके लिए देश केवल एक पूंजीनिवेश और विलासिता का प्लेटफार्म है। वे यह नहीं कह सकते कि सत्ता मिले न मिले, बंगले बनें न बनें, लेकिन मैं प्रजा हित से समझौता नहीं कर सकता। ऐसे लोग राजनीति में हैं, मगर अपवाद स्वरूप। जो मुख्यधारा के शिखर बने हैं उन लोगों से हम आतंकवाद की विभीषिका से लड़ने की उम्मीद कर सकते हैं? आखिर जो सत्ता प्रतिष्ठान एक अकर्मण्य गृहमंत्री को उसके पद से हटाने के लिए 200 लोगों की हत्या की प्रतीक्षा करे वह घरेलू राजनीतिक आतंकवादियों से किसी मनोज गुप्ता की रक्षा कर पाएगा, यह आशा करना ही व्यर्थ है।

बात गजनी से शुरू हुई थी। इसमें राजनीति के प्रभावी अपराधी के दुष्कृत्य से क्रुद्ध नायक राज्यसत्ता की रक्षक भुजा पर भरोसा करने के बजाय स्वयं प्रतिशोध लेता है और जनता के मन को आनंद तथा संतोष रहता है। शायद कोई यह न लिखेगा कि फिल्म भले ही सत्य की विजय के लिए ही क्यों न हो, लेकिन गैर-कानूनी ढंग से समाधान का मार्ग निकालती है। सवाल उठता है कि पिछले 20 वर्षों से हमारे हजारों स्त्री, पुरुषों, बच्चों को पाकिस्तान समर्थित जिहादियों ने मार डाला तो क्या उसका हिसाब चुकाने के लिए हम इसी थकी हुई, भ्रष्ट, आत्मकेंद्रित राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर रहें? दुनिया का सबसे युवा देश अरबपतियों की वैश्विक सूची में यदि एक ओर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रहा है तो दूसरी ओर रीढ़ हीन सत्ता राजनीति का कलुषित चेहरा हमारे वीरत्व और आत्मविश्वास को चुनौती दे रहा है। संक्रमण काल में इस राजनीति के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध असहिष्णु जनाक्रोश का उभरना तय है। प्रकृति कभी क्षुद्रता और अंधा अहंकार क्षमा नहीं करती।

[तरुण विजय: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

रामसेतु तथा राम के युग की प्रामाणिकता

हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस है तथा हमें अपने गौरवशाली इतिहास तथा उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में खोज करने की तथा उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे। परंतु स्वतंत्र भारत में पले तथा पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तथ्यों तथा जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस भी रखते है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है। वास्तव में श्रीराम भारतीयों के रोम-रोम में बसे है। रामसेतु पर उठ रहे तरह-तरह के सवालों से श्रद्धालु जनों की जहां भावना आहत हो रही है,वहीं लोगों में इन प्रश्नों के समाधान की जिज्ञासा भी है। हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्‍‌न करे:- श्रीराम की कहानी प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण श्रीराम के अयोध्या में सिंहासनारूढ़ होने के बाद लिखी गई। महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलविद् थे। उन्होंने राम के जीवन में घटित घटनाओं से संबंधित तत्कालीन ग्रह, नक्षत्र और राशियों की स्थिति का वर्णन किया है। इन खगोलीय स्थितियों की वास्तविक तिथियां 'प्लैनेटेरियम साफ्टवेयर' के माध्यम से जानी जा सकती है। भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' नामक साफ्टवेयर प्राप्त किया, जिससे सूर्य/ चंद्रमा के ग्रहण की तिथियां तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा पृथ्वी से उनकी दूरी वैज्ञानिक तथा खगोलीय पद्धति से जानी जा सकती है। इसके द्वारा उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित खगोलीय स्थितियों के आधार पर आधुनिक अंग्रेजी कैलेण्डर की तारीखें निकाली है। इस प्रकार उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर 14 वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या पहुंचने तक की घटनाओं की तिथियों का पता लगाया है। इन सबका अत्यंत रोचक एवं विश्वसनीय वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक 'डेटिंग द एरा ऑफ लार्ड राम' में किया है। इसमें से कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण यहां भी प्रस्तुत किए जा रहे है।

श्रीराम की जन्म तिथि

महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8 और 9 में वर्णन किया है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। उस समय सूर्य,मंगल,गुरु,शनि व शुक्र ये पांच ग्रह उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। ग्रहों,नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी-सूर्य मेष में,मंगल मकर में,बृहस्पति कर्क में, शनि तुला में और शुक्र मीन में थे। चैत्र माह में शुक्ल पक्ष नवमी की दोपहर 12 बजे का समय था।

जब उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में डाला गया तो 'प्लैनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर' के माध्यम से यह निर्धारित किया गया कि 10 जनवरी, 5114 ई.पू. दोपहर के समय अयोध्या के लेटीच्यूड तथा लांगीच्यूड से ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल वही थी, जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है। इस प्रकार श्रीराम का जन्म 10 जनवरी सन् 5114 ई. पू.(7117 वर्ष पूर्व)को हुआ जो भारतीय कैलेण्डर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12 बजे से 1 बजे के बीच का है।

श्रीराम के वनवास की तिथि

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड (2/4/18) के अनुसार महाराजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका(दशरथ जी) जन्म नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है या वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था ये सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ई.पू.के दिन सूर्य,मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राज्य तिलक वाले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा था। इस प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़ कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114- 5089) की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक यह इंगित करते है कि जब श्रीराम ने 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे।

खर-दूषण के साथ युद्ध के समय सूर्यग्रहण

वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 13 वें साल के मध्य में श्रीराम का खर-दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्यग्रहण लगा था और मंगल ग्रहों के मध्य में था। जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 5 अक्टूबर 5077 ई.पू. ; अमावस्या थी। इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी (20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ) से देखा जा सकता था। उस दिन ग्रहों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की- मंगल ग्रह बीच में था-एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य तथा शनि थे।

अन्य महत्वपूर्ण तिथियां

किसी एक समय पर बारह में से छह राशियों को ही आकाश में देखा जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान के लंका से वापस समुद्र पार आने के समय आठ राशियों, ग्रहों तथा नक्षत्रों के दृश्य को अत्यंत रोचक ढंग से वर्णित किया गया है। ये खगोलीय स्थिति श्री भटनागर द्वारा प्लैनेटेरियम के माध्यम से प्रिन्ट किए हुए 14 सितंबर 5076 ई.पू. की सुबह 6:30 बजे से सुबह 11 बजे तक के आकाश से बिल्कुल मिलती है। इसी प्रकार अन्य अध्यायों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई बार दूसरी घटनाओं की तिथियां भी साफ्टवेयर के माध्यम से निकाली गई जैसे श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5076 ई.पू.को पूर्ण की और ये दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी ही था। इस प्रकार जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे (5114-5075)।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तक समुद्र के ऊपर पुल बनाया। इसी पुल को पार कर श्रीराम ने रावण पर विजय पाई। हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर एक सेतु के वो अवशेष दिखाए है, जो पॉक स्ट्रेट में समुद्र के भीतर रामेश्वरम(धनुषकोटि) से लंका में तलाई मन्नार तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि विश्वकर्मा की तरह नल एक महान शिल्पकार थे जिनके मार्गदर्शन में पुल का निर्माण करवाया गया। यह निर्माण वानर सेना द्वारा यंत्रों के उपयोग से समुद्र तट पर लाई गई शिलाओं, चट्टानों, पेड़ों तथा लकड़ियों के उपयोग से किया गया। महान शिल्पकार नल के निर्देशानुसार महाबलि वानर बड़ी-बड़ी शिलाओं तथा चट्टानों को उखाड़कर यंत्रों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। साथ ही वो बहुत से बड़े-बड़े वृक्षों को, जिनमें ताड़, नारियल,बकुल,आम,अशोक आदि शामिल थे, समुद्र तट पर पहुंचाते थे। नल ने कई वानरों को बहुत लम्बी रस्सियां दे दोनों तरफ खड़ा कर दिया था। इन रस्सियों के बीचोबीच पत्थर,चट्टानें, वृक्ष तथा लताएं डालकर वानर सेतु बांध रहे थे। इसे बांधने में 5 दिन का समय लगा। यह पुल श्रीराम द्वारा तीन दिन की खोजबीन के बाद चुने हुए समुद्र के उस भाग पर बनवाया गया जहां पानी बहुत कम गहरा था तथा जलमग्न भूमार्ग पहले से ही उपलब्ध था। इसलिए यह विवाद व्यर्थ है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं, क्योंकि यह पुल जलमग्न, द्वीपों, पर्वतों तथा बरेतीयों वाले प्राकृतिक मार्गो को जोड़कर उनके ऊपर ही बनवाया गया था।

सरोज बाला

Thursday, December 25, 2008

बैर बढ़ाने पर आमादा पाक

भारत-पाक सीमा पर कुपवाड़ा में 22 मई 2002 के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हिम्मत हो तो छिपकर वार करने के बजाय पाकिस्तान सामने आए और दो-दो हाथ कर ले, अब निर्णायक लड़ाई का वक्त आ गया है। फिर शिमला में 26 मई 2002 को कहा कि संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद ही हमें पाकिस्तान को सबक सिखा देना चाहिए था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपील पर हमने पाक को एक मौका दिया। अब हमारा धैर्य टूट रहा है। पाकिस्तान पर इस सबका असर नहीं पड़ा और वह फिर अपने काम पर लग गया। आतंकवादी आते रहे। भारत पर हमलावर रहे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही कोई डेढ़ दर्जन हृदयविदारक आतंकी हमले हुए। फिर मुंबई पर सीधा आक्रमण हुआ। देश में उबाल आ गया। पाकिस्तानी षड्यंत्र के पुख्ता सबूत भी मिल गए। प्रधानमंत्री अब पाकिस्तान से कड़ी कार्रवाई का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तानी जवाब गौरतलब है कि वह जंग के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री ने कहा कि युद्ध कोई नहीं चाहता। युद्ध मुद्दा नहीं, असली मुद्दा है आतंकवाद और पाकिस्तान को इस पर नतीजा देना होगा। हैरत है कि प्रधानमंत्री अब भी आतंकवाद को युद्ध नहीं मानते।

युद्ध का कोई विकल्प नहीं होता। हमलावर शत्रु सदाशयता का अर्थ कायरता ही लेता है। पाकिस्तान अपने जन्मकाल से ही युद्धरत है। वह कबाइली युद्ध , कच्छ युद्ध , पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध (1971) और कारगिल (1999) सहित 4 प्रत्यक्ष युद्धों में भारत से हार चुका है। वह प्रच्छन्न आतंकी युद्ध के जरिये लगातार हमलावर रहता है। वह आतंकवाद के प्रशिक्षण की यूनिवर्सिटी चलाता है। विश्व समुदाय के पास आतंकी ट्रेनिंग सेंटरों के सबूत हैं, सबूत भारत के पास भी हैं। मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल आमिर कसाब के पाकिस्तानी नागरिक होने के सबूत पाक मीडिया ने भी दिए हैं। अमेरिकी एफबीआई ने भी तमाम तथ्य दिए हैं, लेकिन पाकिस्तान तथ्य नहीं मानता और युद्ध के लिए ललकार रहा है। हमले की प्रत्येक वारदात से इनकार और युद्ध की तत्परता पाकिस्तान का स्वभाव है। याद कीजिए जब 26 मई 2002 को वाजपेयी ने शिमला में कहा कि हमारे धैर्य का बांध टूट रहा है तो ठीक दूसरे दिन 27 मई को परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि हम अल्लाह का नाम लेकर जंग में उतरेंगे। हमारी सेना तैयार है। पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे जेएन दीक्षित के अनुसार कंधार विमान अपहरण की साजिश मुंबई और ढाका में मौजूद आईएसआई एजेंटों ने बनाई थी। दीक्षित ने ध्यान दिलाया था कि अपहर्ताओं ने 33 पाकिस्तानी आतंकियों की रिहाई की मांग की थी। रिहा मुख्य आतंकी अजहर मसूद पाकिस्तान में अपने गांव बहावलपुर पहुंचा। उसका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ।

पाकिस्तान वास्तविक राष्ट्र-राज्य नहीं है। वह दरअसल एक सुव्यवस्थित विचारधारा है। इस विचारधारा का जन्म पाकिस्तान से भी पुराना है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के एक छात्र रहमत अली ने 1933 में 'नाऊ आर नेवर' शीर्षक से एक लेख के जरिये दक्षिण एशिया में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की पैरवी की थी। उन्होंने इस काल्पनिक राष्ट्र का नाम पाकिस्तान रखा। 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' लिखने वाले शायर इकबाल ने इस विचार का तर्क सहित समर्थन किया। मुस्लिम लीग के लाहौर सम्मेलन (1940) में जिन्ना ने पाकिस्तान प्रस्ताव रखा और यह पारित हो गया। जिन्ना के मुताबिक मुसलमान अलग राष्ट्र थे। नेहरू, लार्ड माउंटबेटन और जिन्ना ने भारत बांट दिया। उम्मीद थी कि समस्या का स्थायी समाधान हो गया। भारतीय राजनीतिक तंत्र में 'इतिहास बोध' का अभाव है। इतिहास क्रूर होता है। वह भुलक्कड़ों को क्षमा नहीं करता। पाकिस्तान का इतिहास 1947 से ही शुरू होता है, लेकिन विचारधारा की जड़ें मध्यकाल में हैं। बिन कासिम ने 7वीं सदी में भारत पर हमला किया था। गजनी और गोरी के हमले इतिहास की निर्मम सच्चाइयां हैं। नेहरू को उम्मीद थी कि पाकिस्तान कुछ समय बाद स्वत: ही नष्ट हो जाएगा। वह इस्लामी राजनीतिक चिंतन और जिहाद की ताकत पर आंखें मूंदे रहे। पाकिस्तान अलग रहकर मौज उड़ाने के लिए नहीं बना था। पाकिस्तानी विचार के जन्मदाता रहमत अली ने पाकिस्तान निर्माण के वक्त भारतीय मुसलमानों के बारे में कहा था, ''वे हमारा खून हैं। वे वाकिफ हैं कि पाकिस्तान 'मिल्लत' के सर्वोच्च हित में है। यह हमारे लिए किला है और उनके (भारतीय मुसलमानों) लिए लंगर।'' एफके दुर्रानी ने 'मीनिंग आफ पाकिस्तान'में लिखा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए जरूरी था कि उसको शिविर बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जाए। पाकिस्तान के पहले हुक्मरान संस्थापक जिन्ना भारत के शत्रु थे। कबाइली हमला उन्हीं के वक्त हुआ। प्रथम वजीरेआजम लियाकत अली खां ने 'नेहरू लियाकत समझौता' (1950) किया। समझौता व्यर्थ रहा। पहले राष्ट्रपति इस्कंदर अली मिर्जा भी भारत विरोधी थे। पहले सैन्य शासक जनरल अयूब खां का रुख भी भारत के प्रति युद्धक था। याह्या खां के समय भारत से युद्ध (1971) हुआ। जुल्फिकार अली भुट्टो (1971) जिया उल हक (1977), बेनजीर भुट्टो (1988-1990 व 1993-1996) और नवाज शरीफ भी भारत पर आक्रामक थे। कारगिल युद्ध परवेज मुशर्रफ की ही खुराफात था। संप्रति यूसुफ रजा गिलानी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हैं, लेकिन पाकिस्तान में चार ए-अल्लाह, आर्मी, आतंक और अमेरिका- का रुतबा है। प्रधानमंत्री सेना के दबाव में हैं। आतंकवाद पाकिस्तानी विचारधारा में जिहाद है, अमेरिका अपने ऊपर हुए हमले के विरुद्ध सीधा आक्रमण करता है, लेकिन पाकिस्तान से जुड़ी हर वारदात में अमेरिकी राजनयिकों की 'संतुलन सेवाएं' नि:शुल्क उपलब्ध हैं।

पाकिस्तान आतंकी विचारधारा पर भारी खर्च करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल आफ गवर्नमेंट की अमेरिकी विद्वान जेसिका स्टर्न ने 'फारेन अफेयर्स' (नवंबर- दिसंबर 2000) में लिखा था कि पाकिस्तान में 45 हजार मदरसे हैं। इनमें केवल 4000 ही सरकार में पंजीकृत हैं। आंकडे़ 8 बरस पुराने हैं। भुट्टो के सहायक और पाकिस्तानी इतिहासकार केके अजीज ने अपने शोध में पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों का विष-विश्लेषण किया है। कक्षा 2 की इतिहास की किताब के अनुसार नेहरू ने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुओं की सरकार होगी, जिन्ना ने कहा-यहां मुसलमान भी रहते हैं। कक्षा 3 की किताब के अनुसार राजा जयपाल ने महमूद गजनवी के मुल्क में घुसने की कोशिश की। महमूद ने राजा को हरा दिया, लाहौर हथिया लिया। पाकिस्तानी तरुणाई का विकास इसी विष-विचार से किया जाता है, फिर आतंकी शिविर सेवाएं देते हैं। फिर आईएसआई मदद करती है। सीमा पर भले ही युद्धविराम हो, लेकिन आईएसआई के आतंकी बिना अल्पविराम आक्रामक हैं। भारत सोचे कि क्या करना है? भारत की विदेश नीति मित्रतापूर्ण है, पाकिस्तान की नीति युद्धक है। नेहरू से लेकर वाजपेयी और मनमोहन तक प्रेम की मनुहार है, लेकिन जवाब में युद्ध और परमाणु बम की धमकियां हैं। भारत पाकिस्तान विषयक विदेश नीति का आद्योपांत पुनरीक्षण करे। युद्ध ठीक नहीं होता, लेकिन थोपे गए युद्ध को टालने का कोई उपाय तो करना ही होगा।

[हृदयनारायण दीक्षित: लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं]

Take the war to the enemy

New Delhi continues to fumble while India burns.
Pakistan's superior psychological warfare machinery further tied down the already overstretched Indian security forces in knots. Airports and railway stations are the new fortresses that are heavily guarded. Next will be Metro stations or shopping malls. The list is endless. This is what the enemy wants -- tire and dull the edges of the security forces of India by making them run hither and thither.
This remains the single important reason why intelligence and police machinery of the Union and the states have collapsed. Perpetual red alerts, 24x7 for the past three decades have reduced them to dysfunctional entities with no declared objectives to achieve. The ease with which Parliament or Mumbai were attacked stands witness to the fact. Worse, our leadership's response to the threat posed was too shameful to comment upon.
New Delhi is walking into the trap by superficially trying to guard every inch. Neither feasible nor a method recommended. The Indian leadership that inducted them in a marshy land of insurgency and terrorism for more than two decades without any clarity in political or military objectives is adding to the confusion of the security forces.
Forces that are inducted into battles always need clarity of purpose, military objectives spelled out and swiftness in conduct of operations to avoid demoralisation. Otherwise, battles cannot be won and there is the likelihood of the forces landing in disarray. It appears to be now happening to the Indian security apparatus on the ground.
Imagine if ten trained terrorists from Karachi can hold the financial capital of India to ransom for days, what will happen if 500 pour in from different points in to the country? They can literally bring the entire nation to its knees.
To say that the threat from radical Islam was not known despite the collapse of the intelligence machinery is not true. The very fact that the prime minister and his colleagues for many years are forced to move under heavy security blanket within their own capital city with roads lined up with policemen is a shameful declaration of the existing threat to the Union. Couple this fact with the increasing frequency of attacks by the Islamic terrorists in recent times and the entire threat perception becomes crystal clear.
To tie up security forces in knots internally to deal with the externally sponsored, trained, and petro-dollar financed terrorism exported by the Pakistan army and the Inter Services Intelligence will deaden their morale and will to fight. While there is definitely an internal dimension to security, to put the forces within on a self-destructive directionless path is exactly what the enemy wants!
Either the political set up in New Delhi has not understood this raw truth in war fighting or is too scared to take the war back to enemy territory. This war must be fought decisively in Pakistan before it engulfs the Union of India in its entirety.
Pakistan is in cahoots with other dictatorial regimes on our borders. China wants to tie down India to retain its top dog status in Asia. Maoist Nepal favours China. Bangladesh, another laboratory of radical Islam, is in connivance with these dictatorial regimes. The subtle alliance of China, Pakistan, Bangladesh and Nepal Maoists pose a combined threat to the territorial integrity of India. Of course, overtly these regimes pretend to work in isolation of each other so as not to alarm New Delhi.
To avoid destruction of our forces by deployment in unending internal circuses and before war fatigue sets in, we need to take the war imposed by radical Islam to the enemy territory. Unless the source of supply is disabled, this war cannot be won. The core group orchestrating this drama is the Pakistan army and the ISI. These external links are required to be put in disarray. This can only happen if the war is re-exported to Pakistan.
If the poisonous flow from the external links is not stopped, Indian Muslims will be radicalised, which is the primary aim of Pakistan. Similarly, a backlash from the majority that is responsible for the liberal philosophy of India can wreck the democratic set-up. Non-governance is not really an option available to the prime minister. Mumbai and other attacks mounted by terrorists on Indian cities, could not have taken place without local support. For the police or intelligence agencies to profess otherwise is untruthful.
Another falsehood perpetuated by the eternally helpless breed of Indians is that a stable Pakistan is in India's interest. It is not, stable or otherwise. Pakistan is a failed State. It is on the brink of disintegration. It simply needs to be helped to remove itself and the map redrawn. Otherwise, the cost to India will keep increasing disproportionately.
To take this war to the enemy, New Delhi needs a deliberate, graded and escalating response with a clear political and military objective to help Islamabad disintegrate:
Snap diplomatic relations immediately.
Declare Pakistan a terrorist State.
Discontinue all trains and bus services as well as trade and business transactions.
Announce renegotiations of the Indus Water Treaty as the terms unduly favour Pakistan.
Begin a process to regulate the water supplies and build new mechanisms to activate water flow controls.
Cancel permissions for over flights.
Seal the Nepal and Bangladesh borders on a priority basis.
Build a grand alliance of democracies by increasing their stakes in the burgeoning economic pie of India, to leverage their support against authoritarian regimes on our border including Pakistan.
Increase immediately FDI in the defence sector from 26 percent to 49 percent. This will help India to emerge as the most modern technology driven defence industry hub in Asia while making it profitable for Western companies to invest.
Instead of fighting at cross-purposes with Asia's largest media, harness its resources to conduct unprecedented psychological warfare. In times of war, the media is a weapon, a platform to be used intelligently to secure the national interests without attempting to hinder its freedom.
Equip the intelligence agencies with clear directives and resources to conduct deniable acts in enemy land similar to Islamabad's terrorist acts. Thus raise the cost to the enemy and make it prohibitive for Pakistan. This will also fuel the disintegration of this tottering State. The game can be played by equal finesse by us.
To defend the taxpayer's millions of dollars invested in Afghanistan's reconstruction programme, move two integrated divisions with substantial air element in the area, in consultation with Kabul. Let Indian pressures build up from the east and west on Pakistan so that our embassy or similar establishments are not targeted in the future.
The Bush administration's strategy that Western forces without India's support will win in the Afghanistan-Pakistan region is misguided and counter-productive. They cannot win without New Delhi's direct involvement. The incoming Obama administration urgently needs to change this policy in Washington's interest. Similarly, New Delhi should learn to fight its own war instead of expecting others do its dirty work.
Simultaneously equip and marshal the military forces on a war footing, removing all deficiencies including the human resources as war at an appropriate time of our choosing remains an open option.
We should stop tying up our forces internally in an endless mind-boggling game. This will result in disintegration and ineffective security instruments available to the State. The helplessness of the under-trained and under-equipped police was on display during the attack in Mumbai. Therefore, instead of permitting our forces to disintegrate in the long term, it is sensible to take this war to Pakistan and make them pay the price.
It is time, India woke from its slumber.
Bharat Verma is editor, Indian Defence Review

लक्ष्य से भटकी हुई लड़ाई

भारत जल रहा है और नई दिल्ली यह तय नहीं कर पा रही कि उसे किस राह जाना है? मनोवैज्ञानिक दबाव में माहिर पाकिस्तान के युद्धक तंत्र ने भारतीय सुरक्षा बलों की पहले से ही तनी रस्सियों में और बल डाल दिए हैं। हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात करने पड़े हैं। मेट्रो स्टेशन, शापिंग माल, प्रमुख स्थल-सभी कुछ सुरक्षा के घेरे में हैं। यही शत्रु चाहता भी है-भारतीय सुरक्षा बलों को इधर-उधर दौड़ाकर थकाना और उनकी धार कुंद करना। यह स्थिति सामरिक क्षेत्र के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के रणनीतिक स्तर पर दूरदर्शी दृष्टिकोण के स्थान पर कंपनी कमांडर जैसे नजरिये का ही दुष्परिणाम है। इसके साथ ही यह केंद्र तथा राज्यों के पुलिस और खुफिया तंत्र की विफलता का महत्वपूर्ण कारण भी है। पिछले तीन दशकों से हमेशा जारी रेड अलर्ट से यह तंत्र ऐसी निष्क्रिय इकाइयों में तब्दील हो गया है जिसके पास हासिल करने के लिए कोई घोषित लक्ष्य नहीं है। जिस आसानी से भारत की संसद और मुंबई पर हमला किया गया वह इस तथ्य की पुष्टि करता है। बदतर स्थिति यह है कि इस खतरे पर हमारे नेतृत्व का नजरिया बेहद निराशाजनक है। चप्पे-चप्पे की सुरक्षा के सतही प्रयास करके भारत जाल में फंस रहा है। यह तरीका बिल्कुल अव्यावहारिक है। राजनीतिक और सामरिक उद्देश्यों में स्पष्टता के अभाव में भारतीय नेतृत्व पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से सुरक्षा बलों को उपद्रव और आतंकवाद के कीचड़ में धकेल रहा है। इससे हमारे सुरक्षा बल विभ्रम का शिकार हो रहे हैं। सुरक्षा बलों को लड़ाइयों में भेजते समय हमेशा स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए। उनका मनोबल बनाए रखने के लिए त्वरित सैन्य कार्रवाई और इसके सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित होने चाहिए, अन्यथा लड़ाई जीती नहीं जा सकती।

कल्पना कीजिए कि अगर कराची के दस प्रशिक्षित आतंकी भारत की वित्तीय राजधानी को कई दिनों तक बंधक बना सकते हैं तो देश के विभिन्न शहरों में ऐसे पांच सौ आतंकी घुस आने पर क्या हाल होगा? क्या वे पूरे देश को घुटनों के बल नहीं ला देंगे? यह कहना कि खुफिया एजेंसियों की विफलता के कारण कट्टरपंथ के खतरों का आभास नहीं हो पाया, सरासर गलत है। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई द्वारा निर्यातित, प्रशिक्षित तथा पेट्रो डालर से वित्तपोषित आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को देश में ही फंसा देने से उनका मनोबल कमजोर हो जाता है। या तो नई दिल्ली में राजनीतिक तंत्र युद्ध के इस सच को नहीं समझ पा रहा है या फिर लड़ाई को शत्रु के पाले में ले जाने में अत्यधिक सशंकित है। यह युद्ध समग्र भारतीय संघ में फैलने से पहले ही रणक्षेत्र पाकिस्तानी भूभाग को बनाना पड़ेगा। कट्टर इस्लाम की प्रयोगशाला पाकिस्तान के तार अन्य तानाशाहियों के साथ जुड़े हुए हैं। चीन एशिया की महाशक्ति बने रहने के लिए भारत का उदय देखना नहीं चाहता। माओवादी नेपाल चीन का पक्षधर है। कट्टरवादी इस्लाम की दूसरी प्रयोगशाला बांग्लादेश का इन तानाशाही शासनों के साथ गुप्त सहयोग है। चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की साठगांठ भारतीय भूभाग की अखंडता के लिए खतरा है। सुरक्षा बलों को घरेलू मोर्चे पर क्षति उठाने से बचाने के लिए हमें मजहबी कट्टरता द्वारा थोपे गए युद्ध को उसी की भूमि पर ले जाना होगा। जब तक आपूर्ति का स्त्रोत नहीं मिटेगा, इस युद्ध को जीता नहीं जा सकता। इस ड्रामे की निर्देशक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई हैं। इन वाह्यं सूत्रों को नाकाम करना जरूरी है। यह तभी संभव है जब पाकिस्तान की युद्ध की चुनौती को पलट दिया जाए। अगर वाह्यं कड़ियों से जहरीला प्रवाह नहीं रोका जाता तो भारतीय मुसलमान भी कट्टरपंथी हो जाएंगे, जो पाकिस्तान का प्रमुख ध्येय है। इसी प्रकार बहुसंख्यकों की ढिलाई, जो भारत की उदारवादी विचारधारा की परिचायक है, भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त कर देगी। हमारे सामने सुशासन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।

इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि मुंबई और भारत के अन्य शहरों पर किए गए हमले स्थानीय समर्थन के बगैर संभव नहीं हैं। 'शाश्वत असहाय' प्रजाति के भारतीयों का एक अन्य भ्रम यह है कि स्थिर पाकिस्तान भारत के हित में है। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र है। यह विखंडन की कगार पर है। इसे खुद के खात्मे के लिए मदद की जरूरत है ताकि नक्शों का पुनर्निर्धारण किया जा सके। यह मदद जल्द देनी चाहिए, अन्यथा भारत के लिए इसकी कीमत बराबर बढ़ती चली जाएगी। इस युद्ध को दुश्मनों की हदों में ले जाने के लिए भारत को स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों के साथ निर्णायक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले तो कूटनीतिक संबंध समाप्त करने में देर नहींकरनी चाहिए। पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित करना, व्यावसायिक संबंध समाप्त करना, बस और रेल सेवा रद्द करना, सिंधु जल संधि के संबंध में फिर से वार्ता की घोषणा करना ऐसे अन्य उपाय हैं। इसके अलावा नेपाल और बांग्लादेश सीमा को प्राथमिकता के साथ सील कर दिया जाना चाहिए। भारत को सहयोगी लोकतांत्रिक देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ कर पाकिस्तान के खिलाफ उनका समर्थन हासिल करना चाहिए। अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ने के लिए मीडिया का भी इस्तेमाल करना चाहिए। युद्धकाल में मीडिया का बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल एक हथियार की तरह काम आता है। खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट दिशा-निर्देशों और संसाधनों से लैस कर शत्रु देश की अधिकाधिक जानकारी हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। बुश प्रशासन की यह रणनीति दिशाहीन और बेअसर है कि वह भारत के समर्थन के बिना अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर जीत हासिल कर सकता है। भारत के सीधे दखल के बिना यह संभव नहीं है। निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस नीति में बदलाव करने की जरूरत है। भारत को अन्य देशों से अपेक्षा रखने के बजाय अपनी लड़ाई खुद लड़ना सीखना होगा।

[भरत वर्मा: लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं]

Monday, December 22, 2008

आतंकवाद का यथार्थ

पिछले दो दशकों में आतंकवाद तथा अलगाववाद का यथार्थ भारतीय राष्ट्र-राज्य के चेहरे पर घाव पर घाव लगा रहा है, लेकिन हर बार भारत इन पर लगे खून को पोंछकर कुछ खोखली घोषणाएं कर देता है और अपने आसपास की कड़वी सच्चाई से मुंह मोड़ लेता है। सवाल यह है कि क्या मुंबई में हुआ आतंकी हमला भारतीय राष्ट्र-राज्य को सच्चाई तक पहुंचने के लिए प्रेरित करेगा? सच्चाई यह है कि हाल के समय में भारत और उससे बाहर इस्लामिक कट्टरता में एक नए प्रकार का पागलपन शामिल हो गया है। सच्चाई यह है कि देश का राजनीतिक वर्ग समाज के विभिन्न स्तरों पर मौजूद नकारात्मक तथा स्वार्थी शक्तियों के एकीकृत तथा प्रतिबद्ध हमले से निपट पाने में असमर्थ साबित हो रहा है। सच्चाई यह भी है कि हमारा लोकतंत्र उन कंधों पर है जो कमजोर मिट्टी के बने हैं। इन सबसे ऊपर की सच्चाई यह है कि हर चीज को हल्के-फुल्के तरीके से लेने की हमारी संस्कृति हमें अपनी कमजोरियों की पहचान करने तथा उनका निदान करने से रोक देती है। जब तक इन सच्चाइयों का सामना नहीं किया जाता तब तक आतंकवाद तथा अलगाववाद किसी न किसी रूप में हमें लहूलुहान करता रहेगा।

जब मुझे दूसरी बार 19 जनवरी 1990 को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तब मुझसे कहा गया था कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक मशीनरी पूरी तरह ढह गई है। मुझसे यह अपेक्षा की गई कि मैंने 1984 के शुरुआती दौर से 1989 तक अपने पहले कार्यकाल में लोगों और नौकरशाही के साथ जो तारतम्यता स्थापित कर ली थी उसका फायदा उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ के हाथों से फिसलने से रोकने के कुछ उपाय करूं। परिदृश्य में आने के बाद मैंने पाया कि आईएसआई तथा उसके एजेंटों द्वारा कश्मीर घाटी में आतंकवाद तथा घुसपैठ का व्यापक नेटवर्क कायम कर लिया गया है। वे वही तकनीक अपना रहे थे जो सीआईए के रणनीतिकारों ने अफगान युद्ध में अपनाई थी। अफगान युद्ध में सीआईए ने खासतौर पर इस्लाम के कतिपय कंट्टर पहलुओं का इस्तेमाल करते हुए स्थानीय लोगों को रूस के सैन्य बलों के विरुद्ध खड़ा किया। यही काम मिलते-जुलते रूप में घाटी में हो रहा था। बगावत के लिए उकसाने वाला साहित्य बड़े पैमाने पर घाटी के लोगों में बांटा गया था। लोगों के दिलोदिमाग को किस तरह झकझोरा जा रहा था उसका एक खास उदाहरण व्यापक रूप से वितरित किए गए उस कैसेट का है, जिसमें एक ऐसा गीत था जिसे कश्मीर का स्वाधीनता गीत कहा जा रहा था।

कश्मीरी मुस्लिम मष्तिष्क को भावनात्मक रूप से बरगलाने के इन प्रयासों के खिलाफ न तो केंद्र सरकार ने कुछ किया और न ही राज्य सरकार ने। राष्ट्रीय अथवा स्थानीय स्तर पर किसी नेता ने लोगों को यह समझाने की कोशिश नहींकी कि जो कुछ उनके दिमाग में भरा जा रहा है उसकी असलियत क्या है और एक ऐसे देश में जिहाद का कोई स्थान नहीं जो संवैधानिक रूप से लोगों को मजहब की आजादी प्रदान करता है। दूसरी ओर जमाते इस्लामी तथा दूसरे कट्टरपंथी संगठनों ने आईएसआई के वित्तीय तथा तकनीकी सहयोग की मदद से अपनी गतिविधियां कई गुना बढ़ा दीं और मीडिया, शिक्षा पद्धति तथा शासन के अन्य अनेक संस्थानों के ढांचे में घुसपैठ कर ली। सीआईए ने अफगान युद्ध में आईएसआई को जो भारी-भरकम धनराशि उपलब्ध कराई थी उसका लगभग 60 प्रतिशत भाग इस पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा घाटी में आतंकवाद के तानेबाने में झोंक दिया गया।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की इतनी गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए मैंने कई नए और कठोर कदम उठाए। राष्ट्र विरोधी सामग्री को जब्त करना, उन स्थानों से लाउडस्पीकर हटवाना जहां से मजहब के नाम पर हिंसा भड़काने का काम किया जा रहा था और गुरिल्ला शैली में गुरिल्ला युद्ध से निपटने के सिद्धांत पर विशेष दस्तों का गठन ऐसे ही कुछ कदम थे। आतंकवाद के खिलाफ कई स्तर पर कदम उठाने का परिणाम ठोस सुधार के रूप में सामने आया, जिसे लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने महसूस किया। लेफ्टिनेंट जनरल एनसी रावले ने जो कुछ मुझे लिखा था वह और भी अधिक प्रासंगिक है-''मुझे गुरिल्ला अभियानों का अच्छा-खासा अनुभव है। दो महीने पहले तक मेरा विचार था कि हम कश्मीर खो चुके हैं। जब से आपने मौजूदा नीति अपनाई है, पूरी स्थिति ही बदल गई है। अब मुझे लगता है कि हम कश्मीर नहीं हारेंगे।'' जमीनी स्तर पर तेजी से सुधरती स्थितियों ने आईएसआई तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की साजिश गड़बड़ा दी। वे यह सोचने लगे थे कि कुछ ही हफ्तों के भीतर कश्मीर घाटी उनकी झोली में गिर जाएगी।

बुरी तरह हतोत्साहित होकर उन्होंने मेरे खिलाफ खास तरह का दुष्प्रचार आरंभ कर दिया। मुझे याद है कि बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर आकर कैसे-कैसे भाषण दिए थे। एक मौके पर उन्होंने कहा-''जग-जग-मोहन को भाग-भाग मोहन कर देंगे।'' मुझे आश्चर्य होता है कि व्यक्ति के रूप में वह मुझे क्यों निशाना बनाना चाहती थीं? शायद वह यह समझती थीं कि मेरे लक्ष्य की ओर केंद्रित व्यापक दृष्टिकोण के कारण पाकिस्तान की योजनाएं धरी रह जाएंगी। दुर्भाग्य से लगभग उसी समय कई तरह के तत्वों द्वारा मेरे खिलाफ मिथ्या सूचनाओं पर आधारित एक अभियान आरंभ कर दिया गया, जो बेनजीर भुट्टो के इरादों की पूर्ति करने वाला था। इनमें से कुछ लोग ऐसे थे जिनके राजनीतिक स्वार्थ थे। कुछ अन्य लोगों ने मानवाधिकारों की आड़ में इस अभियान में हाथ बंटाया और जमकर दुष्प्रचार किया। यह कहा गया कि राज्यपाल ने इसलिए कश्मीरी पंडितों को हटाया है ताकि वह घाटी में बमबारी कर सकें। इस सबका असर यह हुआ कि आतंक विरोधी अभियान की दिशा बाधित हो गई। सुरक्षा बलों तथा दूसरी एजेंसियों में एक प्रकार की हताशा फैल गई। खुद मुझे परिदृश्य से हटना पड़ा। तब अनंतनाग के एक शीर्ष आतंकवादी मंजूर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जगमोहन के हटाए जाने से हमारी उम्मीदें फिर बढ़ गई हैं।

इसके बाद क्या हुआ, यह हर कोई देख सकता है। जम्मू-कश्मीर में लगभग साठ हजार लोग मारे जा चुके हैं। जिस बुराई को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से मिटाया जा सकता था उसे हमने देश के बड़े हिस्से में फैल जाने दिया। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में हमने कभी वह स्पष्टता तथा दृढ़ता विकसित करने की कोशिश नहीं की जो आतंकवाद सरीखी बुराई से लड़ने के लिए आवश्यक है। आज भी हम अपने आप से यह सवाल नहीं कर रहे हैं कि जब जम्मू-कश्मीर के प्रानकोट में 28 नागरिकों को लाइन में खड़ा कर गोली से उड़ा दिया गया था तब कोई मोमबत्ती क्यों नहीं जली थी, क्यों गुस्से का एक भी नारा सुनाई नहीं दिया, क्यों कोई जुलूस नहीं निकला? यदि राजनीति, व्यवसाय, बौद्धिक समुदाय और मीडिया के विशिष्ट वर्ग ने जम्मू-कश्मीर में बसों में जलाए जा रहे निर्दोष लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की होती तो आतंकवाद का दैत्य ताज और ट्राइडेंट होटलों के डाइनिंग हाल तक नहीं पहुंचता। यह वर्ग सही समय पर सच्चाई का सामना करने के बजाय अपराधों की तार्किकता सिद्ध करने में जुट जाता है। यदि आज के भारत की सच्चाइयों को भी इसी तरह दफनाया जाता रहेगा तो मुंबई का नरसंहार अंतिम नहीं होगा।

[जगमोहन : लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं]